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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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लार्ड कॉर्नवालिस ३६३
सुन्दर प्रबन्ध कर दिया और भारतवासियों में मुक़द्दमेबाज़ी,
जालसाज़ी, दरोग़हलफ़ी, रिश्वत सितानी, फूट और बरबादी के
फैलने के लिए मैदान साफ़ कर दिया ।”*
इन सब सुधारों (?) और उनके नतीजों को यहाँ और अधिक
विस्तार के साथ बयान करना व्यर्थ है। निस्सन्देह भारतवासियों
के चरित्र पर इनका असर सब से अधिक नाशकर हुआ।
सुप्रसिद्ध अंगरेज़ विद्वान एस० लौब लिखता है :—
“हमारी न्याय पद्धति कितनी ज़लील है ! वकालत
[हाशिया: वकालत की नई] की जिस यूरोपीय प्रथा को हम इस देश में प्रचलित
[हाशिया: प्रथा] करने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं, क्या उससे अधिक
सदाचार से बिलकुल गिरी हुई किसी दूसरी प्रथा का अनुमान भी किया जा
सकता है ! × × × क्या हमारी अदालतें रिश्वत देने के अड्डे नहीं हैं ? और
क्या मुक़द्दमेबाज़ी का शौक़ क़ौम के दिमाग़ पर लगनी बीमारी की तरह असर
करके उसे पूरी तरह सदाचार भ्रष्ट नहीं कर रहा है ? जहाँ तक हो सके वहाँ
तक लोगों को अपने मुक़दमें आपस ही में तय करने का मौक़ा क्यों न
दिया जाय ?”†

  • Mill, vol. v, p. 355, etc.
    † "Look at our miserable legal system. Can anything be conceived
    more thoroughly immoral than the system of Western Advocacy which we
    are doing our best to introduce into this country? . . . are not our
    law-courts hot-beds of corruption, and is not the love of litigation con-
    taminating and thoroughly perverting the national mind? Why not let the
    people settle their own disputes as far as possible?"—S. Lobb, the famous
    English Positivist.