सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 727 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 683

४०६ भारत में अंगरेज़ी राज
पर हमला करने की पहली मिसाल थी। महाराष्ट्र मण्डल का अब
क़रीब क़रीब ख़ात्मा हो चुका था। गायकवाड़ और भोंसले पहले
ही मण्डल से टूट चुके थे। सींधिया और होलकर की यह दशा
हो रही थी। इन चारों की इस शोचनीय हालत में अकेला पेशवा
दरबार मण्डल की उस इमारत को, जिसकी बुनियादें हिल चुकी
थीं, कब तक सँभाल सकता था।
सींधिया की सेना जिसका प्रधान सेनापति दी बोयन था,
अनेक लड़ाइयाँ देख चुकी थी। उसने होलकर की सेना को हरा
दिया। किन्तु होलकर ने पीछे लौटते हुए सींधिया के राज को खूब
रौंदा और सींधिया के मुख्य नगर उज्जैन को अच्छी तरह लूटा।
इस समय से ही सींधिया और होलकर के कुलों में परस्पर वैमनस्य
पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा। इसके बाद होलकर ने भी अंगरेज़ों
की सलाह से अपनी सेना में यूरोपियन अफ़सर नियुक्त करना
शुरू कर दिया। वह दोबारा सींधिया राज पर हमला करने का
इरादा कर रहा था।
एक ओर तुकाजी होलकर की शत्रुता और दूसरी ओर उसकी
अपनी सेना में दी बोयन और अनेक दूसरे यूरोपियनों का ऊँचे
पदों पर होना, इन दोनों बातों ने माधोजी सींधिया को इस समय
ख़ासा जकड़ रक्खा था। वह खूब समझ चुका था कि ये यूरोपियन
मुलाज़िम अंगरेज़ों के विरुद्ध मेरा साथ कभी न देंगे। इसके बहुत
दिन पहले नाना फड़नवीस ने एक बार माधोजी से कहा था—
“अंगरेज़ों को इस साम्राज्य में पैर रखने की जगह नहीं मिलनी