भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १६५
लिखाया। अचानक एक दिन रात को एक बजे मीर क़ासिम के
एक विश्वस्त जासूस ने उसे जगाकर ख़बर दी—"आप बिछौने
पर पड़े क्या कर रहे हैं, आपका सेनापति गुरघिन ख़ाँ आपको
साफ़ फ़िरङ्गियों के हाथों में बेच रहा है! कुछ बाहर के लोगों के
साथ और मालूम होता है कि भीतर के लोगों, यानी आपके क़ैदियों,
के साथ भी उसकी साज़िश हो चुकी है।"
अभी तक एलिस और उसके अंगरेज़ साथियों के साथ मीर
क़ासिम ने बड़ी उदारता का व्यवहार किया था। इन खुले बाग़ियों
को ख़तम कर देने के बजाय वह तीन महीने से बराबर उन्हें आदर
पूर्वक अपने साथ रक्खे था और खिला पिला रहा था। किन्तु
'सीअरुल-मुताख़रीन' के अनुसार जब उसने देखा कि ये सब लोग
अब भी मेरे ख़िलाफ़ गहरी साज़िश कर रहे हैं और बाहर से शस्त्रों
वगैरह का भी गुप्त प्रबन्ध कर चुके हैं, तो उसने मजबूर होकर पटने
में ख़ोजा ग्रिगरी को, एलिस और उसके तमाम साथियों को—केवल
एक अंगरेज़ डॉक्टर फ़ुलरटन को छोड़कर—जगतसेठ और उसके
भाई महाराजा स्वरूपचन्द को, यानी उन सबको जो इस साज़िश
में शामिल थे, क़त्ल करवा दिया। कहा जाता है कि ख़ोजा ग्रिगरी
इस साज़िश का सरग़ना था।
इसके बाद जब अंगरेज़ पटने की ओर बढ़े तो मीर क़ासिम ने
[हाशिया: मीर क़ासिम के शासन का अंत] कर्मनासा नदी को पार कर कुछ सेना और तोप
ख़ाने सहित ४ दिसम्बर सन् १७६३ को अपनी
सरहद से निकल कर नवाब शुजाउद्दौला के