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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

लेखक की कठिनाइयां ५

दिख जावे। अंगरेज़ों के लिखे हुए भारतीय इतिहास क़रीब क़रीब शुरू से
आख़ीर तक इसी दोष से रंगे होते हैं। वास्तव में शायद संसार के किसी
भी देश का इतिहास इस क़ुदरती दोष द्वारा इतना अधिक विकृत नहीं किया
गया जितना हिन्दोस्तान का। हिन्दोस्तान और इङ्गलिस्तान का सम्बन्ध ही
इस तरह का है कि इस सम्बन्ध के एक बार शुरू हो जाने के बाद निष्पक्ष
भारतीय इतिहास का लिखा जाना क़रीब क़रीब नामुमकिन हो गया। एक
ओर अंगरेज़ लेखकों की साम्राज्य प्रिय दृष्टि और दूसरी ओर अंगरेज़ी काल
के ज़्याद़ातर भारतीय लेखकों की विदेशी शिक्षा, मानसिक दासता और
आजीविका की विकट परिस्थिति। नतीजा यह है कि भारतीय इतिहास की
जो पुस्तकें आजकल हमें मिलती हैं, उनमें से अधिकांश में निरर्थक तुच्छ
बातों पर ज़ोर दिया जाता है और इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं की
अवहेलना की जाती है, उन्हें दबाया जाता है, ऐतिहासिक घटनाओं के
सिलसिले के सिलसिले ग़लत बयान किए जाते हैं और अनेक व्यक्तियों के
चरित्र को सफ़ेद की जगह काला और काले की जगह सफ़ेद रंग कर हमारे
सामने पेश किया जाता है, अनेक सच्ची घटनाओं का इतिहास में पता तक नहीं
चलता और अनेक कल्पित घटनाएँ सच्ची कह कर बयान की जाती हैं। इसी
लिए इक्का दुक्का बिरले अपवादों को छोड़कर हिन्दोस्तानियों और ख़ास कर सर-
कारी विश्वविद्यालयों के हिन्दोस्तानी प्रोफ़ेसरों के लिखे इतिहास इस विषय
में और भी अधिक दूषित और लज्जास्पद दिखाई देते हैं। यह सब हिन्दोस्तान
की इस समय की ख़िलाफ़ क़ुदरत परिस्थिति का क़ुदरती नतीजा है।
इन सब विचारों के समर्थन में हम केवल थोड़े से यूरोपीय विद्वानों की
सम्मति नक़ल करते हैं।

पुस्तक प्रवेश
प्रसिद्ध फ्रान्सीसी विद्वान हरवे लिखता है—
“सब तरह के साहित्य में अभी तक इतिहास ही मनुष्य
को सब से अधिक दुराचार की ओर ले जाने वाला और उसके
चरित्र को सब से अधिक भ्रष्ट करने वाला साहित्य रहा है। जब
कभी क़ौमों के नाम पर धन लोलुपता और रक्त पिपासा को शान्त
किया जाता है, इतिहास इस तरह की लोलुपता और सार्वजनिक
हत्या को सराहनीय ठहराता है। इतिहास के पृष्ठों में छल और
कपट को चतुर राजनैतिकता का सबूत माना जाता है। जो चीज़
मामूली मनुष्यों में पाप समझी जाती है वह राज दरबारों में और
सिंहासनों पर प्रशंसनीय मानी जाती है।”*
प्रसिद्ध इतिहास लेखक लैकी लिखता है—
“राजनीतिज्ञों की ग़रज़ सदा अपना काम निकालना रहती
है । X X X सत्य से निस्वार्थ प्रेम और ज़ोरों की राजनैतिक
भावना ये दोनों साथ साथ नहीं चल सकतीं। उन तमाम देशों
में, जहाँ कि लोगों के विचार और उनके सोचने के तरीक़े
अधिकतर राजनैतिक जीवन के आधार पर बने हों, हमें यह
दिखाई देता है कि लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि को ही सत्य की
कसौटी बना बैठते हैं।”†

  • "History, so far, has been the most immoral and perverting branch
    of literature. It exalts greed and wholesale murder when greedy and murder-
    ous lusts are satisfied in the names of nations. Fraud is taken as evidence of
    clever diplomacy. What is counted immoral down low is held admirable
    in Courts and on Thrones.”—M. Herve.
    † “The object of the politician is expediency . . . a disinterested

लेखक की कठिनाइयां ७
प्रसिद्ध अंगरेज़ तत्ववेत्ता हरबर्ट स्पेन्सर ने लिखा है कि फ्रान्स का
एक बादशाह जब इतिहास की कोई पुस्तक पढ़ना चाहता था तो अपने
'लाइब्रेरियन से कहता था,—"मेरे झूठ बोलने वाले को ले आओ।" स्पेन्सर
लिखता है कि फ्रान्सीसी बादशाह का यह कहना बेजा न था। इसके बाद
आजकल के इतिहासों का ज़िक्र करते हुए स्पेन्सर लिखता है—
"राजाओं के शासन कालों, लड़ाइयों और इस तरह की
मामूली घटनाओं के अलावा जो आजकल की तमाम क़ौमों के
इतिहास में मिलती हैं, हमें सिवाय उन सन्धियों के जो तोड़ने
ही की ग़रज़ से की जाती हैं, उन सरकारी पत्रों के जो बेईमान
और झूठे अफ़सरों के हाथ के लिखे होते हैं, उन गप्पों से भरे
हुए ख़तों के जो दरबारियों द्वारा भेजे जाते हैं, और इसी तरह की
और चीज़ों के, कोई ऐसी बात नहीं मिलती जिस पर हम विश्वास
कर सकें। इस तरह की सामग्री से कोई भी सत्य का खोजी सत्य
का पता कैसे लगा सकता है ? × × × "*
सरकारी काग़ज़ों में झूठ
भारत में अंगरेज़ी राज का इतिहास ज़्यादातर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की
love of truth can hardly co-exist with a strong political spirit. In all count-
ries where the habits of thought have been mainly formed by political life,
we may discover a disposition to make expediency the test of truth."—Lecky
in his Rationalism in Europe.

