सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मीर क़ासिम १८५

ऐमयाट से खाना खाने के बहाने किनारे पर आने की प्रार्थना की।
ऐमयाट ने इनकार किया और उसकी किश्तियाँ बीच धार से
चलती रहीं। एक दूसरा उच्च कर्मचारी भेजा गया, जिसने किनारे
से फिर कहा कि खाना तैयार है और यदि आप सेनापति मोहम्मद
तक़ी ख़ाँ की प्रार्थना स्वीकार न करेंगे तो उन्हें दुख होगा। ऐमयाट
ने फिर इनकार कर दिया। इसके बाद किनारे के अफ़सरों ने
किश्तियों को रुकने का स्पष्ट हुकुम दिया। जवाब में ऐमगाट ने
वहीं से किनारे की ओर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। नवाब
के आदमियों ने अब ज़बरदस्ती किश्तियों पर पहुँच कर बदला
लिया। उस लड़ाई में ऐमयाट का भी वहीं पर काम तमाम होगया।
२८ जून को मीर क़ासिम ने वन्सीटॉर्ट और उसकी कौन्सिल के
नाम यह पत्र लिखा :—
[हाशिया: मीर क़ासिम की] “ × × × रात को डाकू की तरह मिस्टर एलिस
[हाशिया: प्रजा के साथ ज़ुल्म] ने पटने के क़िले पर हमला किया, वहाँ के बाज़ार को
[हाशिया: और ज़्यादतियाँ] और तमाम व्यापारियों और नगर के लोगों को लूटा
और सुबह से तीसरे पहर तक लूट और क़त्ल जारी रक्खी । × × × चूंकि
आप लोगों ने बेइंसाफ़ी और ज़ुल्म के साथ शहर को रौंद डाला है, लोगों को
बरबाद किया है और कई लाख का माल लूट लिया है, इसलिए अब इंसाफ़
यह है कि कम्पनी ग़रीबों का नुक़सान भर दे, जैसा पहले कलकत्ते में हो
चुका है। आप ईंसाई लोग विचित्र दोस्त निकले। आपने सन्धि की, उस
पर ईसा मसीह के नाम से क़सम खाई। इस शर्त पर कि आपकी सेना सदा
मेरा साथ देगी और मेरी सहायता करेगी, आपने अपनी सेना के ख़र्च के लिए

१८६ भारत में अंगरेज़ी राज
मुझसे इलाक़ा लिया। असलियत में मेरे ही नाश के लिए आप फ़ौज रख
रहे थे, क्योकि उसी फ़ौज के हाथों ये सब कार्य हुए हैं x x x इसके
अलावा कई साल से अंगरेज़ गुमाश्तों ने मेरी निज़ामत के अन्दर जो जो
ज़ुल्म और ज़्यादतियों की हैं, जो बड़ी बड़ी रक़में लोगों से ज़बरदस्ती वसूल
की हैं और जो नुक़सान किए हैं मुनासिब और इंसाफ़ यह है कि कम्पनी इस
समय उस सबका हरजाना दे। आपको सिर्फ़ इतनी ही तकलीफ़ करने की
ज़रूरत है कि जिस तरह से बर्धमान और दूसरे इलाक़े आपने लिए थे उसी
तरह मुझपर इनायत करके आप उन्हें वापस लौटा दीजिए।”*
निस्सन्देह मजबूर होकर मीर क़ासिम ने अब कड़ाई का निश्चय
कर लिया।
७ जुलाई को यह पत्र कलकत्ते पहुँचा। उसी रोज़ कलकत्ते की
[हाशिया: मीरजाफ़र के साथ दोबारा साज़िश] अंगरेज़ कौन्सिल की ओर से मीर क़ासिम के साथ युद्ध का एलान प्रकाशित हुआ, जिसमें प्रजा को
यह सूचना दी गई कि मीर क़ासिम की जगह
मीर जाफ़र को अब फिर से बंगाल की मसनद पर बैठा दिया
गया है। नवाब मीर जाफ़र ही के नाम पर बंगाल भर से सेना
जमा की गई और मीर जाफ़र ही के नाम पर प्रजा से अंगरेज़ी
सेना का साथ देने के लिए कहा गया। किन्तु इस बाक़ायदा
एलान से पहले ही पटना विजय हो चुका था और फिर से छिन
भी चुका था। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कलकत्ते के
अंगरेज़ व्यापारियों की कौन्सिल को बंगाल के सूबेदार को मसनद


  • Long's Selections, pp. 325, 326.

