भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
३६२ भारत में अंगरेज़ी राज
आगे चल कर टॉरेन्स लिखता है :—
“कोई भी समझदार और न्यायशील इतिहास लेखक इन कामों पर
बिना आश्चर्य प्रकट किए और उन्हें निन्दनीय ठहराए उनका उल्लेख नहीं
कर सकता ।”*
कॉर्नवालिस ने देश भर में नई अंगरेज़ी अदालतें क़ायम करके
नई अंगरेज़ी इन भारतीय ग्राम पंचायतों के रहे सहे चिन्हों
अदालतें का अब सदा के लिए अन्त कर दिया ।
कॉर्नवालिस की इन करतूतों को 'शासन सुधारों'
का नाम दिया जाता है। इतिहास लेखक मिल ने बड़ी योग्यता
और विस्तार के साथ दर्शाया है कि किस प्रकार कॉर्नवालिस के
इन 'शासन सुधारों' (?) ने—“भारत की प्राचीन ग्राम पंचायतों
का सत्यानाश कर दिया, नई अंगरेज़ी कचहरियों की तमाम
कार्रवाइयों को जान बूझ कर लम्बा और पेचीदा बना दिया,
वकीलों को जन्म दिया और इस तरह के क़ानून बना दिए कि
बिना वकील की मदद के किसी मुक़दमे का चल सकना क़रीब
क़रीब नामुमकिन हो गया, ग़रीबों के लिए न्याय प्राप्त कर सकना
नामुमकिन कर दिया, सरकार के लिए एक तरह के नियम और
मामूली प्रजा के लिए दूसरी तरह के नियम रख कर सरकार के लिए
अपनी मालगुज़ारी वसूल कर सकना सस्ता और आसान कर
दिया, इंगलिस्तान के हज़ारों निकम्मे लड़कों की जीविका का
- “ No wise or just historian will note these things without expressions
of wonder and condemnation.”— Ibid p 103.
लार्ड कॉर्नवालिस ३६३
सुन्दर प्रबन्ध कर दिया और भारतवासियों में मुक़द्दमेबाज़ी,
जालसाज़ी, दरोग़हलफ़ी, रिश्वत सितानी, फूट और बरबादी के
फैलने के लिए मैदान साफ़ कर दिया ।”*
इन सब सुधारों (?) और उनके नतीजों को यहाँ और अधिक
विस्तार के साथ बयान करना व्यर्थ है। निस्सन्देह भारतवासियों
के चरित्र पर इनका असर सब से अधिक नाशकर हुआ।
सुप्रसिद्ध अंगरेज़ विद्वान एस० लौब लिखता है :—
“हमारी न्याय पद्धति कितनी ज़लील है ! वकालत
[हाशिया: वकालत की नई] की जिस यूरोपीय प्रथा को हम इस देश में प्रचलित
[हाशिया: प्रथा] करने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं, क्या उससे अधिक
सदाचार से बिलकुल गिरी हुई किसी दूसरी प्रथा का अनुमान भी किया जा
सकता है ! × × × क्या हमारी अदालतें रिश्वत देने के अड्डे नहीं हैं ? और
क्या मुक़द्दमेबाज़ी का शौक़ क़ौम के दिमाग़ पर लगनी बीमारी की तरह असर
करके उसे पूरी तरह सदाचार भ्रष्ट नहीं कर रहा है ? जहाँ तक हो सके वहाँ
तक लोगों को अपने मुक़दमें आपस ही में तय करने का मौक़ा क्यों न
दिया जाय ?”†
- Mill, vol. v, p. 355, etc.
† "Look at our miserable legal system. Can anything be conceived
more thoroughly immoral than the system of Western Advocacy which we
are doing our best to introduce into this country? . . . are not our
law-courts hot-beds of corruption, and is not the love of litigation con-
taminating and thoroughly perverting the national mind? Why not let the
people settle their own disputes as far as possible?"—S. Lobb, the famous
English Positivist.
