भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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जब कि स्वयं ब्रिटिश पार्लिमेण्ट के काग़ज़ों की यह हालत है तो अंगरेज़ों
के लिखे हुए मामूली ऐतिहासिक उल्लेखों पर कहाँ तक विश्वास किया
जा सकता है ।
इतिहास लेखक फ़्रीमैन स्वीकार करता है कि सरकारी एलानों, पत्रों
और राजनैतिक दस्तावेज़ों का सारा क्षेत्र “झूठ का मनोवाञ्छित क्षेत्र है ।”
वह लिखता है—
“फिर भी ये झूठ शिक्षाप्रद झूठ हैं,—ये उन लोगों के कहे
हुए झूठ हैं, जो सच्चाई से वाक़िफ़ थे । कई तरह के उपायों से
झूठ के अन्दर से भी सच्चाई का पता लगाया जा सकता है,
किन्तु किसी झूठ पर विश्वास कर लेना उससे सच्चाई का पता
लगाने का तरीक़ा नहीं है । वास्तव में वह मनुष्य बालक की तरह
भोला है, जो हर शाही एलान पर या पार्लिमेण्ट के हर एक्ट
की भूमिका पर विश्वास करले, और उनसे यह अन्दाज़ा लगावे
कि अमुक अमुक बड़े लोगों ने क्या क्या किया और उसके करने
में उनकी क्या ग़रज़ थी ।”*
इतिहास से झूठ की कुछ मिसालें
इस पुस्तक के लेखक को आज १९२८ ई० से चार साल पहले तक
- “. . . Here we are in the very chosen region of lies . . . yet
they are instructive lies ; they are lies told by people who know the truth;
truth may even, by various processes, be got out of the lies ; but it will not
be got out of them by the process of believing them. He is of childlike
simplicity indeed who believes every royal proclamation or the preamble
of every Act of Parliament, as telling us, not only what certain august
persons did, but the motives which led them to do it.”—Freeman.