अवध विलय, लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति एवं भारतीय हथकरघा-उद्योग का विनाश

मीर क़ासिम १८७

से उतारने या दूसरा सूबेदार नियुक्त करने का अधिकार कभी
किसी ने न दिया था।
मीर जाफ़र के साथ जो नई सन्धि इस अवसर पर की गई
उसका ज़िक्र अगले अध्याय में किया जायगा।
कम्पनी की सेना मेजर एडम्स के अधीन ५ जुलाई को यानी
[हाशिया: कई छोटी छोटी लड़ाइयाँ] युद्ध के एलान से दो दिन पहले कलकत्ते से
मुर्शिदाबाद की ओर रवाना हुई। मीर क़ासिम
की सेना सिपहसालार मोहम्मद तक़ी ख़ाँ के
अधीन मुंगेर से चली। तक़ी ख़ाँ वीर और योग्य सेनापति
था, किन्तु उसकी तमाम तजवीज़ों में बात बात में मुर्शिदाबाद
का नायब नाज़िम सय्यद मोहम्मद ख़ाँ, जो अंगरेज़ों से मिला
हुआ था, रुकावटें डालता रहता था। तक़ी ख़ाँ की सेना के अन्दर
भी अंगरेज़ काफ़ी सफलता के साथ विश्वासघात के बीज बो चुके
थे। तीन स्थानों पर दोनों ओर की सेनाओं में कई छोटी बड़ी
लड़ाइयाँ हुईं। इन लड़ाइयों का विस्तृत हाल “सीअरुल-मुताख़रीन”
नामक ग्रन्थ में दिया हुआ है। उस ग्रन्थ में मुसलमान सेना के
अन्दर एक ख़ास देशघातक मिरज़ा ईरज ख़ाँ का ज़िक्र आता है,
जिसने भीतर ही भीतर अंगरेज़ों से मिलकर मीर क़ासिम और
मोहम्मद तक़ी ख़ाँ के साथ दग़ा की। क़रीब दो सौ यूरोपियन
और अन्य ईसाई, जो नवाब की सेना में ख़ासकर तोपख़ाने में
नौकर थे, ऐन मौक़े पर शत्रु की ओर जा मिले। इन लड़ाइयों में से
एक में मोहम्मद तक़ी ख़ाँ मार डाला गया। इन्हीं लड़ाइयों के

१८८ भारत में अंगरेज़ी राज
सम्बन्ध में मालेसन लिखता है कि—"अंगरेज़ों की सफलता में
जितनी सहायता भारतीय नेताओं और नरेशों की परस्पर की ईर्षा
से मिली है उतनी दूसरी किसी भी चीज़ से नहीं मिली।”*
मीर क़ासिम की सेना ने अब ऊदवानाला नामक ऐतिहासिक
[हाशिया: उदवानाला में] स्थान पर अपना अन्तिम पड़ाव किया। प्राकृतिक
[हाशिया: दोनों ओर की] स्थिति और मीर क़ासिम की दूरदर्शिता दोनों ने
[हाशिया: फ़ौजें] मिलकर इस स्थान को सुरक्षित और अभेद्य बना
रक्खा था। एक ओर गंगा थी, दूसरी ओर
ऊदवानाला नाम की गहरी नदी जो गंगा में गिरती थी, तीसरी
ओर राजमहल की दुरारोह पहाड़ियाँ और चौथी ओर मीर
क़ासिम की बनवाई हुई ज़बरदस्त खाड़ियाँ और क़िलेबन्दी,
जिसके ऊपर सौ से अधिक मज़बूत तोपें लगी हुई थीं। पहाड़ियों
की तलहटी में खाड़ियों से ऊपर की ओर एक झील और एक लम्बी
चौड़ी दलदल थी। इस दलदल के अन्दर से ही दुर्ग से बाहर आने
जाने का एक अत्यन्त पेचदार रास्ता था, जिसका अंगरेज़ी सेना
को किसी तरह पता न चल सकता था। एक महीने तक मीर
क़ासिम की सेना इस दुर्ग के अन्दर और कम्पनी की सेना, जिसके
साथ बूढ़ा मीर जाफ़र भी था, ऊदवानाला के बाहर पड़ी रही,
किन्तु न अंगरेज़ अपनी तोपों के गोलों से संगीन क़िलेबन्दी पर
किसी तरह का असर पैदा कर सके और न भीतर की सेना को

  • "Few things have more contributed to the success of the English
    than the action of jealousy of each other of the native princes and leaders of
    India."—Ibid, p. 150.

मीर क़ासिम १८६
ज़रा भी हानि पहुँचा सके। दूसरी ओर एक साहसी और परहेज़-
गार मुसलमान सेनापति मिरज़ा नजफ़ ख़ाँ रोज़ रात के पिछले
पहर उसी दलदल के रास्ते आकर अंगरेज़ी सेना पर धावा करता
और अनेकों को ख़त्म कर और बहुत सा माल लेकर उसी रास्ते
लौट जाता। अंगरेज़ी सेना किसी तरह उसका पीछा न कर पाती
थी। लड़ाई का सामान भी अंगरेज़ों की निस्बत मीर क़ासिम की
सेना के पास कहीं अच्छा था। अंगरेज़ इतिहास लेखक ब्रूम लिखता
है कि भारत की बनी हुई जो बन्दूकें इस समय मीर क़ासिम की
सेना के पास थीं वह अंगरेज़ी सेना की, इंगलिस्तान की बनी हुई
बन्दूकों से धातु, बनावट, मज़बूती, उपयोगिता इत्यादि सब बातों
में कहीं बढ़िया थीं।* ईमानदारी की लड़ाई में अंगरेज़ किसी
तरह मीर क़ासिम पर विजय न प्राप्त कर सकते थे।
मीर क़ासिम की सेना का एक ख़ास दोष, जो उसके लिए
मीर क़ासिम के घातक सिद्ध हुआ, यह था कि उसने अनेक
ईसाई अफ़सरों यूरोपियन और आरमीनियन ईसाइयों को अपनी
की नमकहरामी सेना के बड़े बड़े ओहदों पर नियुक्त कर रक्खा
था। ईसा की ११ वीं सदी से लेकर जब कि
यूरोप की कई ईसाई शक्तियों ने मिल कर पहली बार मुसलमानों
से जेरुसेलम (बैतुलमुक़द्दस) छीनना चाहा, आज तक हज़रत ईसा
और हज़रत मोहम्मद के अनुयायियों के बीच प्रायः लगातार संग्राम
होते रहे हैं। ईसाई ताक़तों ने अनेक मुसलमान राज्यों के स्वतन्त्र