३६४ भारत में अंगरेज़ी राज
किन्तु कॉर्नवालिस खूब समझता था कि किसी भी परतन्त्र
देश में पराजित क़ौम के चरित्र भ्रष्ट कर देने और उसे चरित्र भ्रष्ट
रखने में ही विदेशी शासकों का सब से अधिक बल है।
लॉर्ड कॉर्नवालिस के शासन काल की सब से अधिक महत्व की
इस्तमरारी घटना बंगाल का इस्तमरारी बन्दोबस्त बताई
बन्दोबस्त जाती है। असली बात यह थी कि जिस समय
कम्पनी ने तीनों प्रान्तों की दीवानी दिल्ली सम्राट
सं प्राप्त की और धीरे धीरे उन प्रान्तों पर अपना शासन जमाना
शुरू किया उस समय से उन्होंने हर जगह नया बन्दोबस्त करके
सरकारी लगान बेहद बढ़ा दिया, जिसका ज़िक्र एक पिछले
अध्याय में किया जा चुका है। एडमंड बर्क लिखता है कि लगान
बेहद बढ़ा दिए जाने की वजह से ही सारा "देश वीरान दिखाई
देने लगा।"* इस लगान बढ़ाए जाने ही का एक नतीजा बंगाल
भर के अन्दर सन् १७७० का वह भयंकर दुष्काल था जिसके
समान आपत्ति देश पर पहले कभी न आई थी और जिसमें लाखों
गाँव उजड़ गए।
जिस समय कॉर्नवालिस बंगाल पहुँचा, कम्पनी का ख़ज़ाना
ख़ाली पड़ा था, अच्छी से अच्छी ज़मीन बिना जोती बोई और
वीरान पड़ी हुई थी और अधिकांश ज़मींदारों के ज़िम्मे कई कई
साल का लगान बाक़ी चला आ रहा था जिसे चुका सकना उनकी
शक्ति सं बिल्कुल बाहर था। इस शोचनीय अवस्था में कम्पनी को
- "The country has turned into a desert." Edmund Burke.
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३६५
दिवाले से बचाने का केवल एक ही उपाय हो सकता था। वह यह
था कि नए सिरे से बन्दोबस्त करके सदा के लिए एक मुनासिब
लगान तय कर दिया जाय। कॉर्नवालिस से दस साल पहले कुछ
अंगरेज़ अफ़सर यह सलाह दे चुके थे और कम्पनी के डाइरेक्टरों
ने कॉर्नवालिस को भारत भेजते समय उसे इस्तमरारी बन्दोबस्त
करने की हिदायत कर दी थी।
इस इस्तमरारी बन्दोबस्त के साथ साथ कॉर्नवालिस ने यह
क़ानून भी पास कर दिया कि जिन जिन ज़मींदारों के ज़िम्मे लगान
बाक़ी है उनकी ज़मींदारियाँ फ़ौरन नीलाम कर दी जावें और ज्योंही
आइन्दा किसी के ज़िम्मे बकाया निकले, त्योंही उसकी ज़मीन
नीलाम कर दी जाय और ऐसे मौक़ों पर बड़ी बड़ी ज़मींदारियों के
टुकड़े करके उन्हें अलग अलग नीलाम किया जाय।
एक अंगरेज़ लेखक लिखता है कि कॉर्नवालिस के इस्तमरारी
बन्दोबस्त के दस साल के अन्दर बंगाल भर की तमाम ज़मींदारियों
की शक्लें और उनके मालिक सब बदल गए। इस प्रकार कॉर्नवालिस
ने इस्तमरारी बन्दोबस्त के बहाने बंगाल के हज़ारों पुराने घरानों
और तमाम बड़ी बड़ी ज़मींदारियों का ख़ात्मा कर दिया और
उसकी जगह नए छोटे छोटे निर्बल और ख़ुशामदी ज़मींदार पैदा
कर दिए।*
* Memorandum on the Revenue Administration of the Lower Provinces
of Bengal, by J. Macneile, p. 9.