  • "Beyond accounts of kings' reigns, of battles, and of incidents
    named in the chronicles of all the nations concerned, we have nothing to
    depend on but treaties made to be broken, despatches of corrupt and lying
    officials, gossiping letters of courtiers and so forth. How from these ma-
    terials shall we distil the truth? . . ."-Herbert Spencer's Facts and
    Comments.

८ पुस्तक प्रवेश
रिपोर्टों और काग़ज़ों से ही संग्रह करना पड़ता है, किन्तु कम्पनी के तमाम
प्रकाशित पत्रों के विषय में अंगरेज़ इतिहास लेखक जेम्स मिल, जो
इङ्गलिस्तान में कम्पनी के 'पत्र-व्यवहार विभाग' का प्रमुख रह चुका था
और जिसका ब्रिटिश भारत का इतिहास सब से अधिक प्रमाण माना
जाता है, लिखता है—
“कम्पनी के डाइरेक्टरों ने इस तरह की बातों और ख़बरों
को दबा देने में, जिन्हें वे प्रकाशित करना न चाहते थे, शुरू से
आख़ीर तक बड़ी चतुरता दिखाई है।”*
कप्तान कनिङ्गम की मशहूर किताब “सिखों के इतिहास” की सन्
१८४३ की एडीसन के विज्ञापन में पीटर कनिङ्गम लिखता है—
“हाल के ज़माने की हिन्दोस्तान की तारीख़ के लिए जो
छपी हुई सामग्री मिलती है वह इस तरह की नहीं है जिस पर
कोई इतिहास लेखक विश्वास कर सके। पार्लिमेण्ट के दोनों
हिस्सों, हाउस ऑफ़ कॉमन्स और हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स से जो
सरकारी काग़ज़ात जनता के सामने पेश किए जाते हैं, उनमें भी
उस समय की राजनैतिक दलबन्दी के हितों की दृष्टि से तब्दीलियाँ
कर दी गई हैं, या इस ग़लत ख़याल से कि सच्ची बात के खुल
जाने से लोगों के भावों को आघात न पहुँचे, काट छाँट कर दी
गई है।”†


  • "Under the skill which the Court of Directors have all along
    displayed in suppressing such information as they wished not to appear."—
    James Mill.
    † "The printed materials for the recent History of India are not of

लेखक की कठिनाइयां ६
इतिहास लेखक सर जॉन के, जो इङ्गलिस्तान के इण्डिया ऑफ़िस
के 'राजनैतिक और गुप्त विभाग' का सेक्रेटरी रह चुका था, अफ़ग़ान युद्ध
का ज़िक्र करते हुए एक जगह लिखता है—
“पार्लिमेण्ट के सरकारी काग़ज़ों के संग्रह में अलेक्ज़ेण्डर
बर्न्स के चरित्र और उसकी ज़िन्दगी दोनों को ग़लत बयान किया
गया है। लोग समझते हैं कि ये पार्लिमेण्ट के काग़ज़ इतिहास
के लिए सबसे अच्छी सामग्री हैं। किन्तु सच यह है कि आम तौर
पर ये सरकारी काग़ज़ केवल काट छाँट की हुई दस्तावेज़ों और
जाली काग़ज़ों का एक ऐसा यकतरफ़ा संग्रह होते हैं जिसे राज
मन्त्रियों की मोहर सच्चा कह कर चलता कर देती है, जिससे
मौजूदा नस्ल के लोग धोखे में आ जाते हैं, और आइन्दा नस्लों
को ख़तरनाक झूठों का एक सिलसिला वसीयत में मिलता है।”*
पार्लिमेण्ट के काग़ज़ों की इस ख़ास जालसाज़ी का अधिक हाल पाठकों
को इस पुस्तक के अन्दर अफ़ग़ान युद्ध के बयान में पढ़ने को मिलेगा।
that character on which historians can rely. State Papers, presented to the
people by both Houses of Parliament, have been altered to suit the tempo-
rary views of political warfare, or abridged out of mistaken regard to the
tender feelings of survivors.”—P. Cunningham in the advertisement to the
2nd edition of History of the Sikhs, by Captain J. D. Cunningham. 1853.

  • “The character and career of Alexander Burnes have both been
    mis-represented in those collections of State Papers which are supposed to
    furnish the best materials of history but which are often only one-sided
    compilations of garbled documents, counterfeits, which the ministerial
    stamp forces into currency, defrauding a present generation, and handing
    down to prosterity a chain of dangerous lies.”—History of the Afghan War,
    by Kaye, vol. ii, p. 13.