  • History of the Bengal Army, by Broome, p. 351.

१६० भारत में अंगरेज़ी राज
अस्तित्व को मिटाकर अनेक बार अपना जुश्रा मुसलमान क़ौमों के
कन्धों पर रक्खा है। ईसाइयों श्रौर मुसलमानों के इस सदियों के
विरोध के श्रालावा भी यूरोपियनों का ख़ास कर किसी यूरोपियन
क़ौम के विरुद्ध अपने किसी एशियाई स्वामी के साथ वफ़ादारी
कर सकना क़रीब क़रीब नामुमकिन है। इस सच्चाई को न समझ
सकना श्रनेक भारतीय श्रौर श्रन्य एशियाई शासकों के लिए घातक
साबित हुआ है।
कलकत्ते में इस समय श्रारमीनिया का एक मशहूर ईसाई
सौदागर ख़ोजा पेतरूस रहता था। इस सौदागर का एक भाई
ख़ोजा ग्रिगरी मीर क़ासिम की सेना में एक अफ़सर था श्रौर भी
कई श्रारमोनियन ईसाई मीर क़ासिम की सेना में नौकर थे। मेजर
एडम्स ने ख़ोजा पेतरूस की मारफ़त गुप्त पत्र व्यवहार द्वारा इन
सब लोगों को अपनी श्रोर फोड़ लिया।
इनके अलावा मीर क़ासिम की सेना में एक अंगरेज़ सिपाही
एक अंगरेज़ भी था, जो कुछ समय पहले अंगरेज़ी सेना को
विश्वासघातक छोड़कर नवाब के यहाँ भरती हो गया था। इस
अंगरेज़ को अपनी सेना में भरती कर लेना मीर
क़ासिम के नाश का सबसे बड़ा सबब साबित हुआ। उसने
मिरज़ा नजफ़ ख़ाँ के आने जाने के मार्ग को धीरे धीरे श्रच्छी तरह
देख लिया श्रौर एक दिन, जब कि मालूम होता है दुर्ग के भीतर के
श्रन्य ईसाई श्रौर ग़ैर ईसाई विश्वासघातकों के साथ सारी योजना
पक्की की जा चुकी थी, ४ सितम्बर की रात को क़रीब दस बजे

मीर क़ासिम १६१
यह अंगरेज़ नवाब की सेना से निकल कर अंगरेज़ी सेना की ओर
चला आया और वहाँ से शत्रु की सेना को साथ ले उसी मार्ग से
रातों रात अचानक नवाब की सेना पर आ टूटा। क़िले के अन्दर
के और भी कई अफ़सर शत्रु से मिले हुए थे और “सीअरुल मुता-
ख़रीन” से पता चलता है कि अनेक अपने स्थान की अभेद्यता और
शत्रु की अशक्तता पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करके अपने कर्त्तव्य
से असावधान हो गए थे। ऐसी स्थिति में सेना का कर्त्तव्य विमूढ़
हो जाना स्वाभाविक था। नतीजा यह हुआ कि मीर क़ासिम के
पूरे पन्द्रह हज़ार सैनिक उस रात की लड़ाई में काम आए ।
इस अंगरेज़ विश्वासघातक के काम के बारे में कर्नल मालेसन
लिखता है :—
“केवल एक व्यक्ति के इस कार्य ने अंगरेज़ों की ना उम्मेदी को विश्वास
में बदल दिया ; और इस कार्य के नतीजे ने मीर क़ासिम की सेना के आत्म-
विश्वास को ना उम्मेदी में बदल दिया । अंगरेज़ी सेना के लिए इस आदमी ने
इस मौक़े पर ईश्वर का काम किया ।”*
“जनरल एडम्स ने मीर क़ासिम की सेना को केवल विजय ही
नहीं किया, बल्कि उसका संहार कर डाला ।”† मीर क़ासिम की
क़रीब चार सौ तोपें इस युद्ध में अंगरेज़ों के हाथ आईं ।

  • "It was the act of a single individual which converted the despair of
    the English into confidence; it was the consequence of that act which changed
    the confidence of Mir Kassim's army into despair. The individual on this
    occasion performed the divine function for the English army." -Ibid. p. 157.
    † Ibid, p. 160.

