भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
इस्लाम और भारत ७५
मलबार तट पर आकर बसने लगे थे। इतिहास लेखक स्टररॉक लिखता है
कि—"सातवीं सदी से लेकर ईरानी और अरब सौदागर भारत के पश्चिमी
तट पर अलग अलग बन्दरगाहों में बड़ी बड़ी तादाद में आकर बसने लगे।
ये लोग इसी देश की स्त्रियों के साथ शादियाँ कर लेते थे। इनकी बस्तियाँ
मलबार में ख़ास तौर पर बड़ी और महत्वपूर्ण थीं, क्योंकि वहाँ पर बहुत
शुरू ज़माने से मालूम होता है राज की यह एक नीति चली आती थी कि
बन्दरगाहों में व्यापारियों को हर तरह की सुविधाएँ दी जावें।"*
धीरे धीरे दक्खिन में मुसल्मानों का प्रभाव बढ़ता गया। राज की
ओर से उन्हें तिजारत करने और ज़मीन ख़रीदने के साथ साथ अपने
नए धर्म का प्रचार करने की भी पूरी सुविधाएँ दी जाने लगीं। नवीं सदी
तक ये लोग समस्त पश्चिमी तट पर फैल गए। हम लिख चुके हैं कि भारत
में उस समय बौद्ध मत और जैन मत का हिन्दू मत और उसकी
नई सम्प्रदायों के साथ संग्राम जारी था। इन अनेक नई हिन्दू सम्प्रदायों के
मुक़ाबले में, जिनका हम ऊपर ज़िक्र कर आए हैं और जिनका ज़ोर उस
समय बढ़ता जा रहा था, इस्लाम के सीधे सादे और सरल सिद्धान्तों
और उसके अन्दर मनुष्यमात्र की समता के विचार की ओर लोगों का ध्यान
ज़ोरों के साथ आकर्षित हुआ। इस्लाम के विरुद्ध पक्षपात या उसकी ओर
द्वेष का कोई सबब उस समय तक मौजूद न था। नवीं सदी के शुरू
में ही मलबार के हिन्दू राजा चेरामन पेरूमल ने, जिसकी राजधानी
कोडङ्गलूर थी, इस्लाम मत स्वीकार कर लिया।† राजा का नाम अब्दुर-
- Sturrock: S. Kanara, Madras District Manuals; p. 180.
† Logan: Malabar, vol. i, p. 245.
७६ पुस्तक प्रवेश
रहमान सानीनी रक्खा गया । इस्लाम मत स्वीकार करने के बाद अब्दुर-
रहमान अरब गया । चार साल बाद अरब में ही उसकी मृत्यु हुई । अरब
से उसने कई मुसलमान विद्वानों और प्रचारकों को भारत भेजा, उनकी
मारफ़त अपने उत्तराधिकारियों को शासन प्रबन्ध के लिए हिदायतें दीं,और
यह भी हिदायत दी,कि देश के अन्दर नए मत के प्रचार में अरब विद्वानों
को पूरी सहायता दी जाय । राजा चेरामन पेरूमल के उत्तराधिकारियों
ने बड़े हर्ष के साथ अरब विद्वानों का स्वागत किया और उनके आदेशानुसार
मलबार तट पर निराकार की उपासना के लिए ११ नई मसजिद बनवाईं ।
कालीकट के राजा का मुसलमान होना
कालीकट के सामुरी राजा और त्रिवानकुर के महाराजा उसी चेरामन
पेरूमल के वंशज और उत्तराधिकारी हैं । इन दोनों स्थानों पर उस १,१००
साल पहले की घटना की याद में हाल तक ( सन् १६१२ ई० ) यह रिवाज
चला आता था कि जिस समय नया सामुरी अपनी गद्दी पर बैठता था तो
मुसलमानों की तरह उसका मुण्डन किया जाता था, मुसलमानों के से उसे
कपड़े पहनाए जाते थे, एक मोपल्ला उसके सिर पर ताज रखता था,* राज-
तिलक के बाद से उसे जातिच्युत की तरह समझा जाता था, अपने घर के
लोगों के साथ भी फिर वह सहभोज नहीं कर सकता और कोई नय्यर उसे
स्पर्श नहीं करता । समझा यह जाता है कि प्रत्येक सामुरी चेरामन पेरूमल
के अरब से लौटने के इन्तज़ार में केवल उसके एक प्रतिनिधि की हैसियत से
तख़्त पर बैठता है । त्रिवानकुर के महाराजाओं को गद्दी पर बैठते समय जब
खड्ग हाथ में दी जाती है, तब आज पर्यन्त उन्हें यह कहना पड़ता है—
- Quadir Husain Khan : South Indian Mussalmans, Madras Christian
College Magazine ( 1912-13 ), p. 241.
