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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 41

लेखक की कठिनाइयां १५
तक बिल्कुल ग़लत मिलते हैं। जिस हैदरअली ने होश सँभालने के बाद से
कभी दाढ़ी या मूँछ नहीं रक्खी उसका दाढ़ी और मूँछों वाला चित्र अनेक
अंगरेज़ी इतिहासों में मिलता है ! कैसल की 'हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया' में जो
अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है, हमने सम्राट बहादुरशाह का एक चित्र
देखा, जिसके पैरों में राजपूती जूता, दाढ़ी चढ़ी हुई और धोती मारवाड़ के
तर्ज़ पर बँधी हुई है ! सच यह है कि जो पुस्तकें भारत के इतिहास पर
स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई जाती हैं, उनमें तारीख़ों, राजाओं के नामों
या अत्यन्त मोटी मोटी घटनाओं को छोड़ कर बाक़ी बातों में से कम से
कम ६० फ़ी सदी का मूल्य एक साधारण उपन्यास से अधिक नहीं है, और
वह भी निहायत ख़तरनाक उपन्यास, जिसका असर क़ौम के बढ़ते हुए
दिमाग़ों पर अत्यन्त ज़हरीला पड़ता है।
किराये के लेखक
निस्सन्देह कुछ भारतीय विद्वानों के लिखे हुए इसी समय के ऐति-
हासिक वृत्तान्त एक दरजे तक ज़्यादा सच्चे और विश्वसनीय हैं। किन्तु
एक तो इस तरह के वृत्तान्त हैं ही बहुत कम और फुटकर, और दूसरे
इनके सम्बन्ध में हमें एक और गहरी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
फ़ारसी का ग्रन्थ 'सोअरुल मुताख़रीन' भारतीय मुग़ल साम्राज्य के
अन्तिम दिनों का ख़ासा विश्वस्त इतिहास माना जाता है और है भी।
फिर भी इस ग्रन्थ का विद्वान रचयिता सय्यद गुलाम हुसेन अपने ग्रन्थ में
स्वीकार करता है कि सम्राट शाहआलम और अंगरेज़ों के संग्रामों के दिनों
में उसे लोभ देकर अंगरेज़ों ने अपनी ओर मिला लिया था। निस्संदेह