१६२ भारत में अंग्रेज़ी राज
ऊदवानाला ही विदेशी व्यापारियों के विरुद्ध बंगाल के भारतीय
सूबेदारों की आशा का अन्तिम आधार था।
[ऊदवानाला की] ४ सितम्बर सन् १७६३ की रात को वह आशा
[पराजय] सदा के लिए टूट गई। जो चीज़ सिराजुद्दौला के
लिए प्लासी साबित हुई वही मीर क़ासिम के लिए ऊदवानाला
साबित हुआ, और दोनों जगह क़रीब क़रीब एक ही से उपायों द्वारा
अंगरेज़ व्यापारियों ने बंगाल की शाही सेना पर विजय प्राप्त की।
ऊदवानाला की पराजय का एक सबब यह भी बताया जाता
है कि उस रात को मीर क़ासिम ख़ुद अपनी सेना के साथ दुर्ग के
अन्दर मौजूद न था। अंगरेज़ इतिहास लेखक बोल्ट्स की राय है
कि यदि मीर क़ासिम स्वयं अपने अफ़सरों को सावधान रखनेऔर
अपने सैनिकों को उत्साह दिलाने के लिए मौजूद होता तो—"शायद
हो नहीं बल्कि बहुत ज़्यादा मुमकिन है कि उस दिन से अंगरेज़
कम्पनी के पास इन प्रान्तों में एक फुट ज़मीन भी न रह जाती।"*
ऊदवानाला की पराजय से मीर क़ासिम को बहुत बड़ा धक्का
[कुछ ख़ास ख़ास] लगा, किन्तु उसने विदेशियों की अधीनता
['विश्वासघातक] स्वीकार न की और न वह इतनी जल्दी हिम्मत
हारा। ऊदवानाला के बाद उसने मुंगेर के क़िले
को सँभाला। यह क़िला भी अत्यन्त मज़बूत था। उसकी रक्षा का

  • " . . . it is more than probable that, the English Company would
    have been left, from that day, without a single foot of ground in these
    Provinces."—Consideration on Indian Affairs, By Bolts, p. 43.

मीर क़ासिम १६३
उचित प्रबन्ध कर मीर क़ासिम अज़ीमाबाद (पटना) के लिए
रवाना हो गया। “सीअरुल-मुताख़रीन” से पता चलता है कि
मीर क़ासिम के जाते ही मुंगेर के क़िलेदार अरब अली ख़ाँ ने नक़द
रिशवत लेकर अपना क़िला चुपचाप अंगरेज़ों के सुपुर्द कर दिया।
अंगरेज़ों ने मुंगेर पर क़ब्ज़ा जमा कर अब मीर क़ासिम का पीछा
किया। महाराजा कल्यानसिंह की पुस्तक “ख़ुलासतुल तवारीख़”
में लिखा है कि अज़ीमाबाद क़िले के संरक्षक मीर मोहम्मदअली ख़ाँ
ने अपने लिए पाँच सौ रुपए मासिक पेन्शन कम्पनी से मंज़ूर करा
कर बिना विरोध वहाँ का क़िला भी शत्रु के हवाले कर दिया।
मीर क़ासिम को इस समय अपने चारों ओर सिवाय दग़ा के
और कुछ नज़र न आता था। अंगरेज़ों को अब केवल दो बातों की
चिन्ता थी। एक एलिस इत्यादि जो अंगरेज़ मीर क़ासिम के पास
अभी तक क़ैद थे उन्हें छुड़ा लेना और दूसरे किसी प्रकार मीर
क़ासिम को गिरफ़्तार करना। १६ सितम्बर सन् १७६३ को एडम्स
और कारनक ने मीर क़ासिम के एक फ़्रान्सीसी मुलाज़िम जाँती
(Gentil) को इस मज़मून का पत्र लिखा :—
“मुसलमानों के हाथों में जब कभी ताक़त होती है और उन्हें कोई डर
नहीं होता तो वे सदा हमारे सहधर्मियों और यूरोप निवासियों के साथ क्रूर
से क्रूर पाशविकता का व्यवहार करते हैं। किसी ईसाई के लिए मुसलमानों
की नौकरी करना बड़ी ज़िल्लत का काम है। हमारा यह भी अनुमान है कि
किसी बहुत ही ज़बरदस्त ज़रूरत से मजबूर होकर ही आपने इतनी ज़िल्लत
की नौकरी स्वीकार की होगी। अब ऐसी कष्टकर गुलामी से बच निकलने का
१३

१६४ भारत में अंगरेज़ी राज
और हमारी क़ौम की फिर से मित्रता लाभ करने का आपके लिए अच्छा
मौक़ा है। आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि हमारी क़ौम के साथ
आपने बहुत बेजा सलूक किया है (जब कि आजकल हमारी और आपकी
क़ौमों में सुलह है)। यदि आप हमारे आदमियों को क़ासिमअली ख़ाँ के
हाथों से निकाल कर हमारे पास भेजने की तदबीर कर सकें तो आप अंगरेज़ों
की कृतज्ञता पर पूरा भरोसा रखिए और हम आपको पचास हज़ार रुपए
फ़ौरन देने का वादा करते हैं।"*
'सीअरुल-मुताख़रीन' में लिखा है कि इसके बाद मीर क़ासिम
मीर क़ासिम को  को किसी तरह गिरफ़्तार करने की अंगरेज़ों को
गिरफ़्तार करने  चिन्ता हुई। वन्सीटार्ट और वारन हेस्टिंग्स
की योजना   ने कलकत्ते के ईसाई सौदागर ख़ोजा पेतरूस से
जिसे आग़ा बेदरूस भी कहते थे, ख़ोजा ग्रिगरी
के नाम जिसे गुरघिन ख़ाँ भी कहते थे, इस सम्बन्ध में एक पत्र

