भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंलेखक की कठिनाइयां १७
फ्रान्सीसी किताब से या उसके अंगरेज़ी अनुवाद से ये पृष्ठ लिए होते तो यह
नामुमकिन था कि फ़ारसी से अङ्गरेज़ी तर्जुमा करने में ठीक वही शब्द ज्यूँ के
त्यूँ लिखे जा सकते। ज़ाहिर है कि मीर हुसेनअली ख़ाँ का फ़ारसी मसविदा
या तो कहीं है ही नहीं, या कम से कम जिसे कर्नल माइल्स ने उस
मसविदे का अनुवाद कह कर प्रकाशित किया है, वह उस मसविदे का
अनुवाद नहीं है।
इसी तरह की और भी अनेक मिसालें अंगरेज़ों के ज़माने के हिन्दोस्तान
के लिखे हुए इतिहास से दी जा सकती हैं। सच यह है कि आजकल की
यूरोपीय सभ्यता में और ख़ासकर यूरोपीय राजनीति में ईमानदारी या सच
के लिए कोई जगह नहीं, और यूरोपीय इतिहास कला बहुत दरजे तक
यूरोपीय राजनीति का केवल एक अङ्ग है। प्रोफेसर सीली, प्रोफेसर गोल्ड-
विन स्मिथ और इतिहास लेखक फ़्रीमैन जैसे यूरोपियन विद्वानों ने इतिहास
को केवल राजनीति का एक अङ्ग स्वीकार किया है। और 'Politics has
no conscience,' यानी 'राजनीति में पाप पुण्य के विवेक का कोई
स्थान नहीं', अंगरेज़ी की एक मशहूर कहावत है। ꕤ
• इस तरह के झूठे और कल्पित इतिहास का नतीजा हमारी क़ौमी
ꕤ पिछले साल एच० डी० लैसवेल की लिखी 'प्रोपैगैंडा टेकनीक इन
वर्ल्ड वार' नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक में साफ़ लिखा
है कि आगामी महायुद्ध के लिये युद्धविद्या, शस्त्राभ्यास इत्यादि के साथ
साथ समस्त राजनीतिज्ञों, शासकों और सेनापतियों को झूठ बोलने की विद्या
का भी बाज़ाब्ता वैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिये। लेखक के अनुसार पिछले
महायुद्ध के दिनों में झूठ बोलने की कला में सब से अधिक सफलता
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