इस्लाम और भारत ७७
"मैं इस खड्ग को उस समय तक रक्खूँगा, जब तक कि मेरा वह चचा,
जो मक्का गया है, लौट न आए।"*
सामुरी ने अपने राज में मुसलमानों को हर तरह की सहायता दी।
कोई नय्यर किसी नम्बूंतरी ब्राह्मण के बराबर में न बैठ सकता था, किन्तु
कोई भी मुसलमान बैठ सकता था। मुसलमानों का धर्मगुरु थङ्गल सामुरी
के साथ साथ पालकी में निकलता था। अरबों और मुसलमानों की मदद
से सामुरी ने अपने राज की सीमाओं को खूब बढ़ाया, और राज की समृद्धि
में बहुत बड़ी उन्नति हुई। वर्त्तमान कालीकट का नगर उस समय के एक
मुसलमान क़ाज़ी ही का बसाया हुआ है। मलबार के राजाओं की जल
सेना के सेनापति अधिकतर मुसलमान ही होते थे, जो 'अलीराजा' कहलाते
थे। इसलाम धर्म के प्रचार में भी सामुरी ने खूब सहायता दी। यहाँ तक
कि उसने आज्ञा दे दी कि हर हिन्दू मल्लाह के घर के कम से कम एक लड़के
को बचपन से मुसलमानों की तरह शिक्षा दी जाय। यही आजकल के
मोपलों की उत्पत्ति है। मोपला शब्द का अर्थ महापिल्ला यानी ज्येष्ठ
पुत्र है।†
मुसलमान फ़क़ीर और प्रचारक
इसी बीच समय समय पर असंख्य मुसलमान फ़क़ीर और विद्वान कुछ
समुद्र के रास्ते और कुछ अफ़गानिस्तान के रास्ते अरब और ईरान से आ
आकर भारत के अनेक भागों में बसते गए। हर जगह उनका खूब आदर
सत्कार होता था।
- Logan : Malabar, vol. i, p. 231.
† Innes : Malabar and Anjengo District Gazetter, p. 190.
७८ पुस्तक प्रवेश
भारत के पूर्वी तट पर भी मुसलमानों की बस्तियाँ और उनका
महत्व बढ़ता चला गया । इन बस्तियों के अलग अलग नाम, हवाले और
मुसलमानों की बढ़ती हुई तादाद को बयान करने की आवश्यकता नहीं
है । एक मुसलमान फ़क़ीर नज़द वली (Nathad Vali) के प्रभाव से
ग्यारहवीं सदी में मदुरा और त्रिचन्नपल्ली के इलाक़ों में अनेक लोगों ने
इसलाम मत स्वीकार किया । यह नज़द वली टर्की का एक शहज़ादा था,
जो फ़क़ीर हो गया था, और अरब, ईरान और उत्तर भारत से होता हुआ
त्रिचन्नपल्ली पहुँचा था, जिसे उस समय त्रिसूर कहते थे । बारहवीं सदी में
एक दूसरे फ़क़ीर सय्यद इब्राहीम शहीद के प्रभाव से अनेक लोगों ने इसलाम
मत स्वीकार किया । इसी तरह बाबा फ़ख़रुद्दीन इत्यादि अनेक अन्य इस-
लाम धर्म प्रचारकों के नाम उस समय के इतिहास में मिलते हैं । बाबा
फ़ख़रुद्दीन के प्रभाव से पेन्नुकोण्डा के हिन्दू राजा ने इसलाम मत स्वीकार
किया । यह भी साफ़ पता चलता है कि इन अरबों और मुसलमानों की
कोशिश से भारत और ख़ास कर दक्खिन भारत की तिजारत और खुशहाली
में बहुत बड़ी तरक्क़ी हुई । दक्खिन के हिन्दू राजाओं की ओर से चीन जैसे
दूर दूर के देशों में मुसलमान एलची और राजदूत भेजे जाते थे । अनेक
हिन्दू दरबारों में मुसलमान मन्त्री और प्रधान मन्त्री थे । अनेक प्रान्तों के
शासक मुसलमान नियुक्त किए जाते थे । हिन्दू राजाओं के अधीन बड़ी बड़ी
मुसलमान सेनाएँ थीं ।
इसी तरह गुजरात के वल्लभी राजा वलहार ने अपने राज के अन्दर
मुसलमानों का बड़े हर्ष और आदर के साथ स्वागत किया । काठियावाड़,