  • "We are persuaded also that it must have been the most absolute
    necessity only which could have engaged you in so dishonourable a service
    to a Christian as that of the moors, who always treat with the grossest
    brutality those of our religion and Europeans when it is in their power to do
    it with impunity. A favourable opportunity now offers to enable you to
    rid yourself of so irksome a slavery and to reconcile yourself with our
    nation, towards which you can not deny but you have acted very improperly
    (and which is now at peace with yours). If you can contrive means for the
    delivery of our gentlemen from the power of Cossim Ally Khan and will
    convey them to us, you may place a firm reliance on the gratitude of the
    English; and we promise you fifty thousand Rupees immediately."-Letter
    dated 19th September, 1763, from Adams and Carnac to one Monsieur Gentil
    in the employ of Meer Kassim—Long's Records, pp. 332, 333.

मीर क़ासिम १६५

लिखाया। अचानक एक दिन रात को एक बजे मीर क़ासिम के
एक विश्वस्त जासूस ने उसे जगाकर ख़बर दी—"आप बिछौने
पर पड़े क्या कर रहे हैं, आपका सेनापति गुरघिन ख़ाँ आपको
साफ़ फ़िरङ्गियों के हाथों में बेच रहा है! कुछ बाहर के लोगों के
साथ और मालूम होता है कि भीतर के लोगों, यानी आपके क़ैदियों,
के साथ भी उसकी साज़िश हो चुकी है।"
अभी तक एलिस और उसके अंगरेज़ साथियों के साथ मीर
क़ासिम ने बड़ी उदारता का व्यवहार किया था। इन खुले बाग़ियों
को ख़तम कर देने के बजाय वह तीन महीने से बराबर उन्हें आदर
पूर्वक अपने साथ रक्खे था और खिला पिला रहा था। किन्तु
'सीअरुल-मुताख़रीन' के अनुसार जब उसने देखा कि ये सब लोग
अब भी मेरे ख़िलाफ़ गहरी साज़िश कर रहे हैं और बाहर से शस्त्रों
वगैरह का भी गुप्त प्रबन्ध कर चुके हैं, तो उसने मजबूर होकर पटने
में ख़ोजा ग्रिगरी को, एलिस और उसके तमाम साथियों को—केवल
एक अंगरेज़ डॉक्टर फ़ुलरटन को छोड़कर—जगतसेठ और उसके
भाई महाराजा स्वरूपचन्द को, यानी उन सबको जो इस साज़िश
में शामिल थे, क़त्ल करवा दिया। कहा जाता है कि ख़ोजा ग्रिगरी
इस साज़िश का सरग़ना था।
इसके बाद जब अंगरेज़ पटने की ओर बढ़े तो मीर क़ासिम ने
[हाशिया: मीर क़ासिम के शासन का अंत] कर्मनासा नदी को पार कर कुछ सेना और तोप
ख़ाने सहित ४ दिसम्बर सन् १७६३ को अपनी
सरहद से निकल कर नवाब शुजाउद्दौला के

१६६ भारत में अंगरेज़ी राज
सूबे अवध में प्रवेश किया। तीन साल तक वह बंगाल का सूबेदार
रह चुका था। उसका सारा शासन काल आपत्तियों से भरा हुआ
था। अब इस प्रकार उसके शासन का अन्त हुआ। मीर क़ासिम
के बाक़ी प्रयत्नों और उसकी मृत्यु का ज़िक्र अगले अध्याय में किया
जायगा। निस्सन्देह वह योग्य, वीर और अपने देश और प्रजा
दोनों का सच्चा हितचिन्तक था। सिराजुद्दौला के समान वह
विश्वासघात का शिकार हुआ। उसके शासन काल और पतन के
सारे क़िस्से को पढ़कर और उसकी कोशिशों के साथ उसके
विरोधियों की समस्त करतूतों की तुलना कर प्रत्येक निष्पक्ष मनुष्य
के चित्त में उसकी ओर दया, प्रेम और सहानुभूति का उत्पन्न
होना स्वाभाविक है। बहुत दरजे तक वह अन्तिम भारतीय वीर
था, जिसने बंगाल की स्वाधीनता की रक्षा के लिए एक बार जी
तोड़ प्रयत्न किया और इसी प्रयत्न में अपने आपको मिटा डाला।