१० पुस्तक प्रवेश
जब कि स्वयं ब्रिटिश पार्लिमेण्ट के काग़ज़ों की यह हालत है तो अंगरेज़ों
के लिखे हुए मामूली ऐतिहासिक उल्लेखों पर कहाँ तक विश्वास किया
जा सकता है ।
इतिहास लेखक फ़्रीमैन स्वीकार करता है कि सरकारी एलानों, पत्रों
और राजनैतिक दस्तावेज़ों का सारा क्षेत्र “झूठ का मनोवाञ्छित क्षेत्र है ।”
वह लिखता है—
“फिर भी ये झूठ शिक्षाप्रद झूठ हैं,—ये उन लोगों के कहे
हुए झूठ हैं, जो सच्चाई से वाक़िफ़ थे । कई तरह के उपायों से
झूठ के अन्दर से भी सच्चाई का पता लगाया जा सकता है,
किन्तु किसी झूठ पर विश्वास कर लेना उससे सच्चाई का पता
लगाने का तरीक़ा नहीं है । वास्तव में वह मनुष्य बालक की तरह
भोला है, जो हर शाही एलान पर या पार्लिमेण्ट के हर एक्ट
की भूमिका पर विश्वास करले, और उनसे यह अन्दाज़ा लगावे
कि अमुक अमुक बड़े लोगों ने क्या क्या किया और उसके करने
में उनकी क्या ग़रज़ थी ।”*
इतिहास से झूठ की कुछ मिसालें
इस पुस्तक के लेखक को आज १९२८ ई० से चार साल पहले तक

  • “. . . Here we are in the very chosen region of lies . . . yet
    they are instructive lies ; they are lies told by people who know the truth;
    truth may even, by various processes, be got out of the lies ; but it will not
    be got out of them by the process of believing them. He is of childlike
    simplicity indeed who believes every royal proclamation or the preamble
    of every Act of Parliament, as telling us, not only what certain august
    persons did, but the motives which led them to do it.”—Freeman.

लेखक की कठिनाइयां ११
इस बात का अनुमान न हो सकता था कि अंगरेज़ विद्वानों के लिखे हुए
भारत के अधिकांश इतिहासों में झूठ की मात्रा कितनी अधिक और कितनी
भयङ्कर है।
सिन्ध के अंगरेज़ विजेता सर चार्ल्स नेपियर के भाई मेजर जनरल
विलियम नेपियर की पुस्तक "दी कॉन्क्वेस्ट ऑफ़ सिन्ध" की शुमार सिन्ध के
ऊपर सबसे अधिक प्रामाणिक अंगरेज़ी पुस्तकों में की जाती है। अंगरेज़ों की
सिन्ध विजय को मनुष्य जाति के ऊपर एक बहुत बड़ा उपकार साबित करने
के लिये विलियम नेपियर ने सिन्ध निवासियों और उनके मुसलमान
शासकों के चरित्र पर जो अनेक कलङ्क लगाए हैं उनमें से एक कलङ्क शिशु
हत्या भी है। नेपियर लिखता है—
“और ये राक्षस खुद अपने बच्चों की किस तरह हत्या करते
थे ? पहले तो वे भ्रूणहत्या के लिए दवाइयां पिलाते थे; यदि
इससे काम न चलता था तो कभी कभी वे बच्चों के पैदा होते ही
अपने हाथों से काट कर उनके टुकड़े टुकड़े कर डालते थे; किन्तु
अधिकतर वे यह करते थे कि इन बच्चों को गद्दों के नीचे डाल कर
उन पर खुद बैठ जाते थे, और जब कि उनके बच्चों का उनके नीचे
घुट कर दम निकलता था, वे उनके ऊपर बैठे हुए तम्बाकू पीते
रहते थे, शराब पीते रहते थे और अपने इस नारकीय कृत्य पर
एक दूसरे से मज़ाक़ करते रहते थे।" ✽
✽ "And how did these monsters destroy their own children? First they
gave potions, called Odalisques, to procure abortion; if these failed, they
sometimes chopped the children to pieces with their own hands immediately

१२ पुस्तक प्रवेश
कप्तान ईस्टविक, जिसे ठीक उन्हीं दिनों कई साल सिन्ध में रहने और
सिन्ध के देशी शासकों और वहाँ की प्रजा दोनों से मिलने जुलने का अव-
सर मिला और जो सिन्ध की भाषाओं और वहाँ के रस्मोरिवाज से अच्छी
तरह परिचित था, इस लज्जाजनक झूठ की आलोचना करते हुए एक दूसरे
यूरोपियन विद्वान ग्रैटन का नीचे लिखा वाक्य नक़ल करता है—
“इतिहास में अनेक बातें ऐसी लिखी मिलती हैं, जिनको
सच साबित करने या जिनका खण्डन करने का कोई ख़ास मूल्य
नहीं है । सदाचार की इस तरह की ऊँची (किन्तु असत्य) मिसालें
इतिहास में मिलती हैं, जिन्हें यदि एक बार लोगों ने सच्चा मान
लिया है तो उनसे दुनियां का भला ही हुआ है । किन्तु जब
किसी व्यक्ति या जाति के चरित्र पर कलङ्क लगाए जाते हैं और
जब हम यह देखते हैं कि कितनी आसानी से उन झूठे कलङ्कों का
प्रचार किया जाता है, कितने शौक़ के साथ लोग उन्हें पढ़ते और
सुनते हैं, और जिन बातों को गढ़ लेने या फैलाने में कुछ भी
ख़र्च नहीं होता, किन्तु जिनका पूरी तरह खण्डन करने में ज़िन्दगी
भर मेहनत और इस तरह की परिस्थिति की ज़रूरत होती है,
जिसका मिलना क़रीब क़रीब नामुमकिन हो जाता है, उन बातों
पर लोग सहज ही में और बेपरवाही के साथ विश्वास कर लेते हैं,


after birth; but more frequently placed them under cushions and sat down,
smoking and drinking and jesting with each other about their hellish work,
while their children were being suffocated beneath them."—The Conquest of
Sindh, part ii, p. 348.

