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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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४४२ भारत में अंगरेज़ राज
जिस प्रकार हैदराबाद के पहले निज़ामुलमुल्क ने अपने स्वामी
दिल्ली सम्राट के साथ विश्वासघात करके मुग़ल साम्राज्य के
अधःपतन में सहायता दी थी, उसी प्रकार अब अज़ीमुलउमरा ने
अपने स्वामी निज़ाम के साथ विश्वासघात करके हैदराबाद की
स्वाधीनता का ख़ात्मा कराया ।
हिन्दोस्तानी नरेशों के मन्त्रियों को रिश्वतें देकर अपनी ओर
करने की कोशिश करना अंगरेज़ अफ़सरों के लिए उन दिनों एक
आम बात थी । मार्किस वेल्सली के सगे भाई आर्थर वेल्सली ने,
जो बाद में ड्यूक ऑफ़ वैलिंग्टन के नाम से प्रसिद्ध हुआ, २४
अगस्त सन् १८०३ को मेजर शा के नाम एक पत्र में लिखा था—
“करनल क्लोज़ के नाम मेरे पत्रों से आपने देखा होगा कि हर बात
की ठीक ठीक ख़बर रखने के लिए मैंने इस बात पर ज़ोर दिया है
कि करनल क्लोज़ पेशवा के मन्त्री को धन दे ।”
कप्तान कर्कपैट्रिक को पत्र लिखने के एक सप्ताह बाद १५ जुलाई
[हाशिया: वेल्सली की] सन् १७९८ को वेल्सली ने मद्रास के गवर्नर
[हाशिया: अधिक व्यापक] को लिखा कि आप हैदराबाद के लिए सेना
[हाशिया: तजवीज़] तैयार रखिए । इस पत्र में वेल्सली ने लिखा—
“मैं चाहता हूँ निज़ाम में कुछ योग्यता और बल
फिर से आजावे ।” निस्सन्देह वेल्सली अपने चिर मित्र निज़ाम से


proposed conditions, you will then require the march of the troops from
Fort St. George." - Governor-General's letter to Captain Kirk Patrick dated
8th July, 1798.

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