३४६ भारत में अंगरेज़ी राज
कार्नवालिस के समय में हिन्दोस्तान का केवल थोड़ा सा
देश की दशा हिस्सा कम्पनी के अधीन था और बाक़ी बहुत
बड़ा हिस्सा मराठों, टीपू, निज़ाम और नवाब
अवध के शासन में था, किन्तु दोनों हिस्सों की तुलना अत्यन्त
शिक्षाप्रद थी। ब्रिटिश भारत चारों ओर उजाड़, दरिद्र और
वीरान नज़र आता था और देशी भारत इधर से उधर तक हरा
भरा, खुशहाल और आबाद दिखाई देता था। देशी भारत के
अन्दर की आपसी लड़ाइयाँ भी प्रजा की खुशहाली के लिए
उतनी घातक न होती थीं जितनी ब्रिटिश भारत का लगातार
कुशासन और आए दिन की जायज़ और नाजायज़ लूट । प्रजा के
जान माल की उस समय के ब्रिटिश भारत में कोई भी क़द्र या
हिफ़ाज़त न थी। इस कथन के समर्थन में उस समय के अनेक देशी
और विदेशी लेखकों की गवाही पेश की जा सकती है। हम यहाँ
पर केवल कम्पनी की एक सरकारी रिपोर्ट से एक वाक्य नक़ल
करते हैं। सन् १८१२ की पाँचवीं सरकारी रिपोर्ट में लिखा है—
"राजशाही में डकैती खूब फैली हुई है। × × × फिर भी लोगों की
हालत की ओर काफ़ी ध्यान नहीं दिया जाता। इस बात से इनकार नहीं
किया जा सकता कि वास्तव में लोगों की जान और माल की कोई हिफ़ाज़त
नहीं की जाती। बंगाल के अधिकांश ज़िलों की यही हालत है।""*
- "That dacoity is very prevalent in Raj Shaye. . . . . Yet the
situation of the people is not sufficiently attended to. It can not be denied,
that, in point of fact, there is no protection for persons or property. Such
लॉर्ड कॉर्नवालिस ३६७
वास्तव में कम्पनी के शासन से पहले बुरे से बुरे समय में भी
देश की कभी वह हालत न हुई थी जो कम्पनी के शासन के तीस
साल के अन्दर दिखाई दे गई ।
सात साल भारत में शासन करने के बाद लॉर्ड कॉर्नवालिस
सन् १७९३ में विलायत लौट गया । उसे दोबारा हिन्दोस्तान भेजा
गया, किन्तु उसके चन्द महीने के अन्दर हिन्दोस्तान ही में उसकी
मृत्यु हो गई ।
भारत के अन्दर अंगरेज़ी सत्ता की जड़ों को मज़बूत करने में
कॉर्नवालिस ने ख़ास हिस्सा लिया !
is the state of things which prevails in most of the Zillahs in Bengal."--The
Fifth Report of 1812.
बारहवाँ अध्याय
• — • — •
सर जॉन शोर
[ १७६३-१७६८ ]
सर जॉन शोर वारेन हेस्टिंग्स के समय में बंगाल के अन्दर
कम्पनी का एक मामूली नौकर रह चुका था।
सर जॉन शोर की वारेन हेस्टिंग्स का वह पटु शिष्य था और वारेन
नियुक्ति हेस्टिंग्स ही के ज़रिये उसने इतनी तरक्क़ी की।
इंगलिस्तान के मन्त्रियों और कम्पनी के डाइरेक्टरों ने मिलकर
जिस समय सर जॉन शोर को गवरनर जनरल बनाकर भेजने का
इरादा किया उस समय पालिमेण्ट में वारेन हेस्टिंग्स के ऊपर
मुक़दमा चल रहा था। एडमण्ड बर्क उस मुक़दमे में सरकारी
वकील था। बर्क ने कम्पनी के डाइरेक्टरों को लिखा—
“ × × × हमें पता लगा है कि जिन जुर्मों का इलज़ाम वारन हेस्टिंग्स
सर जॉन शोर ३६६
पर लगाया जा रहा है उनमें से कुछ में मिस्टर शोर वास्तव में हेस्टिंग्स का
एक ख़ास साथी और सहायक था। × × ×
× × ×
“ऐसी हालत में आपके लिए यह सोच लेना बुद्धिमानी होगी कि एक
ऐसे आदमी को, जिसका चरित्र ज़ाहिरा आप ही के काग़ज़ात से अत्यन्त
निन्दनीय मालूम होता है, सब से ऊँचे और सब से अधिक अधिकार युक्त
पद पर नियुक्त करने के क्या नतीजे हो सकते हैं × × ×।”*
बर्क ने इससे कहीं अधिक ज़ोरदार पत्र इंगलिस्तान के 'भारत
मन्त्री' हेनरी डण्डास के पास भेजा।
किन्तु इन पत्रों का इंगलिस्तान के अधिकारियों पर कोई असर
न हुआ और २८ अक्तूबर सन् १७६३ को सर जॉन शोर ने कलकत्ते
पहुँच कर गवरनर जनरल का काम सँभाल लिया।
उसी साल पार्लिमेण्ट ने एक नए शाही चार्टर के ज़रिए ईस्ट
इण्डिया कम्पनी की ज़िन्दगी बीस साल के लिए और बढ़ा दी।
हिन्दोस्तान का बना हुआ माल और ख़ासकर यहां का बुना कपड़ा
- "... ... ... we have found Mr. Shore materially concerned as a
principal actor and party in certain of the offences charged upon Mr.
Hastings; ... ... ...
... ... ...
