भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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रहता था, उस ऊदबिलाव की हालत में और उस किसान की
हालत में ज़्यादा फ़र्क़ न था। सड़कों पर डाकू फिरते रहते थे,
नदियों पर समुद्री लुटेरे और लोगों के कपड़ों और बिस्तरों में
जुएँ। आम तौर पर लोगों की ख़ुराक होती थी—मटर, उड़द,
जड़ें और वृक्षों की छालें। कोई ऐसा धन्धा न था, न कोई
तिजारत थी जिससे बारिश न होने की सूरत में किसान दुष्काल
से बच सके। मौसम की सख़्ती से बचने का मनुष्यों के पास
बिल्कुल कोई उपाय न था। आबादी बहुत कम थी, और महा-
मारी और अन्न के अभाव से और घटती रहती थी। शहर के
लोगों की हालत भी गाँव के लोगों से कुछ अच्छी न थी। शहर
वालों का बिछौना भुस का एक थैला होता था और तकिये की
जगह लकड़ी का एक गोल टुकड़ा। जो शहर वाले खुशहाल होते
थे वे चमड़े के कपड़े पहनते थे, जो ग़रीब होते थे वे अपने हाथ
और पैरों पर पवाल की पूलियाँ लपेट कर अपने को सरदी से बचाते
थे। × × × जिन शहरों में शीशे की या तैल पत्र की कोई खिड़की
तक न होती थी, वहाँ किसी तरह के कारीगर के लिए कहाँ
गुञ्जाइश थी। कहीं कोई कारख़ाना न था, जिसमें कोई कारीगर
आराम से बैठ सके। ग़रीबों के लिए कोई वैद्य न था। × × ×
सफ़ाई का कहीं कोई इन्तज़ाम था ही नहीं।”
आगे चल कर उस समय के यूरोप के सदाचार को बयान करते हुए
ड्रेपर लिखता है—
“जिस तेज़ी के साथ गरमी की बीमारी उन दिनों तमाम