भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ भारत में अंगरेज़ी राज
सम्बन्ध में मालेसन लिखता है कि—"अंगरेज़ों की सफलता में
जितनी सहायता भारतीय नेताओं और नरेशों की परस्पर की ईर्षा
से मिली है उतनी दूसरी किसी भी चीज़ से नहीं मिली।”*
मीर क़ासिम की सेना ने अब ऊदवानाला नामक ऐतिहासिक
[हाशिया: उदवानाला में] स्थान पर अपना अन्तिम पड़ाव किया। प्राकृतिक
[हाशिया: दोनों ओर की] स्थिति और मीर क़ासिम की दूरदर्शिता दोनों ने
[हाशिया: फ़ौजें] मिलकर इस स्थान को सुरक्षित और अभेद्य बना
रक्खा था। एक ओर गंगा थी, दूसरी ओर
ऊदवानाला नाम की गहरी नदी जो गंगा में गिरती थी, तीसरी
ओर राजमहल की दुरारोह पहाड़ियाँ और चौथी ओर मीर
क़ासिम की बनवाई हुई ज़बरदस्त खाड़ियाँ और क़िलेबन्दी,
जिसके ऊपर सौ से अधिक मज़बूत तोपें लगी हुई थीं। पहाड़ियों
की तलहटी में खाड़ियों से ऊपर की ओर एक झील और एक लम्बी
चौड़ी दलदल थी। इस दलदल के अन्दर से ही दुर्ग से बाहर आने
जाने का एक अत्यन्त पेचदार रास्ता था, जिसका अंगरेज़ी सेना
को किसी तरह पता न चल सकता था। एक महीने तक मीर
क़ासिम की सेना इस दुर्ग के अन्दर और कम्पनी की सेना, जिसके
साथ बूढ़ा मीर जाफ़र भी था, ऊदवानाला के बाहर पड़ी रही,
किन्तु न अंगरेज़ अपनी तोपों के गोलों से संगीन क़िलेबन्दी पर
किसी तरह का असर पैदा कर सके और न भीतर की सेना को
- "Few things have more contributed to the success of the English
than the action of jealousy of each other of the native princes and leaders of
India."—Ibid, p. 150.