"In that situation, it is for the prudence of the court to consider the
consequences which possibly may follow from sending out, in offices of the
highest rank and of the highest possible power, persons whose conduct,
appearing on their own Records, is, at the first view, very reprehensible;
... ... ..."-Letter from Edmund Burke to Francis Baring, Chairman of the
Court of Directors, dated October 14, 1792.
४०० भारत में अंगरेज़ी राज
इंगलिस्तान जाना बन्द कर देने के लिए उस समय इंगलिस्तान में
ज़बरदस्त आन्दोलन जारी था। किन्तु यह कहानी एक दूसरे
अध्याय में दी जायगी।
मीर जाफ़र के उत्तराधिकारी अभी तक मुर्शिदाबाद की नुमायशी
मसनद पर बैठते चले आते थे। चुनांचे सर जॉन शोर के भारत
पहुँचने के एक महीने पहले ३७ साल की आयु में २३ साल तक
सूबेदारी की मसनद पर बैठने के बाद नवाब मुबारकुद्दौला की मृत्यु
हुई। मुबारकुद्दौला के बारह लड़के और तेरह लड़कियाँ थीं, जिनमें
सबसे बड़े लड़के वज़ीरुद्दौला के मसनद पर बैठने का २८ सितम्बर
सन् १७६३ को कलकत्ते में कम्पनी की ओर से बाक़ायदा एलान
किया गया।
एक पिछले अध्याय में पहले मराठा युद्ध और सन् १७८२ की
सालबाई वाली सन्धि का ज़िक्र आ चुका है।
[हाशिया: वारन हेस्टिंग्स की दोहरी साज़िशें] माधोराव नारायण उस समय पेशवा था। नाना
फड़नवीस उसका प्रधान मन्त्री था और हत्यारे
राघोबा को गोदावरी के तट पर कोपरगाँव भेज दिया गया था।
सन् १७८४ के शुरू में कोपरगाँव ही में राघोबा की मृत्यु हुई।
उसका बेटा बाजीराव जिसकी आयु ६ साल की थी, उस समय
पूना में था।
माधोजी सींधिया वारन हेस्टिंग्स के हाथों की एक ख़ास
कठपुतली था। माधोजी के साथ गुप्त सन्धियाँ और समझौते करके
हेस्टिंग्स उसके ज़रिये एक ओर मराठों की शक्ति का नाश करना
सर जॉन शोर ४०१
चाहता था और दूसरी ओर दिल्ली सम्राट् के रहे सहे मान और
उसके अधिकार का अन्त कर देना चाहता था। इंगलिस्तान पहुँच
कर वारन हेस्टिंग्स पर जो मुक़दमा चला उसमें एक इलज़ाम उस
पर यह था—
“मुग़ल सम्राट् के थोड़े से रहे सहे इलाकों को छीन लेने के लिए वारन
हेस्टिंग्स मराठा राज के प्रधान सेनापति माधोजी सींधिया से मिल गया;
और जब कि एक ओर उसने अपना एक दूत इस काम के लिए दिल्ली भेज
दिया कि वह वहाँ पर सम्राट् और उसके वज़ीरों के साथ गुप्त साज़िशें जारी
रक्खे × × × दूसरी ओर इस तमाम समय में वह सम्राट् और उसके वज़ीरों
के ख़िलाफ़ बराबर मराठों से मिला रहा; मराठों के साथ भी उसने दग़ा की
और उनसे बहाना यह लेता रहा कि मैं सम्राट् से तुम्हारे अधिकारों की रक्षा
कर रहा हूँ। इस तरह उसने उन सब के नाश की तदबीर की और सब का
नाश कर डाला।”*
वारन हेस्टिंग्स ही की सलाह से माधोजी सींधिया ने एक
[हाशिया: दिल्ली सम्राट् के] ज़बरदस्त फ़ौज रक्खी, उस फ़ौज में यूरोपियन
[हाशिया: साथ दग़ा] अफ़सर रक्खे और वारन हेस्टिंग्स की ख़ास
सिफ़ारिश पर एक यूरोपियन दी बॉयन को
उसका प्रधान सेनापति नियुक्त किया। यही फ़ौज लेकर माधोजी
- " . . . . Warren Hastings did unite with the Captain-General of
the Marhatta State, called Madhoji Scindhia, in designs against the few
remaining territories of the Moghul Emperor; and that whilst he sent an
agent to Delhi and carried on intrigues with the King and his ministers,
. . . . he did all along concur with the Marhattas in their designs
