भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ पुस्तक प्रवेश
भारतीय नरेशों पर झूठे कलङ्क .
ठीक इसी तरह जिस सिराजुद्दौला ने अपने नाना अलीवर्दी ख़ाँ की
अन्तिम आज्ञा के अनुसार तख़्त पर बैठने के दिन से मरने की घड़ी तक
कभी मदिरा को हाथ तक न लगाया था, * और जिसके व्यक्तिगत चरित्र
में कोई ऐसा दोष न था, जो उस समय के ९९ प्रतिशत भारतीय नरेशों या
अंगरेज़ शासकों में न पाया जाता हो, उसे अंगरेज़ी पुस्तकों में परले दरजे
का दुराचारी बयान किया जाता है। यही अन्याय मीर क़ासिम, हैदरअली,
टीपू सुलतान, नन्दकुमार, लक्ष्मीबाई इत्यादि अन्य भारतीय वीरों और
वीरांगनाओं के चरित्र के साथ किया गया है। इन सब बातों का अधिक
हाल इस पुस्तक के अन्दर जगह जगह दिया गया है। इतिहास लेखक सर
जॉन के साफ़ लिखता है—
“× × × हम लोगों में यह एक रिवाज है कि पहले किसी
देशी नरेश का राज उससे छीन लेते हैं और फिर पदच्युत नरेश
पर या उस मनुष्य पर, जो उसका उत्तराधिकारी बनने वाला था,
झूठे कलंक लगाकर उन्हें बदनाम करते हैं।”†
फ़र्जी चित्र
जिस तरह व्यक्तियों के चरित्र के साथ किया जाता है उसी तरह
घटनाओं के साथ, यहाँ तक कि अनेक पुस्तकों में भारतीय नरेशों के चित्र
- Scrafton's Reflections, as quoted in “बाङ्गलार इतिहास, नवाबी
आमल,” लेखक कालीप्रसन्न बन्द्योपाध्याय ।
† “. . . It is a custom among us . . . to take a native ruler's
kingdom and then to revile the deposed ruler or his would be successor.”—
Sir John Kaye's History of the Sepoy War, vol. iii, pp. 361, 362.