भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 724, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेल्सली और निज़ाम ४४५
किया। इसी मौक़े पर कम्पनी की पलटनों ने भी अचानक हैदराबाद
को जा घेरा। वज़ीर अज़ीमुलउमरा से कहा गया कि आप फ़ौरन
निज़ाम की पलटनों को बरखास्त करके कम्पनी की पलटनों को
उनकी जगह दे दें। लिखा है कि कम्पनी की सेना को इतनी जल्दी
हैदराबाद में देख कर अज़ीमुलउमरा चकित रह गया और एक बार
उसने रियासत की सेना को बरखास्त करने से इनकार कर दिया।
जिस सेना और उसके अफ़सरों ने सदा इतनी वफ़ादारी के साथ
राज की सेवा की थी उसे बेक़सूर बरखास्त कर देना अज़ीमुलउमरा
के लिए भी इतना आसान न था। असहाय निज़ाम को चन्द घण्टे
पहले तक इस तमाम कार्रवाई का गुमान भी न था। किन्तु न
निज़ाम में इतनी हिम्मत थी और न उसके आदमियों में इतनी
वफ़ादारी। अन्त में चारों ओर से कम्पनी की पलटनों से घिर कर,
स्वयं अपने दरबार को विश्वासघातकों से छलनी छलनी देख कर
और अपनी ही सेना को अपने ख़िलाफ़ विद्रोही देखकर निज़ाम को
अंगरेज़ रेज़िडेंट की इच्छा पूरी करनी पड़ी।
१ सितम्बर सन् १७९८ को निज़ाम ने कम्पनी के साथ उस
कम्पनी और नए सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए जिससे
निज़ाम में सबसी हैदराबाद दरबार की स्वाधीनता का सदा के
डीयरी सन्धि लिए ख़ात्मा हो गया। इस सन्धि पत्र का पहला
ही वाक्य सरासर झूठ है। उसमें लिखा है—
"चूंकि नवाब निज़ामुलमुल्क आसफ़जाह बहादुर ने मौजूदा दोस्ती के
महत्व को देखते हुए यह इच्छा प्रकट की है कि माननीय कम्पनी की जो