against the said King and his ministers, under the treacherous pretext of
२६
४०२ भारत में अंगरेज़ी राज
ने दिल्ली के आसपास के इलाक़ों पर हमला किया और सम्राट
को कुछ समय के लिए एक तरह अपना क़ैदी बना लिया। अंगरेज़
उस समय तक सम्राट की प्रजा थे और बराबर अपने इलाक़ों के
लिए सम्राट को ख़िराज दिया करते थे। वारन हेस्टिंग्स ने बजाय
सम्राट की सहायता करने के माधोजी को हर तरह उकसाया और
बाद में अंगरेज़ों ने सम्राट की असहाय अवस्था से लाभ उठाकर
ख़िराज भेजना बन्द कर दिया।
माधोजी के बढ़ते हुए बल को देखकर महाराष्ट्र मण्डल के दूसरे
सदस्यों को ईर्षा होना स्वाभाविक था। अन्त
[हाशिया: माधोजी सींधिया] में यह ईर्षा ही मराठों की सत्ता के नाश की
[हाशिया: के नाश की] सबसे बड़ी वजह हुई। कलकत्ते की कौन्सिल
[हाशिया: तदबीरें] की काररवाई में दर्ज है कि एक बार कौन्सिल
के कुछ सदस्यों ने यह शक ज़ाहिर किया कि माधोजी के बल का
बढ़ते जाना कम्पनी के लिए ख़तरनाक है। इस पर वारन हेस्टिंग्स
ने उन्हें विश्वास दिलाया कि माधोजी की नई सेना ही अन्त में
उसके विनाश का सबब होगी। वारन हेस्टिंग्स को अपनी चाल पर
पूरा क़ाबू था, और उसके जीवन ही में उसकी यह पेशीनगोई
सच्ची साबित होगई।
माधोजी सींधिया का बल बढ़ता जा रहा था। अंगरेज़ों के
लिए उसे सीमा के अन्दर रखना ज़रूरी था। माधोजी सींधिया
supporting the authority of the former against the latter and did contrive
and effect the ruin of them all, ... ... ."-One of the charges against
Warren Hastings in his impeachment in England.
सर जॉन शोर. ४०३
और नाना फड़नवीस दोनों का बल महाराष्ट्र मण्डल में सबसे
अधिक बढ़ा हुआ था। उस मण्डल का नाश करने के लिए अंगरेज़ों
का इनके बल को तोड़ना आवश्यक था। पेशवा माधोराव नारायण
पूरी तरह नाना के कहने में था। पूना में माधोराव नारायण को
मसनद से उतार कर उसकी जगह राघोबा के बालक पुत्र बाजी
राव को पेशवा बनाने के लिए एक गुप्त षड्यन्त्र रचा गया।
माधोजी सींधिया को भी इस षड्यन्त्र में शामिल कर लिया गया।
किन्तु नाना फड़नवीस को इसका पता चल गया। उसने पेशवा
के हुकुम से बाजीराव को गिरफ़्तार करके पूना में क़ैद कर दिया।
माधोजी सींधिया उस समय दिल्ली सम्राट का ख़ास संरक्षक
बना हुआ था। वारन हेस्टिंग्स ने माधोजी से
[हाशिया: माधोजी के ख़िलाफ़ साज़िशें] वादा कर लिया था कि कम्पनी की ओर से
सम्राट का सालाना खिराज आइन्दा आप को
दिया जाया करेगा। मालूम होता है हेस्टिंग्स के समय में यह
मामला यूंही टलता रहा। हेस्टिंग्स के बाद माधोजी ने गवरनर
जनरल मैक्फ़रसन से सम्राट के नाम पर खिराज तलब किया।
मैक्फ़रसन ने टला दिया। अन्त में कॉर्नवालिस ने खिराज देने से
सदा के लिए साफ़ इनकार कर दिया। इस पर दिल्ली सम्राट ने
स्वयं माधोजी को पत्र लिखा कि तुम कलकत्ते पहुँच कर कम्पनी से
शाही खिराज वसूल करो। सम्राट ने एक दूसरा पत्र नाना फड़नवीस
को लिखा और कम्पनी से शाही खिराज वसूल करने में पेशवा
दरबार की मदद चाही। माधोजी का उस समय फ़र्ज़ था कि
४०४ भारत में अंगरेज़ी राज
कलकत्ते पर चढ़ाई करके जिस तरह हो कम्पनी से शाही खिराज
वसूल करता। किन्तु माधोजी अपनी कमज़ोरियों को खूब जानता
था। अंगरेज़ माधोजी के बल को तोड़ने की पहले ही से कोशिशें
कर रहे थे। इतिहास लेखक ग्रॉण्ट डफ़ लिखता है :-
"मिस्टर मैक्फ़रसन ने यह सोचकर कि सींधिया की महत्वाकांक्षा बड़ी
ख़तरनाक हो चली है, दूसरे मराठा नरेशों में सींधिया के ख़िलाफ़ जो ईर्षा
