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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 727 में से

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पृष्ठ 32

पुस्तक प्रवेश
प्रसिद्ध फ्रान्सीसी विद्वान हरवे लिखता है—
“सब तरह के साहित्य में अभी तक इतिहास ही मनुष्य
को सब से अधिक दुराचार की ओर ले जाने वाला और उसके
चरित्र को सब से अधिक भ्रष्ट करने वाला साहित्य रहा है। जब
कभी क़ौमों के नाम पर धन लोलुपता और रक्त पिपासा को शान्त
किया जाता है, इतिहास इस तरह की लोलुपता और सार्वजनिक
हत्या को सराहनीय ठहराता है। इतिहास के पृष्ठों में छल और
कपट को चतुर राजनैतिकता का सबूत माना जाता है। जो चीज़
मामूली मनुष्यों में पाप समझी जाती है वह राज दरबारों में और
सिंहासनों पर प्रशंसनीय मानी जाती है।”*
प्रसिद्ध इतिहास लेखक लैकी लिखता है—
“राजनीतिज्ञों की ग़रज़ सदा अपना काम निकालना रहती
है । X X X सत्य से निस्वार्थ प्रेम और ज़ोरों की राजनैतिक
भावना ये दोनों साथ साथ नहीं चल सकतीं। उन तमाम देशों
में, जहाँ कि लोगों के विचार और उनके सोचने के तरीक़े
अधिकतर राजनैतिक जीवन के आधार पर बने हों, हमें यह
दिखाई देता है कि लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि को ही सत्य की
कसौटी बना बैठते हैं।”†

  • "History, so far, has been the most immoral and perverting branch
    of literature. It exalts greed and wholesale murder when greedy and murder-
    ous lusts are satisfied in the names of nations. Fraud is taken as evidence of
    clever diplomacy. What is counted immoral down low is held admirable
    in Courts and on Thrones.”—M. Herve.
    † “The object of the politician is expediency . . . a disinterested