पाँचवाँ अध्याय
फिर मीर जाफ़र
७ जुलाई सन् १७६३ को कलकत्ते के अंग्रेज़ों ने समस्त बंगाल,
बिहार और उड़ीसा में यह एलान प्रकाशित कर
[हाशिया: अंग्रेज़ों की ओर] दिया कि ‘मीर मोहम्मद क़ासिमअली ख़ाँ’ के
[हाशिया: से एलान] जुल्मों के कारण उन्हें सूबेदारी की मसनद से
उतार कर उनकी जगह ‘मीर मोहम्मद जाफ़रअली ख़ाँ बहादुर’
को फिर से मसनद पर बैठा दिया गया है। इसी एलान में सब
सरकारी कर्मचारियों और प्रजा से अपील की गई कि आप लोग
“मीर मोहम्मद जाफ़रअली ख़ाँ बहादुर की मदद के लिए उनके
झंडे के नीचे आकर जमा हो जावें, ताकि मीर मोहम्मद जाफ़र
अली ख़ाँ बहादुर क़ासिमअली ख़ाँ के प्रयत्नों को निष्फल करके
अपनी सूबेदारी को पक्का कर सकें।”

१६८ भारत में अंगरेज़ी राज
७ जुलाई से पहले ही एक और नई सन्धि मीर जाफ़र के साथ
[हाशिया: मीर जाफ़र के साथ] कर ली गई थी, जिसके विषय में इतिहास लेखक
[हाशिया: नई सन्धि] एल्फिन्स्टन लिखता है :—
“अधिकांश अंगरेज़ यही कहते थे कि मीर
जाफ़र को फिर से मसनद पर बैठाना केवल उसके न्याय्य अधिकारों का उसे
वापस देना है, किन्तु फिर भी वे उससे नई और अधिक कड़ी शर्तें स्वीकार
करा लेने में न झिझके ।”*
बर्धमान इत्यादि तीनों ज़िले और जितनी रियायतें मीर क़ासिम
ने उन्हें दे रक्खी थीं वे सब इस नई सन्धि द्वारा क़ायम रक्खी
गईं। एल्फिन्स्टन लिखता है कि आइन्दा के लिए यह नियत कर
दिया गया कि नवाब छै हज़ार सवार और बारह हज़ार पैदल से
ज़्यादा फ़ौज अपने पास न रक्खे। तमाम हिन्दोस्तानी व्यापारियों
से पहले की तरह सब माल पर २५ फ़ी सदी महसूल वसूल किया
जावे। अंगरेज़ व्यापारी नमक पर ढाई फ़ी सदी महसूल दिया करें
और बाक़ी हर तरह के माल पर उन्हें बिना महसूल दिए देश भर
में व्यापार करने का अधिकार रहे। मीर जाफ़र अंगरेज़ों को युद्ध
के ख़र्च के लिए ३० लाख, अंगरेज़ी स्थल सेना के लिए २५ लाख
और जल सेना के लिए १२½ लाख रुपए दे, और अंगरेज़ व्याप-
रियों का जितना नुक़सान मीर क़ासिम के समय में देशी व्याप-
रियों से महसूल न लिए जाने के कारण हुआ है, अब मीर जाफ़र
उसे पूरा करे। सन्धि के समय कहा गया कि यह हरजाने की


  • Rise of British Power in India, p. 397.

फिर मीर जाफ़र १६६
रक़म पाँच लाख से अधिक न होगी, किन्तु बाद में इस पाँच
लाख की जगह ५३ लाख वसूल किए गए। सन्धि की इन शर्तों के
विषय में कर्नल मालेसन लिखता है :—
"देशभक्त मीर क़ासिम ने जिन जिन रिआयतों के देने से इनकार
कर दिया था, नीच और स्वार्थी मीर जाफ़र ने वह सब अंगरेज़ों को प्रदान
कर दीं।"*
इतिहास लेखक स्क्रैफ़टन लिखता है :—
"नवाब इसके बाद केवल एक बैंक की तरह रह गया, जिससे कम्पनी
के मुलाज़िम जितनी दफ़े और जितनी रक़म चाहें, ले सकते थे।"
मीर क़ासिम के ख़िलाफ़ मीर जाफ़र अंगरेज़ों के हाथों में एक
उपयोगी हथियार था। उसी के नाम पर मीर
[हाशिया: बंगाल की और बुरी हालत] क़ासिम के अनेक आदमियों को बहका बहका कर
अंगरेज़ों ने अपनी ओर फोड़ा। ऊदवानाला की
लड़ाई में मीर जाफ़र अंगरेज़ी सेना के साथ था। फिर भी मीर
जाफ़र का अहसान मानने के स्थान पर अंगरेज़ों ने उसे अब और
अधिक दबाना शुरू किया, यहाँ तक कि इस दूसरे बार की सूबेदारी
में उसकी और उसकी प्रजा दोनों की हालत धीरे धीरे पहले की
अपेक्षा कहीं अधिक दर्दनाक हो गई। सितम्बर सन् १७६४ में मीर
जाफ़र ने कलकत्ते की कौन्सिल के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें
उसने तेरह शिकायतें अंगरेज़ों के सामने रक्खीं। इन शिकायतों का

  • "Having obtained from the low ambition of Mir Jathr the advantages
    which the patriotism of Mir Kassim had refused to them."—Ibid p. 145.

