भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
४४६ भारत में अंगरेज़ी राज
सेना इस समय निज़ाम की नौकरी में है उसकी संख्या बढ़ा दी जावे, इत्यादि
इसलिए × × × ।”
निज़ाम का इस तरह की कभी कोई इच्छा प्रकट करना तो दूर
रहा, उसे इस तमाम साज़िश का पहले से गुमान तक न था।
केवल दग़ा और लाचारी ने उसे सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर करने के
लिए मजबूर किया।
इस सबसीडीयरी सन्धि के अनुसार छै हज़ार हिन्दोस्तानी
सिपाहियों की एक नई सेना मय तोपखाने के अंगरेज़ अफ़सरों के
अधीन निज़ाम के ख़र्च पर निज़ाम के राज के अन्दर सदा के लिए
क़ायम कर दी गई और यह तय हुआ कि आइन्दा बिना कम्पनी
की इजाज़त के निज़ाम किसी यूरोपियन को अपने यहाँ नौकर न
रक्खे। इस प्रकार निज़ाम पहला भारतीय नरेश था जिसे मार्किस
वेल्सली ने 'सबसीडीयरी एलायन्स' के जाल में फाँस कर उसे
उसके अपने राज के अन्दर एक तरह का क़ैदी बना दिया, और
जिसे अपने ख़ज़ाने से उस सेना का ख़र्च बरदाश्त करना पड़ा
जिस सेना ने उसे क़ैद करके रक्खा।
इंगलिस्तान के मन्त्रिमण्डल ने हैदराबाद की इस सन्धि पर
[हाशिया: वेल्सली और उसके साथियों को कम्पनी की ओर से इनाम] विशेष पत्र द्वारा हार्दिक सन्तोष प्रकट किया,
और कम्पनी के डाइरेक्टरों ने इनाम के तौर पर
वेल्सली को बीस साल तक के लिए ५,०००
पाउण्ड सालाना की पेन्शन प्रदान की। यह
पेन्शन सन्धि की तारीख़ १ सितम्बर सन् १७९८ से शुरू की गई।
वेल्सली और निज़ाम ४४७
कर्कपैट्रिक और मैलकम को भी उनकी सेवाओं के लिए इनाम और
तरक़्क़ियाँ दी गईं ।
इसके बाद निज़ाम की हालत इतनी असहाय हो गई कि
अज़ीमुलउमरा की मृत्यु के बाद निज़ाम की इच्छा के विरुद्ध
अंगरेज़ों ने अपने एक आदमी मीर आलम को उसकी जगह निज़ाम
का प्रधान मन्त्री नियुक्त करवा दिया ।
इस समस्त दग़ा के लिए एक बहाना यह लिया गया कि
अंगरेज़ों को उस समय फ्रांसीसियों से और टीपू सुलतान से
हमले का डर था, और इसलिए उन तमाम शक्तियों को पंगुल कर
देना अंगरेज़ों के लिए आवश्यक था जिनके फ्रांसीसियों या टीपू
से मिल जाने की सम्भावना हो । किन्तु एक तो उस समय की
समस्त स्थिति को देखने से मालूम होता है कि ये दोनों डर बिल्कुल
झूठे थे, दूसरे यदि इस तरह की कोई आशंकाएँ रही भी हों तो भी
गम्भीर सन्धियों को तोड़ कर और गुप्त षड्यन्त्र रच कर दूसरे
राज्यों की स्वाधीनता को हरने का यह कोई न्याय्य बहाना नहीं हो
सकता । इस सब का असली कारण था अंगरेज़ों की वह साम्राज्य
पिपासा जिसका पिछले अध्याय में ज़िक्र किया जा चुका है ।
ठीक जिस तरह के प्रयत्न हैदराबाद में किए जा रहे थे, उसी
[हाशिया: हैदराबाद और] तरह के प्रयत्न उसी समय पूना दरबार में भी
[हाशिया: पूना में अन्तर] चल रहे थे । ८ जुलाई को वेल्सली ने कप्तान
कर्कपैट्रिक के नाम पत्र लिखा, और ठीक उसी
दिन उसी विषय का एक पत्र पूना के रेज़िडेंट को लिखा । किन्तु
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पूना में वेल्सली को सफलता न हो सकी। गो कि नाना फड़नवीस
उस समय क़ैद में था फिर भी पूना दरबार अभी तक हैदराबाद
दरबार की तरह राजनीति शून्य या चरित्र शून्य न हो पाया था।
पूना दरबार में अभी तक ऐसे जागरूक और दूरदर्शी नीतिज्ञ
मौजूद थे जो अंगरेज़ों की चालों में इतनी आसानी से न आ
सकते थे।