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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

लेखक की कठिनाइयां १३
जब हम यह सब देखते हैं तो हर ईमानदार लेखक या पाठक का
इस तरह के 'इतिहास की सच्चाई पर सन्देह' करना कुदरती है।”*
यह दोहराने की ज़रूरत नहीं है कि स्वयं अंगरेज़ गवाहों ही के अनुसार
विलियम नेपियर का ऊपर लिखा बयान बिल्कुल कल्पित, झूठा और
निराधार है। आज से केवल ८२ साल पहिले जिस समय सिन्ध पर ईस्ट
इण्डिया कम्पनी का क़ब्ज़ा हुआ, उस समय सिन्ध के अमीरों और सिन्ध
की प्रजा दोनों का सार्वजनिक और व्यक्तिगत चरित्र नेपियर और उसके देश-
वासियों के चरित्र की निस्बत कहीं अधिक पवित्र और ऊँचा था। नेपियर
ने अपनी पुस्तक में जिस तरह सिन्ध निवासियों के चरित्र पर निराधार झूठे
कलङ्क लगाए हैं, उसी तरह सिन्ध के अमीरों को भी बदनाम करने की
भरसक कोशिश की है। जिन अमीरों ने कभी जीवन भर किसी मादक द्रव्य
को अपने पास नहीं आने दिया, जो तम्बाकू के धुएँ तक से बचते थे, और
जो स्त्री जाति के सतीत्व की रक्षा का ग़ैर मामूली ध्यान रखते थे, उनको
नेपियर ने शराबी और कुचरित्र चित्रित किया है। हम ये सब बातें सर्वथा
विश्वस्त अंगरेज़ लेखकों ही के आधार पर लिख रहे हैं। इन बातों का विस्तृत
हाल पाठकों को इस पुस्तक के अन्दर सिन्ध के अध्याय में पढ़ने को मिलेगा।

  • "There are many statements of history which it is immaterial to
    substantiate or disprove. Splendid pictures of public virtue have often
    produced their good if once received as fact. But, when private character
    is at stake, every conscientious writer or reader will cherish his 'historic
    doubts,' when he reflects on the facility with which calumny is sent abroad,
    the avidity with which it is received, and the careless ease with which men
    credit what it costs little to invent and propogate, but requires an age of
    trouble, and an almost impossible conjunction of opportunities, effectually
    to refute."—Frattan's History of the Netherlands, vol. ii, p. 242