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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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१६२ भारत में अंग्रेज़ी राज
ऊदवानाला ही विदेशी व्यापारियों के विरुद्ध बंगाल के भारतीय
सूबेदारों की आशा का अन्तिम आधार था।
[ऊदवानाला की] ४ सितम्बर सन् १७६३ की रात को वह आशा
[पराजय] सदा के लिए टूट गई। जो चीज़ सिराजुद्दौला के
लिए प्लासी साबित हुई वही मीर क़ासिम के लिए ऊदवानाला
साबित हुआ, और दोनों जगह क़रीब क़रीब एक ही से उपायों द्वारा
अंगरेज़ व्यापारियों ने बंगाल की शाही सेना पर विजय प्राप्त की।
ऊदवानाला की पराजय का एक सबब यह भी बताया जाता
है कि उस रात को मीर क़ासिम ख़ुद अपनी सेना के साथ दुर्ग के
अन्दर मौजूद न था। अंगरेज़ इतिहास लेखक बोल्ट्स की राय है
कि यदि मीर क़ासिम स्वयं अपने अफ़सरों को सावधान रखनेऔर
अपने सैनिकों को उत्साह दिलाने के लिए मौजूद होता तो—"शायद
हो नहीं बल्कि बहुत ज़्यादा मुमकिन है कि उस दिन से अंगरेज़
कम्पनी के पास इन प्रान्तों में एक फुट ज़मीन भी न रह जाती।"*
ऊदवानाला की पराजय से मीर क़ासिम को बहुत बड़ा धक्का
[कुछ ख़ास ख़ास] लगा, किन्तु उसने विदेशियों की अधीनता
['विश्वासघातक] स्वीकार न की और न वह इतनी जल्दी हिम्मत
हारा। ऊदवानाला के बाद उसने मुंगेर के क़िले
को सँभाला। यह क़िला भी अत्यन्त मज़बूत था। उसकी रक्षा का

  • " . . . it is more than probable that, the English Company would
    have been left, from that day, without a single foot of ground in these
    Provinces."—Consideration on Indian Affairs, By Bolts, p. 43.