कोकण और मध्यभारत के अन्य हिन्दू राजाओं ने भी मुसलमान
इस्लाम और भारत ७३
फ़क़ीरों और प्रचारकों का बड़े प्रेम के साथ स्वागत किया और
उन्हें अपनी अपनी रियासत में इसलाम प्रचार के लिए हर तरह की
सहायता दी।
ग्यारहवीं सदी के क़रीब खम्भात में कुछ हिन्दुओं ने मुसलमानों की
एक मसजिद पर हमला करके उसे गिरा दिया। राजा सिद्धराज ने तहक़ी-
क़ात करके अपराधियों को दण्ड दिया और मुसलमानों को अपने धन से
एक नई मसजिद बनवा दी। सोमनाथ के हिन्दू राजा के अधीन मुसलमान
सेना और अनेक मुसलमान अफ़सर थे। ग्यारहवीं सदी में गुजराती बोहरों
के शिया धर्माचार्य ने यमन ( अरब) से आकर गुजरात में रहना शुरू
किया। उसी समय के निकट नूरुद्दीन ने गुजरात के कुनबियों, खेरवाओं और
काडियों को इसलाम धर्म में शामिल किया। उन असंख्य मुसलमान सन्तों
और फ़क़ीरों के नाम गिनाने की आवश्यकता नहीं है, जो आठवीं सदी से
लेकर पन्द्रहवीं सदी तक बराबर उत्तर से लेकर दखिन तक और पूरब से
लेकर पच्छिम तक भारत के विविध भागों में आकर बसते रहे और जिनके
उच्च चरित्र और इसलाम के सरल धार्मिक सिद्धान्तों के सबब उस धार्मिक
अव्यवस्था के युग में स्थान स्थान पर हज़ारों और लाखों भारतवासियों ने
इसलाम धर्म स्वीकार करना शुरू कर दिया। अभी तक यदि उत्तर भारत के
उन ग्रामों में घूमा जाय, जिनकी अधिकांश आबादी मुसलमान है, तो
दरयाफ़्त करने पर मालूम होगा कि वहाँ के लोगों के इसलाम मत स्वीकार
करने का सबब किसी न किसी समय किसी न किसी त्यागी और संयमी
मुसलमान फ़क़ीर का उनके अन्दर सहवास ही था। हमें फिर यह याद रखना
चाहिए कि यह कहानी अधिकतर उस ज़माने की है, जब कि अधिकांश
८० पुस्तक प्रवेश
भारत के ऊपर मुसलमानों का राजनैतिक प्रभुत्व या तो शुरू ही न हुआ
था और या कम से कम अभी जमने न पाया था ।
भारत में इसलाम का प्रचार
हमारा हरगिज़ यह मतलब नहीं कि मुसलमानों की राजसत्ता का इस
देश के अन्दर इसलाम के फैलने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । निस्सन्देह हर
युग और हर देश में प्रजा के ऊपर राजा या शासकों के धार्मिक विचारों
का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक और अनिवार्य है । यदि सम्राट अशोक न होता
तो बौद्ध धर्म का भारत के एककोने से दूसरे कोने तक इस तरह फैल सकना
शायद इतना आसान न होता । इसी तरह यदि सम्राट समुद्रगुप्त और
चन्द्रगुप्त (दूसरा) वैष्णव मत के पोषक और सम्राट यशोधर्म देव ( विक्रमा-
दित्य ) शैव मत के पोषक न होते तो हिन्दू मत का बौद्ध मत को भारत से
निकाल बाहर कर सकना इतना सरल न होता । हम यह भी नहीं कहते
कि भारतवासियों से इसलाम मत के स्वीकार कराने में कहीं पर किसी
तरह की भी ज़बरदस्ती का उपयोग नहीं किया गया । दुर्भाग्यवश धार्मिक
मामलों में थोड़ी बहुत ज़बरदस्ती संसार के हर देश के इतिहास में पाई
जाती है । हिन्दू मतों के साथ बौद्ध मत और जैन मत के सङ्घर्ष के दिनों
में भी इस तरह की ज़बरदस्तियों की अनेक मिसालें भरी पड़ी हैं । किन्तु
