सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 727 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441

मीर क़ासिम १८७

से उतारने या दूसरा सूबेदार नियुक्त करने का अधिकार कभी
किसी ने न दिया था।
मीर जाफ़र के साथ जो नई सन्धि इस अवसर पर की गई
उसका ज़िक्र अगले अध्याय में किया जायगा।
कम्पनी की सेना मेजर एडम्स के अधीन ५ जुलाई को यानी
[हाशिया: कई छोटी छोटी लड़ाइयाँ] युद्ध के एलान से दो दिन पहले कलकत्ते से
मुर्शिदाबाद की ओर रवाना हुई। मीर क़ासिम
की सेना सिपहसालार मोहम्मद तक़ी ख़ाँ के
अधीन मुंगेर से चली। तक़ी ख़ाँ वीर और योग्य सेनापति
था, किन्तु उसकी तमाम तजवीज़ों में बात बात में मुर्शिदाबाद
का नायब नाज़िम सय्यद मोहम्मद ख़ाँ, जो अंगरेज़ों से मिला
हुआ था, रुकावटें डालता रहता था। तक़ी ख़ाँ की सेना के अन्दर
भी अंगरेज़ काफ़ी सफलता के साथ विश्वासघात के बीज बो चुके
थे। तीन स्थानों पर दोनों ओर की सेनाओं में कई छोटी बड़ी
लड़ाइयाँ हुईं। इन लड़ाइयों का विस्तृत हाल “सीअरुल-मुताख़रीन”
नामक ग्रन्थ में दिया हुआ है। उस ग्रन्थ में मुसलमान सेना के
अन्दर एक ख़ास देशघातक मिरज़ा ईरज ख़ाँ का ज़िक्र आता है,
जिसने भीतर ही भीतर अंगरेज़ों से मिलकर मीर क़ासिम और
मोहम्मद तक़ी ख़ाँ के साथ दग़ा की। क़रीब दो सौ यूरोपियन
और अन्य ईसाई, जो नवाब की सेना में ख़ासकर तोपख़ाने में
नौकर थे, ऐन मौक़े पर शत्रु की ओर जा मिले। इन लड़ाइयों में से
एक में मोहम्मद तक़ी ख़ाँ मार डाला गया। इन्हीं लड़ाइयों के