भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १६१
यह अंगरेज़ नवाब की सेना से निकल कर अंगरेज़ी सेना की ओर
चला आया और वहाँ से शत्रु की सेना को साथ ले उसी मार्ग से
रातों रात अचानक नवाब की सेना पर आ टूटा। क़िले के अन्दर
के और भी कई अफ़सर शत्रु से मिले हुए थे और “सीअरुल मुता-
ख़रीन” से पता चलता है कि अनेक अपने स्थान की अभेद्यता और
शत्रु की अशक्तता पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करके अपने कर्त्तव्य
से असावधान हो गए थे। ऐसी स्थिति में सेना का कर्त्तव्य विमूढ़
हो जाना स्वाभाविक था। नतीजा यह हुआ कि मीर क़ासिम के
पूरे पन्द्रह हज़ार सैनिक उस रात की लड़ाई में काम आए ।
इस अंगरेज़ विश्वासघातक के काम के बारे में कर्नल मालेसन
लिखता है :—
“केवल एक व्यक्ति के इस कार्य ने अंगरेज़ों की ना उम्मेदी को विश्वास
में बदल दिया ; और इस कार्य के नतीजे ने मीर क़ासिम की सेना के आत्म-
विश्वास को ना उम्मेदी में बदल दिया । अंगरेज़ी सेना के लिए इस आदमी ने
इस मौक़े पर ईश्वर का काम किया ।”*
“जनरल एडम्स ने मीर क़ासिम की सेना को केवल विजय ही
नहीं किया, बल्कि उसका संहार कर डाला ।”† मीर क़ासिम की
क़रीब चार सौ तोपें इस युद्ध में अंगरेज़ों के हाथ आईं ।
- "It was the act of a single individual which converted the despair of
the English into confidence; it was the consequence of that act which changed
the confidence of Mir Kassim's army into despair. The individual on this
occasion performed the divine function for the English army." -Ibid. p. 157.
† Ibid, p. 160.