लेखक की कठिनाइयां १३
जब हम यह सब देखते हैं तो हर ईमानदार लेखक या पाठक का
इस तरह के 'इतिहास की सच्चाई पर सन्देह' करना कुदरती है।”*
यह दोहराने की ज़रूरत नहीं है कि स्वयं अंगरेज़ गवाहों ही के अनुसार
विलियम नेपियर का ऊपर लिखा बयान बिल्कुल कल्पित, झूठा और
निराधार है। आज से केवल ८२ साल पहिले जिस समय सिन्ध पर ईस्ट
इण्डिया कम्पनी का क़ब्ज़ा हुआ, उस समय सिन्ध के अमीरों और सिन्ध
की प्रजा दोनों का सार्वजनिक और व्यक्तिगत चरित्र नेपियर और उसके देश-
वासियों के चरित्र की निस्बत कहीं अधिक पवित्र और ऊँचा था। नेपियर
ने अपनी पुस्तक में जिस तरह सिन्ध निवासियों के चरित्र पर निराधार झूठे
कलङ्क लगाए हैं, उसी तरह सिन्ध के अमीरों को भी बदनाम करने की
भरसक कोशिश की है। जिन अमीरों ने कभी जीवन भर किसी मादक द्रव्य
को अपने पास नहीं आने दिया, जो तम्बाकू के धुएँ तक से बचते थे, और
जो स्त्री जाति के सतीत्व की रक्षा का ग़ैर मामूली ध्यान रखते थे, उनको
नेपियर ने शराबी और कुचरित्र चित्रित किया है। हम ये सब बातें सर्वथा
विश्वस्त अंगरेज़ लेखकों ही के आधार पर लिख रहे हैं। इन बातों का विस्तृत
हाल पाठकों को इस पुस्तक के अन्दर सिन्ध के अध्याय में पढ़ने को मिलेगा।

  • "There are many statements of history which it is immaterial to
    substantiate or disprove. Splendid pictures of public virtue have often
    produced their good if once received as fact. But, when private character
    is at stake, every conscientious writer or reader will cherish his 'historic
    doubts,' when he reflects on the facility with which calumny is sent abroad,
    the avidity with which it is received, and the careless ease with which men
    credit what it costs little to invent and propogate, but requires an age of
    trouble, and an almost impossible conjunction of opportunities, effectually
    to refute."—Frattan's History of the Netherlands, vol. ii, p. 242

३४ पुस्तक प्रवेश
भारतीय नरेशों पर झूठे कलङ्क .
ठीक इसी तरह जिस सिराजुद्दौला ने अपने नाना अलीवर्दी ख़ाँ की
अन्तिम आज्ञा के अनुसार तख़्त पर बैठने के दिन से मरने की घड़ी तक
कभी मदिरा को हाथ तक न लगाया था, * और जिसके व्यक्तिगत चरित्र
में कोई ऐसा दोष न था, जो उस समय के ९९ प्रतिशत भारतीय नरेशों या
अंगरेज़ शासकों में न पाया जाता हो, उसे अंगरेज़ी पुस्तकों में परले दरजे
का दुराचारी बयान किया जाता है। यही अन्याय मीर क़ासिम, हैदरअली,
टीपू सुलतान, नन्दकुमार, लक्ष्मीबाई इत्यादि अन्य भारतीय वीरों और
वीरांगनाओं के चरित्र के साथ किया गया है। इन सब बातों का अधिक
हाल इस पुस्तक के अन्दर जगह जगह दिया गया है। इतिहास लेखक सर
जॉन के साफ़ लिखता है—
“× × × हम लोगों में यह एक रिवाज है कि पहले किसी
देशी नरेश का राज उससे छीन लेते हैं और फिर पदच्युत नरेश
पर या उस मनुष्य पर, जो उसका उत्तराधिकारी बनने वाला था,
झूठे कलंक लगाकर उन्हें बदनाम करते हैं।”†
फ़र्जी चित्र
जिस तरह व्यक्तियों के चरित्र के साथ किया जाता है उसी तरह
घटनाओं के साथ, यहाँ तक कि अनेक पुस्तकों में भारतीय नरेशों के चित्र

  • Scrafton's Reflections, as quoted in “बाङ्गलार इतिहास, नवाबी
    आमल,” लेखक कालीप्रसन्न बन्द्योपाध्याय ।
    † “. . . It is a custom among us . . . to take a native ruler's
    kingdom and then to revile the deposed ruler or his would be successor.”—
    Sir John Kaye's History of the Sepoy War, vol. iii, pp. 361, 362.