२०० भारत में अंगरेज़ी राज
सार नीचे दिया जाता है, जिससे उस समय के बंगाल की
हालत का ख़ासा अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। शिकायतें इस
प्रकार थीं :—
१—पटने में करनलगंज और मारूगंज नाम की दो नई मंडियां
अंगरेज़ों ने क़ायम की हैं। वहाँ के अंगरेज़ अफ़सर पुरानी सरकारी
मंडियों के व्यापारियों को ज़बरदस्ती पकड़ पकड़ कर अपने यहाँ
ले जाते हैं, जिसके कारण मेरी मंडियाँ उजड़ गईं और मुझे एक
लाख का नुक़सान हो रहा है।
२—पटना और मुर्शिदाबाद की कचहरियों की यह हालत है कि
वहाँ पर तमाम व्यापारी अंगरेज़ी कोठियों की आड़ लेकर सरकारी
महसूल देने से इनकार कर देते हैं।
३—जगह जगह अंगरेज़ गुमाश्ते सरकार के बाग़ियों और
मुजरिमों को अपने यहाँ आश्रय देते हैं।
४—हल्के और घटिया सिक्के ढालकर टकसाल के अधिकार
का दुरुपयोग किया जा रहा है।
५—क़ासिमबाज़ार की कोठी के गुमाश्तों ने ज़बरदस्ती दम-
दम, शिवपुर और बामनघाट इन तीनों गांव पर क़ब्ज़ा कर लिया
है और एक कौड़ी मालगुज़ारी नहीं देते।
६—अंगरेज़ गुमाश्ते अपना तम्बाकू और दूसरा माल ताल्लुक़-
दारों और रय्यत के सर ज़बरदस्ती मढ़ देते हैं, जिससे मुल्क
वीरान हो रहा है और सरकार की आमदनी को बहुत भारी
नुक़सान हो रहा है।

फिर मीर जाफ़र २०१
७—पटना, मुंगेर इत्यादि के क़िलों में अंगरेज़ों के आदमी
ज़बरदस्ती घुसे बैठे हैं और मेरी एक नहीं सुनते।
८—बंगाल के गंजों (मंडियों) और गोलों में कई अंगरेज़ों के
आदमी ज़बरदस्ती नाज ख़रीद लेते हैं और जिस तरह चाहते बेचते
हैं, यहाँ तक कि मेरे फ़ौजदारों को फ़ौज की आवश्यकताओं के
लिए भी नाज नहीं मिलता।
६—पटने के अन्दर क़रीब चालीस मकानों पर, जो मुसाफ़िरों के
लिए बने हैं, कुछ अंगरेज़ों ने क़ब्ज़ा कर लिया है, यहाँ तक कि मुझे
अपने और अपने कुटुम्बियों के ठहरने के लिए भी जगह न मिल सकी।
१०—पूर्णिया की लकड़ी की मंडी से मुझे पचास हज़ार रुपए
साल वसूल होते थे। अब अंगरेज़ों ने उस पर क़ब्ज़ा कर लिया है
और मुझे एक कौड़ी नहीं मिलती।
११—यह क़ायदा कर दीजिये कि सरकार के नौकरों या
आदमियों को न कोई अंगरेज़ उकसावे और न उन्हें आश्रय दे।
१२—कम्पनी की कोठियों से जो सिपाही मुल्क के विविध
भागों में भेजे जाते हैं, वे गाँव के गाँव उजाड़ डालते हैं और उनके
अत्याचारों के कारण रय्यत गाँव छोड़ कर भाग जाती है।
१३—इस मुल्क के जो ग़रीब लोग सदा से नमक, छालिया,
तम्बाकू इत्यादि का व्यापार करते थे, उन सब की रोज़ी अब
यूरोपनिवासियों ने छीन ली है, जिससे कम्पनी को कोई फ़ायदा
नहीं और सरकारी आमदनी को बहुत बड़ा नुक़सान है। ❋

  • Long's Selections, pp. 356-358.

२०२ भारत में अंगरेज़ी राज
मीर जाफ़र ने प्रार्थना की कि मेरी ये शिकायतें दूर की
जावें, किन्तु कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल ने इस ओर तनिक भी
ध्यान न दिया ।
उधर मीर क़ासिम का साहस अभी तक टूटा न था । अपनी
[हाशिया: मीर क़ासिम के अन्तिम प्रयत्न] सरहद से बाहर निकल कर वह इन विदेशियों
के बल को तोड़ने के अन्तिम प्रयत्न कर रहा
था । सूबेदारी की सनद मीर क़ासिम को सम्राट
की ओर से बाज़ाब्ता अता हो चुकी थी और मीर जाफ़र को बिना
सम्राट की इजाज़त ज़बरदस्ती अंगरेज़ों ने सूबेदार बना दिया था ।
सम्राट शाहआलम अभी तक फाफामऊ ( इलाहाबाद ) में था ।
अवध का नवाब शुजाउद्दौला इस समय मुग़ल साम्राज्य का प्रधान
मंत्री और सम्राट का विशेष संरक्षक था । मीर क़ासिम ने सम्राट
और शुजाउद्दौला दोनों से मिलकर अंगरेज़ों और बंगाल का सब
हाल कह सुनाया । शुजाउद्दौला की माँ को उसने माँ और शुजाउद्दौला
को अपना भाई कह कर सम्बोधन किया । शुजाउद्दौला ने क़ुरान
हाथ में लेकर अंगरेज़ों को सज़ा देने और मीर क़ासिम को फिर से
मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठाने की क़सम खाई ।
बुन्देलखण्ड का राजा इधर कई वर्ष से विद्रोह कर रहा था ।
उसने दिल्ली दरबार को ख़िराज भेजना बन्द कर दिया था ।
शुजाउद्दौला सम्राट की ओर से उस पर चढ़ाई की तैयारी कर रहा
था । मीर क़ासिम ने इस मौक़े को ग़नीमत समझा, सम्राट और
शुजाउद्दौला से इजाज़त लेकर अपनी सेना और तोपख़ाने सहित