इतिहास से बिलकुल साफ़ पता चलता है कि इस देश के अन्दर मुसल-
मानों के हमलों से बहुत पहले इसलाम मत प्रवेश कर चुका था, इसलाम
इस देश में महमूद ग़ज़नवी के हमले से भी पहले काफ़ी उन्नति कर चुका
था, और इसलाम के भारत में फैलने का ख़ास सबब उस समय के इसलाम
के प्रचारकों का त्याग, उनकी सच्चरित्रता, और इसलाम मत के वे स्पष्ट और
इसलाम और भारत ८१
सीधे सादे सिद्धान्त थे, जो कम से कम उस समय के भारत की अनेक हिन्दू
सम्प्रदायों के मुक़ाबले में मामूली जन सामान्य के लिए अधिक सरल,
हितकर और सुसाध्य थे । भारत के जिन लोगों ने उस समय इसलाम
मत स्वीकार किया, उनमें अधिकांश संख्या उन छोटी जाति के लोगों की
थी जो उस समय की भारतीय वर्ण व्यवस्था को अपने लिए अन्याय अनुभव
करते थे, और भारतवासियों की किसी संख्या का इसलाम मत स्वीकार
करना ठीक वैसा ही था जैसा उनका वैदिक मत को छोड़ कर बौद्ध मत
स्वीकार करना या बौद्ध मत को छोड़ कर वैष्णव मत या शैव मत स्वीकार
करना, या चीनियों या बरमियों का अपने अपने मतों को छोड़ कर भारतीय
बौद्ध मत को स्वीकार करना, इत्यादि ।
भारतवासियों और भारतीय नरेशों का अरब सौदागरों के साथ सुन्दर
व्यवहार, उनका अपने अपने राज में इसलाम मत को पूरी स्वतन्त्रता देना,
और उस शुरू ज़माने के भारतवर्ष में हिन्दुओं और मुसलमानों का
परस्पर प्रेम सम्बन्ध ही वह बात थी जिसके सबब ख़लीफ़ा उमर ने अरब
सेना को हिदायत की थी कि भारत पर सैनिक हमला न किया जाय, और
जिसके सबब से एशिया, अफ़रीका और यूरोप में अरब साम्राज्य के
पूरा विस्तार पा जाने के वर्षों बाद तक भी मुसलमानों की ओर से भारत
पर हमला नहीं किया गया ।
भारत की क़रीब एक चौथाई आबादी के धीरे धीरे इसलाम मत
स्वीकार करने में राजनैतिक दबाव या ज़बरदस्ती का हिस्सा कहाँ तक था, इसके
सुबूत में हम केवल दो एक इतिहास लेखकों की सम्मतियाँ नीचे देते हैं ।
भारतीय मुसलमानों का ज़िक्र करते हुए इतिहास लेखक आरनॉल्ड लिखता है—
६
८२ पुस्तक प्रवेश
"इनमें से एक बहुत बड़ा अधिकांश भाग ऐसे लोगों का है,
जिन्होंने अपनी स्वतन्त्र इच्छा से इसलाम मत स्वीकार किया।"*
एक दूसरा इतिहास लेखक टाउन्सएड लिखता है—
"इस मत के यहाँ पर फैलने का ख़ास सबब ज़बरदस्ती
नहीं है।"†
एक दूसरे स्थान पर यही लेखक भारतीय मुसलमानों के विषय में
लिखता है—
"इन तमाम मुसलमानों में से ६० फ़ीसदी में भारतीय रक्त
है, वे इस देश के वैसे ही बच्चे हैं जैसे हिन्दू। उनमें बहुत से
पुराने हिन्दू अन्धविश्वास भी अभी तक मौजूद हैं। वे केवल इस
लिए मुसलमान हैं, क्योंकि उनके पूर्वजों ने अरब के उस महा-
पुरुष का मत स्वीकार किया था।"‡
और आगे चल कर यही विद्वान लिखता है कि भारत में मुसलमानों
का राज क़ायम हो जाने के बाद भी प्रजा को ज़बरदस्ती मुसलमान करना
अधिकांश नए मुसलमान शासकों के स्वार्थ और उनकी रुचि दोनों के
विरुद्ध था। वह लिखता है—
- "By far the majority of them entered the pale of Islam of their own
free will."—The Preaching of Islam, by T. W. Arnold, 1913, p 255.