लेखक की कठिनाइयां १५
तक बिल्कुल ग़लत मिलते हैं। जिस हैदरअली ने होश सँभालने के बाद से
कभी दाढ़ी या मूँछ नहीं रक्खी उसका दाढ़ी और मूँछों वाला चित्र अनेक
अंगरेज़ी इतिहासों में मिलता है ! कैसल की 'हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया' में जो
अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है, हमने सम्राट बहादुरशाह का एक चित्र
देखा, जिसके पैरों में राजपूती जूता, दाढ़ी चढ़ी हुई और धोती मारवाड़ के
तर्ज़ पर बँधी हुई है ! सच यह है कि जो पुस्तकें भारत के इतिहास पर
स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई जाती हैं, उनमें तारीख़ों, राजाओं के नामों
या अत्यन्त मोटी मोटी घटनाओं को छोड़ कर बाक़ी बातों में से कम से
कम ६० फ़ी सदी का मूल्य एक साधारण उपन्यास से अधिक नहीं है, और
वह भी निहायत ख़तरनाक उपन्यास, जिसका असर क़ौम के बढ़ते हुए
दिमाग़ों पर अत्यन्त ज़हरीला पड़ता है।
किराये के लेखक
निस्सन्देह कुछ भारतीय विद्वानों के लिखे हुए इसी समय के ऐति-
हासिक वृत्तान्त एक दरजे तक ज़्यादा सच्चे और विश्वसनीय हैं। किन्तु
एक तो इस तरह के वृत्तान्त हैं ही बहुत कम और फुटकर, और दूसरे
इनके सम्बन्ध में हमें एक और गहरी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
फ़ारसी का ग्रन्थ 'सोअरुल मुताख़रीन' भारतीय मुग़ल साम्राज्य के
अन्तिम दिनों का ख़ासा विश्वस्त इतिहास माना जाता है और है भी।
फिर भी इस ग्रन्थ का विद्वान रचयिता सय्यद गुलाम हुसेन अपने ग्रन्थ में
स्वीकार करता है कि सम्राट शाहआलम और अंगरेज़ों के संग्रामों के दिनों
में उसे लोभ देकर अंगरेज़ों ने अपनी ओर मिला लिया था। निस्संदेह

१६ पुस्तक प्रवेश
उस ज़माने का उसका सारा वृत्तान्त अंगरेज़ों के एक धनक्रीत लेखक का
लिखा वृत्तान्त है ।
और भी अनेक भारतीय और अन्य लेखकों को फ़ारसी और दूसरी
भाषाओं में झूठे ऐतिहासिक वृत्तान्त लिखने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी
की ओर से समय समय पर धन मिलता रहा है । मिसाल के तौर पर
लॉर्ड विलियम बेण्टिङ्क ने ऐबे दुबॉय का प्रसिद्ध फ़्रान्सीसी ग्रन्थ, जिसमें
हिन्दुओं के उस समय के रहन सहन इत्यादि का ज़िक्र है, आठ हज़ार
रुपये देकर दुबॉय से ख़रीदा, कम्पनी की ओर से उसे अंगरेज़ी में प्रकाशित
कराया और अन्त में कम्पनी ने उसके लिए दुबॉय को आजीवन पेनशन
दी । हैदरअली की एक फ़ारसी जीवनी लिखने के लिए मिरज़ा इक़बाल को
कम्पनी की ओर से रुपए दिए गए । हैदरअली की यह जीवनी शुरू से
आख़ीर तक झूठे कलङ्कों और पक्षपात से भरी हुई है । करनल माइल्स ने
हैदरअली की एक जीवनी अंगरेज़ी में लिखी है, जिसके विषय में करनल
माइल्स का बयान है कि वह पुस्तक मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी की
फ़ारसी पुस्तक 'निशाने हैदरी' का अनुवाद है और 'निशाने हैदरी' का मूल
फ़ारसी मसविदा मलका विक्टोरिया के निजी पुस्तकालय में मौजूद था ।
हमने करनल माइल्स की पुस्तक को पढ़ा । हम यह देख कर चकित रह गए
कि उस पुस्तक के अन्दर पृष्ठ के पृष्ठ ऐसे हैं, जिनका एक एक शब्द एक
फ़्रान्सीसी लेखक एम० एम० डी० एल० टी० के ग्रन्थ 'हिस्ट्री ऑफ़ हैदरशाह'
के एक अंगरेज़ी संस्करण के कुछ पृष्ठों से मिलता है । यह फ़्रान्सीसी किताब
हैदरअली के जीवनकाल में लिखी गई थी । मीर हुसेनअली ख़ाँ किरमानी
की किताब ज़ाहिर है उसके बाद की लिखी हुई है । यदि फ़ारसी लेखक ने