फिर मीर जाफ़र २०३
बुन्देलखण्ड पर चढ़ाई की और शीघ्र ही वहाँ के राजा को अधीन
कर लिया। राजा ने तमाम पिछला खिराज श्रंदा करने का वादा
किया। मीर क़ासिम इलाहाबाद लौट आया। सम्राट और उसका
वज़ीर मीर क़ासिम की इस सेवा से इतने ख़ुश हुए कि उन्होंने
तुरन्त अंगरेज़ों के विरुद्ध बंगाल पर चढ़ाई करने की तैयारी शुरू
कर दी। सम्राट की इस चढ़ाई का स्पष्ट उद्देश मोर क़ासिम को
फिर से मसनद पर बैठाना था।
किन्तु चढ़ाई करने सं पहले अंगरेज़ों को इसकी सूचना देना
और उनसे जवाब तलब करना ज़रूरी था।
अंगरेज़ों के नाम नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला ने इस समय सम्राट
शुजाउद्दौला का की श्रोर से नीचे लिखा पत्र अंगरेज़ गवर्नर
पत्र और उसकी कौन्सिल के नाम कलकत्ते भेजा :—
“हिन्दोस्तान के पिछले बादशाहों ने अंगरेज़ कम्पनी को महसूल माफ़
कर दिया, उन्हें बहुत सी बस्तियाँ और कोठियाँ अता कीं और उनके तमाम
कारबार में मदद की। इस तरह उन्होंने कम्पनी पर इतनी मेहरबानियों की
हैं और उसकी इतनी इज़्ज़त बढ़ाई है, जितनी न अपने मुल्क के व्यापारियों
के साथ कीं और न किसी दूसरी यूरोपियन क़ौम के साथ। इसके अलावा
हाल ही में बादशाह ने मेहरबानी करके मुनासिब से ज़्यादा ख़िताब और
रुतबे और उसके बाद जागीरें और दूसरी रिआयतें आप लोगों को अता की
हैं। बावजूद इन सब इनायतों के आप लोगों ने बादशाह के मुल्क में दख़ल
दिया, बर्धमान, चटग्राम वगैरह सरकारी इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया और
बिना दरबार की रज़ामन्दी के जिस नवाब को चाहा मसनद से उतार दिया

२०४ भारत में अंग्रेज़ी राज
और जिसे चाहा बैठा दिया । आप लोगों ने दरबार के आदमियों को अपने
यहाँ क़ैद कर लिया और शहनशाह की हुकूमत को तौहीन और उसकी
बेइज़्ज़ती की, आपने देश के व्यापारियों की तिजारत को बरबाद कर दिया,
बादशाह के बाग़ियों को अपने यहाँ पनाह दी, दरबार की आमदनी को
नुक़सान पहुँचाया और अपने ज़ुल्म से मुल्क के बाशिन्दों को पामाल किया ।
आप लोग अभी तक कलकत्ते से नई नई फ़ौजें भेज कर शाही इलाक़ों पर
लगातार हमले करते रहते हैं, यहाँ तक कि इलाहाबाद के सूबे के कई गांव
और परगनों को भी आप लोगों ने लूट लिया है; इन सब नाजायज़ हरकतों
की क्या वजह समझी जा सकती है, सिवाय इसके कि आपको दरबार की
क़तई परवा नहीं और आप खुद मुल्क पर क़ब्ज़ा करने की बेजा कोशिशों में
लगे हुए हैं ?
"अगर आपने यह सब अपने बादशाह के हुकुम या कम्पनी की हिदायत
से किया है, तो मेहरबानी करके मुझे पूरा पूरा हाल बताइए, ताकि मैं उसका
मुनासिब इलाज कर सकूँ, लेकिन अगर इन शरारतों की वजह आपकी
अपनी ही बेजा ख़्वाहिशें हैं, तो आइन्दा ऐसी हरकतों से बाज़ रहिए; हुकूमत
के कामों में दख़ल न दीजिए, हर जगह से अपने आदमियों को हटा कर उन्हें
अपने मुल्क को वापस भेज दीजिए, पहले की तरह कम्पनी की तिजारत जारी
रखिए और महज़ तिजारती कारबार तक ही अपने तईं महदूद रखिए ।
अगर आप इस तरह रहना चाहें तो शाही दरबार हमेशा से ज़्यादा आपकी
तिजारत में मदद देगा और आपके साथ रिआयतें करेगा । किसी ऊँचे दरजे
के ओहदेदार को बतौर अपने वकील के यहाँ भेज दीजिए, जो तमाम हालात
की मुझे ठीक ठीक इत्तला दे, ताकि मैं उसके मुताबिक़ अमल कर सकूँ ।