भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर मीर जाफ़र १६६
रक़म पाँच लाख से अधिक न होगी, किन्तु बाद में इस पाँच
लाख की जगह ५३ लाख वसूल किए गए। सन्धि की इन शर्तों के
विषय में कर्नल मालेसन लिखता है :—
"देशभक्त मीर क़ासिम ने जिन जिन रिआयतों के देने से इनकार
कर दिया था, नीच और स्वार्थी मीर जाफ़र ने वह सब अंगरेज़ों को प्रदान
कर दीं।"*
इतिहास लेखक स्क्रैफ़टन लिखता है :—
"नवाब इसके बाद केवल एक बैंक की तरह रह गया, जिससे कम्पनी
के मुलाज़िम जितनी दफ़े और जितनी रक़म चाहें, ले सकते थे।"
मीर क़ासिम के ख़िलाफ़ मीर जाफ़र अंगरेज़ों के हाथों में एक
उपयोगी हथियार था। उसी के नाम पर मीर
[हाशिया: बंगाल की और बुरी हालत] क़ासिम के अनेक आदमियों को बहका बहका कर
अंगरेज़ों ने अपनी ओर फोड़ा। ऊदवानाला की
लड़ाई में मीर जाफ़र अंगरेज़ी सेना के साथ था। फिर भी मीर
जाफ़र का अहसान मानने के स्थान पर अंगरेज़ों ने उसे अब और
अधिक दबाना शुरू किया, यहाँ तक कि इस दूसरे बार की सूबेदारी
में उसकी और उसकी प्रजा दोनों की हालत धीरे धीरे पहले की
अपेक्षा कहीं अधिक दर्दनाक हो गई। सितम्बर सन् १७६४ में मीर
जाफ़र ने कलकत्ते की कौन्सिल के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें
उसने तेरह शिकायतें अंगरेज़ों के सामने रक्खीं। इन शिकायतों का
- "Having obtained from the low ambition of Mir Jathr the advantages
which the patriotism of Mir Kassim had refused to them."—Ibid p. 145.