लेखक की कठिनाइयां १७
फ्रान्सीसी किताब से या उसके अंगरेज़ी अनुवाद से ये पृष्ठ लिए होते तो यह
नामुमकिन था कि फ़ारसी से अङ्गरेज़ी तर्जुमा करने में ठीक वही शब्द ज्यूँ के
त्यूँ लिखे जा सकते। ज़ाहिर है कि मीर हुसेनअली ख़ाँ का फ़ारसी मसविदा
या तो कहीं है ही नहीं, या कम से कम जिसे कर्नल माइल्स ने उस
मसविदे का अनुवाद कह कर प्रकाशित किया है, वह उस मसविदे का
अनुवाद नहीं है।
इसी तरह की और भी अनेक मिसालें अंगरेज़ों के ज़माने के हिन्दोस्तान
के लिखे हुए इतिहास से दी जा सकती हैं। सच यह है कि आजकल की
यूरोपीय सभ्यता में और ख़ासकर यूरोपीय राजनीति में ईमानदारी या सच
के लिए कोई जगह नहीं, और यूरोपीय इतिहास कला बहुत दरजे तक
यूरोपीय राजनीति का केवल एक अङ्ग है। प्रोफेसर सीली, प्रोफेसर गोल्ड-
विन स्मिथ और इतिहास लेखक फ़्रीमैन जैसे यूरोपियन विद्वानों ने इतिहास
को केवल राजनीति का एक अङ्ग स्वीकार किया है। और 'Politics has
no conscience,' यानी 'राजनीति में पाप पुण्य के विवेक का कोई
स्थान नहीं', अंगरेज़ी की एक मशहूर कहावत है। ꕤ
• इस तरह के झूठे और कल्पित इतिहास का नतीजा हमारी क़ौमी
ꕤ पिछले साल एच० डी० लैसवेल की लिखी 'प्रोपैगैंडा टेकनीक इन
वर्ल्ड वार' नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक में साफ़ लिखा
है कि आगामी महायुद्ध के लिये युद्धविद्या, शस्त्राभ्यास इत्यादि के साथ
साथ समस्त राजनीतिज्ञों, शासकों और सेनापतियों को झूठ बोलने की विद्या
का भी बाज़ाब्ता वैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिये। लेखक के अनुसार पिछले
महायुद्ध के दिनों में झूठ बोलने की कला में सब से अधिक सफलता
२

१८ पुस्तक प्रवेश
ज़िन्दगी के लिये और ख़ास कर हमारे शिक्षित देशवासियों की मानसिक
अवस्था पर इतना गहरा पड़ा है कि आज हमारी क़ौमी तरक्क़ी के मार्ग में
यही सबसे बड़ी बाधा दिखाई दे रही है। इसके अलावा अनेक भयङ्कर
ऐतिहासिक भ्रान्तियों और झूठों का स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों और अन्य
उपायों द्वारा इतना ज़्यादा प्रचार किया गया है कि आज हमारे असंख्य
विचारवान देशवासी इन ऐतिहासिक भ्रान्तियों की भूलभुलइयों में पड़
कर अपनी सलामती के उपायों को सोच सकने के बिलकुल नाक़ाबिल
हो रहे हैं।
हमारे इतिहास के भ्रम
कहा जाता है, अनादिकाल से भारत पर पश्चिमोत्तर सीमा की ओर
से विदेशियों या विदेशी जातियों के हमले होते रहे हैं, भारत कभी भी इन
आरम्भ में इङ्गलिस्तान ने दिखाई, उसके बाद अमरीका इस कला में
इंगलिस्तान से भी बढ़ गया । वह लिखता है—
"राष्ट्रपति विल्सन ने इस कला में जो दक्षता दिखलाई वह संसार के
इतिहास में अद्वितीय है ।” लेखक ने पिछले महायुद्ध के समय के अंगरेज़ों
के कई प्रसिद्ध झूठों की मिसालें दी हैं ! मसलन संसार के अख़बारों में छपा
था कि जरमन सिपाहियों ने बेल्जियम वालों के अनेक बच्चों के हाथ काट
डाले । यह बात शुरू से आख़ीर तक झूठी थी । इस ख़बर के सम्बन्ध में युद्ध
के समाप्त होने पर इतालियों के प्रधान-मन्त्री सीन्योर नित्ती ने लिखा था—
"युद्ध के बाद एक धनाढ्य अमरीकन ने अपना एक दूत इस उद्देश
से बेल्जियम भेजा कि जिन ग़रीब बालकों के नन्हें नन्हें हाथ काट डाले

[Page Header]
लेखक की कठिनाइयां १६

हमलों से अपनी रक्षा नहीं कर सका और एक दूसरे के बाद लगातार
मुख़्तलिफ़ विदेशी शासनों का शिकार होता रहा है। कहा जाता है कि
इस तरह के विदेशी हमलों में भारत के ऊपर सबसे अधिक भयङ्कर हमला
मुसलमानों का था। भारत के मुसलमान आक्रमक असभ्य, धर्मान्ध और
अन्यायी थे, जिन्होंने अंगरेज़ों के आने से पहले क़रीब एक हज़ार साल तक
भारतवर्ष को अपने अत्याचारों से कुचले रक्खा; प्राचीन हिन्दू धर्म और
हिन्दू संस्कृति का सत्यानाश कर डाला और हमारे करोड़ों देशवासियों को
तलवार के ज़ोर से धर्मभ्रष्ट कर मुसलमान बना लिया। हमसे कहा जाता
गये हैं, उनकी जीविका का प्रबन्ध कर दिया जाय। इस दूत को एक भी
इस तरह का बालक नहीं मिल सका। जिन दिनों मैं इतालिया सरकार का
प्रधान मन्त्री था, मैंने और मिस्टर लायड जार्ज ने मिल कर इन भीषण
इलज़ामों की सत्यता का पता लगाने के लिए विस्तृत छान बीन की। इनमें
से कम से कम कई इलज़ामों के साथ मनुष्यों और स्थानों के नाम तक हमें
बताये गये थे। किन्तु हमारे छान बीन करने पर ये तमाम क़िस्से झूठे
निकले।"—"विशाल भारत" अगस्त १६२८ ।
एक दूसरी बात यह भी कही गई थी कि जरमनी में एक कारख़ाना
खुला है, जिसमें सिपाहियों की लाशों को उबाल कर उनसे साबुन और
ग्लिसरीन बनाया जाता है। इस कारख़ाने के फ़ोटो तक अंगरेज़ी अख़बारों
में छपे थे। "सन् १६२५ में जाकर इस असत्य समाचार की पोल खुली।
जरमन सरकार ने एलान किया कि यह एक बिलकुल झूठा क़िस्सा है और
इसमें सच का नामनिशान तक नहीं। आखिर इंगलिस्तान के वैदेशिक
विभाग के मन्त्री सर आस्टिन चैम्बरलेन को जरमनी का यह कथन स्वीकार