और प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो गई थी, उसे और अधिक भड़काकर सींधिया की
तरक्क़ी को रोकने के लिए उसके मुक़ाबले में दूसरी ताक़तें खड़ी कर देने की
कोशिश की।"*
मॉस्टिन के बाद से अब तक कोई अंगरेज़ एलची पेशवा के
दरबार में न भेजा गया था। अब चार्ल्स मैलेट कम्पनी का एलची
नियुक्त होकर पूना पहुँचा। चार्ल्स मैलेट का ख़ास काम था
माधोजी सींधिया के ख़िलाफ़ दूसरे मराठा नरेशों को भड़काना और
नाना के विरुद्ध गुप्त साज़िशें करना। माधोजी के चित्त में भी
अंगरेज़ों की ओर से काफ़ी शङ्काएँ थीं। स्वयं कॉर्नवालिस का
व्यवहार उसकी ओर ख़ासा रूखा रहा। मूदाजी भोंसले के साथ
अंगरेज़ों ने अब इस तरह का सलूक शुरू किया, जिससे माधोजी
सींधिया को सन्देह होगया कि अंगरेज़ मेरे ख़िलाफ़ मूदाजी को
- "Mr. Macpherson conceived that the ambitious nature of Scindhia's
policy was very dangerous and endeavoured to raise some counterpoise to
his progress by exciting the jealousy and rivalry already entertained towards
him among the other Marhatta chiefs,"- Grant Duff's History of the Mar-
hattas, p. 463.
सर जॉन शोर ४०५
तैयार कर रहे हैं। माधोजी इस कठिन समस्या के विषय में नाना
फड़नवीस से सलाह करने के लिए पूना आया। इस दरमियान
चार्ल्स मैलेट ने पूना में रह कर माधोजी के विरुद्ध काफ़ी सामान
पैदा कर दिया था।
अहल्याबाई होलकर के आदर्श चरित्र और आदर्श शासन का
ज़िक्र एक पिछले अध्याय में आ चुका है। अहल्याबाई के तीस
वर्ष के शासन में उसकी प्रजा संसार में सब से सुखी और सब से
खुशहाल गिनी जाती थी। विदेशियों के साथ अधिक मेल जोल
रखने के अहल्याबाई सदा ख़िलाफ़ रही। अपने देशवासियों के
खिलाफ़ विदेशियों के साथ 'गुप्त सन्धियाँ' करना उसके लिए
नामुमकिन था। किन्तु अहल्याबाई की मृत्यु के बाद उसके उत्तरा-
धिकारी तुकाजी होलकर में न वह योग्यता रह गई थी और न
वह चरित्र। अंगरेज़ों ने तुकाजी को माधोजी सींधिया के ख़िलाफ़
भड़काना शुरू किया, और ठीक उस समय जब कि माधोजी नाना
फड़नवीस से सलाह करने के लिए पूना आया, तुकाजी होलकर ने
माधोजी के राज पर हमला कर दिया।
ग्राण्ट डफ़ के इतिहास से मालूम होता है कि होलकर और
सींधिया में उस समय कोई ख़ास झगड़ा न
[हाशिया: मराठा मंडल की] था, बल्कि माधोजी सींधिया तुकाजी होलकर
[हाशिया: अव्यवस्था] के साथ प्रेम से रहने के लिए उत्सुक था।
तुकाजी होलकर का माधोजी सींधिया के राज पर हमला करना
सारे मराठा इतिहास में एक मराठा नरेश के दूसरे मराठा नरेश
४०६ भारत में अंगरेज़ी राज
पर हमला करने की पहली मिसाल थी। महाराष्ट्र मण्डल का अब
क़रीब क़रीब ख़ात्मा हो चुका था। गायकवाड़ और भोंसले पहले
ही मण्डल से टूट चुके थे। सींधिया और होलकर की यह दशा
हो रही थी। इन चारों की इस शोचनीय हालत में अकेला पेशवा
दरबार मण्डल की उस इमारत को, जिसकी बुनियादें हिल चुकी
थीं, कब तक सँभाल सकता था।
सींधिया की सेना जिसका प्रधान सेनापति दी बोयन था,
अनेक लड़ाइयाँ देख चुकी थी। उसने होलकर की सेना को हरा
दिया। किन्तु होलकर ने पीछे लौटते हुए सींधिया के राज को खूब
रौंदा और सींधिया के मुख्य नगर उज्जैन को अच्छी तरह लूटा।
इस समय से ही सींधिया और होलकर के कुलों में परस्पर वैमनस्य
पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा। इसके बाद होलकर ने भी अंगरेज़ों