† "Its spread as a faith is not due mainly to compulsion."—Asia and
Europe, London, 1911. by M. Townsend, p. 44.
‡ "Ninety per cent of the whole body of the Muslims are Indians by
blood, as much children of the soil as the Hindoos, retaining many of the
old pagan superstitions, and only Mussalmans because their ancestors em-
braced the faith of the Great Arabian."—Ibid, p. 43.
इस्लाम और भारत ८३
“इस्लाम का प्रचारक बलप्रयोग न कर सकता था और × ×
जिन हमला करने वालों ने यहाँ पर विजय प्राप्त की और जो
यहाँ बस गए, उन्होंने भी प्रायः कभी भी बलप्रयोग करना
नहीं चाहा । इसकी वजह भी काफ़ी थी और वह वजह यह थी
कि बलप्रयोग करने में उनका हित न था। वे राज, बादशाहतें या
साम्राज्य क़ायम करना चाहते थे; न कि अपनी ही टैक्स देने
वाली प्रजा के साथ घरेलू युद्ध छेड़ना या इस विशाल द्वीपप्राय
की युद्धप्रेमी जातियों की अदम्य शत्रुता को अपने विरुद्ध भड़का
लेना; ये जातियाँ हिन्दू थीं और हिन्दू रहीं।”*
तेरहवीं सदी के अन्त से सोलहवीं सदी के प्रारम्भ तक जब कि भारत में
अपना साम्राज्य क़ायम करने के लिए मुसलमानों के प्रयत्न जारी थे, उस
समय के विषय में सर अलफ़्रेड लॉयल लिखता है कि मुसलमान नरेश—
“आम तौर पर लड़ाई में इतने मशगूल रहते थे कि वे धर्म
प्रचार की ओर अधिक ध्यान न दे सकते थे या यह कि उन्हें
लोगों को मुसलमान बनाने की अपेक्षा उनसे टैक्स वसूल करने
की अधिक चिन्ता रहती थी।”†
- “The missionary of Islam could not use force and . . ., as to
the invaders who conquered and remained, they seldom or never wished to
use it, for the sufficient reason that it was not their interest. They wanted
to found principalities, or kingdoms, or an empire, not to wage an internecine
war with their own taxpaying subjects or to arouse against themselves the
unconquerable hostility of the warrior races of the gigantic peninsula, who
were and who remain Hindoos.”—Ibid, p. 45.
† “. . . generally too busily engaged in fighting to pay much
regard to the interests of religion, or else thought more of the exaction of
८४ पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह कहीं कहीं इस तरह की मिसालें भी मिलती हैं जिनमें
राजनैतिक या अन्य बातों से प्रेरित होकर भारत के किसी किसी मुसलमान
नरेश ने इसलाम मत के प्रचार के हित में अपने अधिकारों का अनुचित
प्रयोग किया, किन्तु इसके विपरीत केवल बाबर और अकबर ही नहीं, बल्कि
अधिकांश और असंख्य अन्य मुसलमान शासकों के लेख और उनकी
आज्ञाएँ इस विषय की नक़ल की जा सकती हैं, जिनसे मालूम होता है कि
वे अपनी हिन्दू और मुसलमान प्रजा को एक दृष्टि से देखते थे और राज-
शासन में किसी तरह का धार्मिक पक्षपात अपने लिए हितकर न समझते
थे । इतिहास से यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि वर्त्तमान भारतीय मुसल-
मानों में से ८० नहीं, ९९ फ़ीसदी के इसलाम मत स्वीकार करने का सबब
केवल उस समय के असंख्य मुसलमान फ़क़ीरों, पीरों और दरवेशों की
सच्चरित्रता और इसलाम की आन्तरिक सामाजिक और अन्य विशेषताएँ थीं ।
जिज्ञासु अरब
अरबों के अन्दर नई धार्मिक लहरें
भारत के ऊपर अरब के इस नए मत का प्रभाव केवल उन लाखों या
करोड़ों भारतवासियों तक ही परिमित न था, जिन्होंने इस नए मत को
स्वीकार कर लिया । उस सामाजिक अराजकता के दिनों में, जिसका चित्र हम
tribute than of the work of conversion."—Asiatic Studies, by Sir Alfred
Lyall, London, 1882, p. 288.