२० पुस्तक प्रवेश
है कि भारत के इन मुसलमान शासकों में सिवाय अय्याशी, लूट मार
और धर्मान्धता के और कोई विशेषता न थी। यहाँ तक कि बड़े से बड़े या
अच्छे से अच्छे मुग़ल बादशाहों को हिन्दुओं और हिन्दोस्तान के लिए
अधिक से अधिक 'मीठी छुरी' कह कर बयान किया जाता है। हमें विश्वास
दिलाया जाता है कि मुसलमानों ने कोई भी उपकार भारत पर नहीं किया,
उनके शासन में कोई बात तारीफ़ की न थी, उन्होंने भारत के राष्ट्रीय
जीवन को हर तरह से नुक़सान पहुँचाया और आज तक हिन्दुओं और
मुसलमानों में कभी भी वास्तविक मेल न हुआ और न हो सकता है। जो
इतिहास स्कूलों में पढ़ाए जाते हैं उनमें दिखाया जाता है कि अंगरेज़ों के
कर लेना पड़ा और उसने कहा भी—'I trust that this false
report will not again be revived.' यानी 'मैं विश्वास करता
हूं कि इस झूठी अफ़वाह को अब कोई न दोहराएगा।'
इसी तरह के और भी बेशुमार झूठ उन दिनों जरमनों के विरुद्ध
अंगरेजों और मित्र राष्ट्रों की ओर से प्रकाशित होते रहते थे ।
ऐसी ही एक दूसरी पुस्तक "फ़ाल्सहुड इन वार टाइम" इंगलिस्तान
की पार्लिमेण्ट के मेम्बर आर्थर पॉन्सन्बी ने हाल में प्रकाशित की है।
पॉन्सन्बी इंगलिस्तान के मन्त्रिमण्डल में वैदेशिक विभाग का उपमन्त्री रह
चुका है। इस पुस्तक की आलोचना करते हुए पार्लिमेण्ट के एक दूसरे
प्रसिद्ध सदस्य बिलफ़्रेड वेलॉक ने अगस्त सन् १६२८ के "विशाल-भारत"
में लिखा है—
"इस पुस्तक में यह बात अकाट्य प्रमाणों द्वारा सिद्ध की गई है
कि पिछले महायुद्ध का सञ्चालन झूठ और फ़रेब के ज़रिये किया गया था

लेखक की कठिनाइयां २१
आने से पहले भारत में चारों ओर कुशासन और अराजकता '
और आए दिन आपसी लड़ाइयाँ होती रहती थीं, अंगरेज़ों ने, जो उस
समय भारतवासियों से कहीं अधिक सभ्य थे, भारत में आकर शान्ति और
सुशासन क़ायम किया और देश को सभ्यता की ओर ले जाना शुरू किया।
इन्हीं सब बातों के आधार पर और वर्त्तमान अंगरेज़ी सत्ता के सच्चे रूप को
हमसे छिपा कर हमें यह यक़ीन दिलाया जाता है कि अंगरेज़ों का भारतीय
शासन भारतवासियों के लिए एक बहुत बड़े सौभाग्य की चीज़ है और
हमारी सारी भावी उन्नति तथा देश की शान्ति अंगरेज़ी शासन के इस देश
में बने रहने पर निर्भर है। यदि आज दुर्भाग्यवश अंगरेज़ी शासन भारत से
मिट जाय तो सम्भव है कि या तो पश्चिमोत्तर की ओर से कोई दूसरी शक्ति
आकर भारत पर क़ब्ज़ा कर ले या हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे से लड़
लड़ कर देश को फिर बरबादी की ओर ले जायँ !
इन सब बातों के जवाब में हम यह दिखलाने का प्रयत्न करेंगे कि
और आरम्भ से लेकर अन्त तक युद्ध के उद्देश्यों के विषय में संसार की
जनता को धोखे में रक्खा गया।”
"यदि संसार में कोई युद्ध ऐसा हुआ है, जो ऊपर से देखने में धर्म के
भावों से प्रेरित मालूम होता था, तो वह पिछला महायुद्ध था। कम से कम
मित्र दल वाले यही कहते थे कि हम धार्मिक युद्ध कर रहे हैं । मित्रों की
ओर से यह एलान किया गया था कि हम लोग छोटी छोटी जातियों की
स्वाधीनता के लिए और सन्धियों की पवित्रता की रक्षा के लिए युद्ध कर रहे
हैं । हमारा उद्देश सैनिक शासन ( Militarism ) को दूर करना है !
“कैसी धोखेबाज़ी थी ! कैसा पाखण्ड था ! कैसा झूठ था !”

