भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर क़ासिम १६३
उचित प्रबन्ध कर मीर क़ासिम अज़ीमाबाद (पटना) के लिए
रवाना हो गया। “सीअरुल-मुताख़रीन” से पता चलता है कि
मीर क़ासिम के जाते ही मुंगेर के क़िलेदार अरब अली ख़ाँ ने नक़द
रिशवत लेकर अपना क़िला चुपचाप अंगरेज़ों के सुपुर्द कर दिया।
अंगरेज़ों ने मुंगेर पर क़ब्ज़ा जमा कर अब मीर क़ासिम का पीछा
किया। महाराजा कल्यानसिंह की पुस्तक “ख़ुलासतुल तवारीख़”
में लिखा है कि अज़ीमाबाद क़िले के संरक्षक मीर मोहम्मदअली ख़ाँ
ने अपने लिए पाँच सौ रुपए मासिक पेन्शन कम्पनी से मंज़ूर करा
कर बिना विरोध वहाँ का क़िला भी शत्रु के हवाले कर दिया।
मीर क़ासिम को इस समय अपने चारों ओर सिवाय दग़ा के
और कुछ नज़र न आता था। अंगरेज़ों को अब केवल दो बातों की
चिन्ता थी। एक एलिस इत्यादि जो अंगरेज़ मीर क़ासिम के पास
अभी तक क़ैद थे उन्हें छुड़ा लेना और दूसरे किसी प्रकार मीर
क़ासिम को गिरफ़्तार करना। १६ सितम्बर सन् १७६३ को एडम्स
और कारनक ने मीर क़ासिम के एक फ़्रान्सीसी मुलाज़िम जाँती
(Gentil) को इस मज़मून का पत्र लिखा :—
“मुसलमानों के हाथों में जब कभी ताक़त होती है और उन्हें कोई डर
नहीं होता तो वे सदा हमारे सहधर्मियों और यूरोप निवासियों के साथ क्रूर
से क्रूर पाशविकता का व्यवहार करते हैं। किसी ईसाई के लिए मुसलमानों
की नौकरी करना बड़ी ज़िल्लत का काम है। हमारा यह भी अनुमान है कि
किसी बहुत ही ज़बरदस्त ज़रूरत से मजबूर होकर ही आपने इतनी ज़िल्लत
की नौकरी स्वीकार की होगी। अब ऐसी कष्टकर गुलामी से बच निकलने का
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