भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ भारत में अंगरेज़ी राज
७ जुलाई से पहले ही एक और नई सन्धि मीर जाफ़र के साथ
[हाशिया: मीर जाफ़र के साथ] कर ली गई थी, जिसके विषय में इतिहास लेखक
[हाशिया: नई सन्धि] एल्फिन्स्टन लिखता है :—
“अधिकांश अंगरेज़ यही कहते थे कि मीर
जाफ़र को फिर से मसनद पर बैठाना केवल उसके न्याय्य अधिकारों का उसे
वापस देना है, किन्तु फिर भी वे उससे नई और अधिक कड़ी शर्तें स्वीकार
करा लेने में न झिझके ।”*
बर्धमान इत्यादि तीनों ज़िले और जितनी रियायतें मीर क़ासिम
ने उन्हें दे रक्खी थीं वे सब इस नई सन्धि द्वारा क़ायम रक्खी
गईं। एल्फिन्स्टन लिखता है कि आइन्दा के लिए यह नियत कर
दिया गया कि नवाब छै हज़ार सवार और बारह हज़ार पैदल से
ज़्यादा फ़ौज अपने पास न रक्खे। तमाम हिन्दोस्तानी व्यापारियों
से पहले की तरह सब माल पर २५ फ़ी सदी महसूल वसूल किया
जावे। अंगरेज़ व्यापारी नमक पर ढाई फ़ी सदी महसूल दिया करें
और बाक़ी हर तरह के माल पर उन्हें बिना महसूल दिए देश भर
में व्यापार करने का अधिकार रहे। मीर जाफ़र अंगरेज़ों को युद्ध
के ख़र्च के लिए ३० लाख, अंगरेज़ी स्थल सेना के लिए २५ लाख
और जल सेना के लिए १२½ लाख रुपए दे, और अंगरेज़ व्याप-
रियों का जितना नुक़सान मीर क़ासिम के समय में देशी व्याप-
रियों से महसूल न लिए जाने के कारण हुआ है, अब मीर जाफ़र
उसे पूरा करे। सन्धि के समय कहा गया कि यह हरजाने की
- Rise of British Power in India, p. 397.