२२ पुस्तक प्रवेश
अंगरेज़ों के आने से पहले भारत के ऊपर अन्य विदेशियों के हमले कितने,
कब कब और किस ढङ्ग के हुए और भारत ने उनका कहाँ तक सफलता
के साथ मुक़ाबला किया। हम यह भी दिखलाएँगे कि बाहर से इस तरह
के हमलों का होना भारत ही की एक विशेषता है या संसार के अन्य देशों
के इतिहास में भी यह एक सामान्य घटना है। हम यह भी दिखाएँगे कि
यूरोप के विविध देशों और स्वयं इङ्गलिस्तान के ऊपर इस तरह के हमले
कभी हुए हैं या नहीं, यदि हुए हैं तो कितने और यूरोप के देशों ने उन
हमलों का भारत की निस्बत अधिक सफलता के साथ मुक़ाबला किया है
या नहीं। हम यह भी बयान करेंगे कि भारत पर मुसलमानों के हमले से
पहले यूरोप के विविध देशों पर भी मुसलमानों के हमले हुए थे या नहीं,
और यदि हुए थे तो यूरोपियन देशों ने भारत की तुलना में उनका किस
तरह मुक़ाबला किया। हम इस बात की भी पूरी जाँच करना चाहेंगे कि
भारत के ऊपर मुसलमानों के हमले किस ढङ्ग के थे, भारत के लिए उन हमलों
के नतीजे क्या हुए, भारत के अन्दर इसलाम मत का प्रचार वास्तव में किस
ढङ्ग से और किन उपायों द्वारा किया गया, हिन्दुओं के साथ भारत के
मुसलमान शासकों का व्यवहार आद्योपान्त किस ढङ्ग का रहा, दोनों धर्मों
के क़रीब क़रीब एक हज़ार साल के सम्पर्क में भारत भर के अन्दर हिन्दुओं
और मुसलमानों में किस तरह का सम्बन्ध रहा। शिल्प, विज्ञान, शिक्षा,
चित्रकला, कृषि, व्यापार, उद्योग धन्धों, सुशासन और समृद्धि की दृष्टि से
भारत ने मुसलमानों के शासन में कहाँ तक उन्नति या अवनति की,
अंगरेज़ों के सम्पर्क के समय सभ्यता के विविध अङ्गों में भारत की क्या
अवस्था थी, इङ्गलिस्तान की उस समय क्या हालत थी, किन कारणों से

वे और हम २३
और किन उपायों द्वारा अंगरेज़ों का राज भारत में क़ायम हुआ, भारत के
लिए उसके क्या नतीजे हुए और भविष्य में उससे छुटकारा पाने की किस
तरह आशा की जा सकती है ।
वे और हम
१७ वीं सदी का इंगलिस्तान
वास्तव में भारत और इङ्गलिस्तान का सम्पर्क दो अलग अलग सभ्य-
ताओं और अलग अलग आदर्शों का एक दूसरे से टकराना था । इसलिए
और बातों से पहले हम उस समय के इङ्गलिस्तान की हालत का, जब कि
हिन्दोस्तान और इङ्गलिस्तान का पहली बार सम्पर्क हुआ, संक्षिप्त बयान दे
देना चाहते हैं ।
१६ वीं और १७ वीं सदी के इंगलिस्तान की हालत को बयान करते
हुए प्रसिद्ध इतिहासज्ञ ड्रेपर लिखता है—
“किसानों की झोपड़ियाँ नरसलों और छड़ियों की बनी हुई
होती थीं जिनके ऊपर गारा फेर दिया जाता था । घर में आग
घास जला कर तैयार की जाती थी और धुएँ के निकलने के लिए
कोई जगह न होती थी । जिस तरह का सामान उस समय के
एक अंगरेज़ किसान के घर में होता था, और जिस तरह से वह
ज़िन्दगी बसर करता था, उससे मालूम होता था कि गाँव के
पास नदी के किनारे जो ऊदबिलाव मेहनत से माँद बना कर

२४ पुस्तक प्रवेश
रहता था, उस ऊदबिलाव की हालत में और उस किसान की
हालत में ज़्यादा फ़र्क़ न था। सड़कों पर डाकू फिरते रहते थे,
नदियों पर समुद्री लुटेरे और लोगों के कपड़ों और बिस्तरों में
जुएँ। आम तौर पर लोगों की ख़ुराक होती थी—मटर, उड़द,
जड़ें और वृक्षों की छालें। कोई ऐसा धन्धा न था, न कोई
तिजारत थी जिससे बारिश न होने की सूरत में किसान दुष्काल
से बच सके। मौसम की सख़्ती से बचने का मनुष्यों के पास
बिल्कुल कोई उपाय न था। आबादी बहुत कम थी, और महा-
मारी और अन्न के अभाव से और घटती रहती थी। शहर के
लोगों की हालत भी गाँव के लोगों से कुछ अच्छी न थी। शहर
वालों का बिछौना भुस का एक थैला होता था और तकिये की
जगह लकड़ी का एक गोल टुकड़ा। जो शहर वाले खुशहाल होते
थे वे चमड़े के कपड़े पहनते थे, जो ग़रीब होते थे वे अपने हाथ
और पैरों पर पवाल की पूलियाँ लपेट कर अपने को सरदी से बचाते
थे। × × × जिन शहरों में शीशे की या तैल पत्र की कोई खिड़की
तक न होती थी, वहाँ किसी तरह के कारीगर के लिए कहाँ
गुञ्जाइश थी। कहीं कोई कारख़ाना न था, जिसमें कोई कारीगर
आराम से बैठ सके। ग़रीबों के लिए कोई वैद्य न था। × × ×
सफ़ाई का कहीं कोई इन्तज़ाम था ही नहीं।”
आगे चल कर उस समय के यूरोप के सदाचार को बयान करते हुए
ड्रेपर लिखता है—
“जिस तेज़ी के साथ गरमी की बीमारी उन दिनों तमाम