की सलाह से अपनी सेना में यूरोपियन अफ़सर नियुक्त करना
शुरू कर दिया। वह दोबारा सींधिया राज पर हमला करने का
इरादा कर रहा था।
एक ओर तुकाजी होलकर की शत्रुता और दूसरी ओर उसकी
अपनी सेना में दी बोयन और अनेक दूसरे यूरोपियनों का ऊँचे
पदों पर होना, इन दोनों बातों ने माधोजी सींधिया को इस समय
ख़ासा जकड़ रक्खा था। वह खूब समझ चुका था कि ये यूरोपियन
मुलाज़िम अंगरेज़ों के विरुद्ध मेरा साथ कभी न देंगे। इसके बहुत
दिन पहले नाना फड़नवीस ने एक बार माधोजी से कहा था—
“अंगरेज़ों को इस साम्राज्य में पैर रखने की जगह नहीं मिलनी
सर जॉन शोर ४०७
चाहिए, यदि उन्हें पैर रखने की जगह मिल गई तो सारा देश ख़तरे में पड़
जावेगा।"
माधोजी को अब नाना के ये शब्द बार बार याद आते थे।
वह अपने पिछले कृत्यों पर पछता रहा था और कम्पनी से शाही
खिराज वसूल करने के सम्बन्ध में सम्राट के पत्रों पर और इस
सारी स्थिति पर नाना से सलाह करने के लिए पूना आया हुआ
था। दिल्ली के सम्राट, माधोजी सिंधिया और पेशवा, तीनों में इस
प्रकार मेल हो जाना और माधोजी का तीनों की ओर से सेना
लेकर शाही खिराज वसूल करने के लिए कलकत्ते पर चढ़ाई करना
उस समय कम्पनी के लिए अत्यन्त आपत्तिजनक हो सकता था।
जब कि माधोजी सिंधिया पूना में पेशवा और नाना फड़नवीस
के साथ सलाहें कर ही रहा था, फ़रवरी सन्
[माधोजी सिंधिया] १७६४ को पूना के निकट वनौरी नामक स्थान
[की हत्या] पर अचानक माधोजी सिंधिया की मृत्यु होगई।
इतिहास लेखक ग्राण्ट डफ़ इस मृत्यु का सबब यह लिखता है
कि माधोजी को अचानक "ज़ोर का बुख़ार" आगया। किन्तु
माधोजी के जीवन चरित्र का अंगरेज़ रचयिता कीन कुछ और भेद
खोलता है। वह 'तारीखे मुज़फ़्फ़री' के आधार पर लिखता है—
"मृत्यु से पहली शाम को एक हथियारबन्द गिरोह ने माधोजी
को रास्ते में घेर कर मारा।"* कीन लिखता है—"नाना ने इस
- "Madhoji had been way laid the evening before by an armed gang
. . ."-Keene's Madhoji Scindhia.
४०८ भारत में अंगरेज़ी राज
गिरोह को इस कार्य के लिए नियुक्त किया था।” और कीन की
राय है—“निस्सन्देह माधोजी की मौत चाहने के लिए नाना के
पास काफ़ी वजह थी।”
इसमें सन्देह नहीं माधोजी सींधिया को मरवा डाला गया।
किन्तु नाना पर उसका दोष मढ़ना साफ़ झूठ और अन्याय है।
न नाना के पास उस समय “माधोजी की मौत चाहने के लिए कोई
वजह थी” और न नाना का चरित्र इस ढङ्ग का था। इसके ख़िलाफ़
अंगरेज़ों के पास “माधोजी की मौत चाहने के लिए निस्सन्देह
काफ़ी वजह थी।” और मैलेह और मॉस्टिन दोनों की राशि भी
एक थी। ग्रांट डफ़ साफ़ लिखता है :—
“सींधिया की शक्ति और उसकी महत्त्वाकाँक्षा, उसका पूना जाना और
सबसे बढ़ कर देश वासियों में आम तौर पर उसकी इज़्ज़त, इन सब बातों
से अंगरेज़ माधोजी पर शक करने लगे थे; इसलिए अंगरेज़ों के काग़ज़ों में
हमें इस बात के बार बार सबूत मिलते हैं कि वे माधोजी की हरकतों को बड़े
ग़ौर और जलन के साथ देख रहे थे।”*
ग्रांट डफ़ से ही यह भी पता चलता है कि माधोजी के पूना
माधोजी की हत्या पहुँचने के बाद ही दिल्ली के एक हिन्दोस्तानी
से अंगरेज़ों को अख़बार में एक लेख निकला था कि दिल्ली के
लाभ सम्राट ने पेशवा और माधोजी दोनों के नाम
- " . . . . his power and ambition, his march to Poona, and above
all, the general opinion of the country, led the English to suspect him ; and
we accordingly find in their records various proofs of watchful jealousy ;
. . . . ."—Grant Duff.
सर जॉन शोर ४०६
अपने बङ्गाल के खिराज के सम्बन्ध में पत्र लिखे हैं और उनसे
मदद चाही है। माधोजी सींधिया की हत्या से कम्पनी के रास्ते
का एक ज़बरदस्त काँटा दूर हो गया।
उस समय के सरकारी पत्र व्यवहार में दोनों बातें बिलकुल
साफ़ हैं। एक यह कि अंगरेज़ों ने होलकर को सींधिया पर
हमला करने के लिए उकसाया और दूसरे यह कि अंगरेज़ माधोजी
सींधिया के विरुद्ध साज़िशें कर रहे थे। जिस समय माधोजी अपने
राज से पूना की ओर रवाना हुआ, उसी समय गवरनर जनरल
ने सींधिया दरबार के अंगरेज़ रेजिडेंट को वहाँ से वापस
बुला लिया।
माधोजी की मृत्यु के समय कॉर्नवालिस इंगलिस्तान में था
और सर जॉन शोर भारत में गवरनर जनरल था। कॉर्नवालिस को
जब माधोजी की मृत्यु का समाचार मिला, उसने ७ सितम्बर सन्
१७६४ को प्रसन्न होकर सर जॉन शोर को लिखा—"सींधिया की
मृत्यु से आपकी गवरमेंट की क़रीब क़रीब हर राजनैतिक कठिनाई
दूर हो जावेगी।”*
इससे अधिक सुबूत इस बात का और क्या हो सकता है कि
माधोजी की मृत्यु वास्तव में कौन चाहता था और उसकी हत्या
करने वालों को किसने नियुक्त किया था।
- "The death of Scindhia, . . . will nearly remove every political
difficulty of your Government," - Cornwallis' letter to Sir John Shore,
September 7, 1794.
४१० भारत में अंग्रेज़ी राज
कम्पनी के रास्ते का दूसरा ज़बरदस्त काँटा नाना फड़नवीस
पेशवा माधोराव अभी मौजूद था। माधोजी सींधिया की हत्या
नारायण की मृत्यु के बाद महाराष्ट्र के अन्दर नाना और उसकी
नीति की क़द्र और अधिक बढ़ गई। चार्ल्स
मैलेट ने पूना से एक पत्र में लिखा कि—"जब तक पूना दरबार में
नाना का ज़ोर है, तब तक मराठा राज के अन्दर मज़बूती से अपने
पैर जमा सकने की हमें (अंग्रेज़ों को) सपने में भी आशा नहीं
करनी चाहिए।"*
नाना फड़नवीस के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों ने कई बार साज़िशें कीं,
किन्तु सफलता न मिल सकी। पेशवा माधोराव नारायण पूरी तरह
नाना के कहने में था। बिना उसे मसनद से हटाए कम्पनी को
अपनी इच्छा पूरी करने के लिए अनुकूल अवसर न मिल सकता
था। २७ अक्तूबर सन् १७९५ को कम्पनी के सौभाग्य से पेशवा
माधोराव दूसरा (माधोराव नारायण) अपने महल के छज्जे से
गिर कर मर गया। इस पेशवा की मृत्यु के सम्बन्ध में ग्रांट डफ़
लिखता है कि—"२५ अक्तूबर को सवेरे पेशवा जान बूझकर अपने
महल के एक छज्जे से कूद पड़ा, उसके दो अंगों की हड्डियाँ टूट गईं
और एक फ़व्वारे की नली से, जिसके ऊपर वह आकर पड़ा, वह
बहुत ज़ख़्मी हो गया। इसके बाद वह केवल दो दिन जिया।"†
- "As long as Nana remained Supreme at the Poona Court they (the
British) should never dream of obtaining a firm footing in the Marhatta
Kingdom." - Charles Malet.
† Grant Duff's History of the Marhattas, p. 521.
पेशवा माधोराव नारायन
[ श्री वासुदेव राव सूबेदार, सागर, की कृपा द्वारा ]