जिज्ञासु अरब ८५
ऊपर खींच चुके हैं, शेष भारतवासियों के विचारों, उनके धर्म, उनके साहित्य,
उनकी चित्रकारी, उनके विज्ञान, उनकी निर्माण कला, सारांश यह कि
समस्त भारतीय सभ्यता पर इस्लाम के नए विचारों का गहरा और अमिट
प्रभाव पड़ा। किन्तु इस प्रभाव को बयान करने से पहले यह आवश्यक है
कि हम मोहम्मद साहब के बाद की अरबों के अन्दर की नई धार्मिक लहरों
और उनकी सभ्यता के अन्य पहलुओं पर भी एक नज़र डाल लें ।
इस्लाम आरम्भ से ही एक ईश्वर का मानने वाला था। उसके सिद्धान्त
अत्यन्त सरल थे और पूजा विधि अत्यन्त सुसाध्य । फिर भी मोहम्मद साहब
की मृत्यु के थोड़े दिनों बाद से ही इस्लाम के अन्दर नई नई शाखें फूटने
लगीं। जिस तरह अरब नीतिज्ञों ने पूरब और पश्चिम में अपने साम्राज्य
को बढ़ाना शुरू किया, उसी तरह अरब विद्वानों और जिज्ञासुओं ने संसार
के चारों कोनों से दर्शन, विज्ञान और अनेक विद्याओं की खोज कर अपने
भण्डार को बढ़ाना शुरू किया ।
बौद्ध और हिन्दू ग्रन्थ अरबी में
ईसाई धर्म ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। सुक़रात, अफ़लातून
और अरस्तू जैसों के गूढ़ दर्शनशास्त्रों, और विज्ञान, वैद्यक, ज्योतिष
इत्यादि पर यूनानी ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। भारत के साथ
अरबों का घनिष्ठ सम्बन्ध पहले से था ही। भारतीय माल के साथ साथ
भारतीय संस्कृति और भारतीय विद्याओं का लेन देन भी शीघ्र ही शुरू हो
गया। शुरू के ख़लीफ़ाओं के दिनों में अनेक हिन्दू बसरा में ऊँचे ऊँचे पदों
पर नियुक्त थे ।* शाम, काशगर इत्यादि में हिन्दुओं की अनेक बस्तियाँ
- Jean Perier : Vie d'al Hadjdjadg Ibn Yusuf, p. 249-52.
८६ पुस्तक प्रवेश
थीं। खुरासान, अफ़गानिस्तान, सीसतान और बलूचिस्तान इसलाम मत
स्वीकार करने से पहले बौद्ध थे या हिन्दू। बलख़ में एक बहुत बड़ा बौद्ध
विहार था, जिसके बौद्ध मठाधीश अब्बासी ख़लीफ़ाओं के वज़ीर हुआ
करते थे।* बौद्धधर्म की सब मुख्य मुख्य पुस्तकों के अरबी में अनुवाद
किए गए। "किताबुल बुद्ध" और "बिल बहर वा बुदसिफ़" उन्हीं दिनों
की लिखी हुई अरबी भाषा में बौद्धधर्म की प्रामाणिक पुस्तकें हैं। इसी तरह
सुश्रुत, चरक, पञ्चतन्त्र, हितोपदेश, चाणक्य इत्यादि अगणित संस्कृत
ग्रन्थों के अरबी में अनुवाद किए गए। विशेषकर बुद्ध के जीवन और उसके
सिद्धान्तों का अरब के मुसलमानों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। धीरे धीरे
जिज्ञासु अरबों में तरह तरह के स्वतन्त्र विचार, नए नए दार्शनिक, और
नई नई सम्प्रदाएँ पैदा होनी शुरू हुईं। इसी परिस्थिति के अन्दर इसलाम
में अद्वैतवाद और सुप्रसिद्ध सूफ़ी विचारों का जन्म हुआ।
इसलाम में अद्वैतवाद
उन्हीं दिनों शिया मुसलमानों की 'गुलात' सम्प्रदाय के आचार्यों ने
अवतारवाद (हुलूल, तशबीह), आवागमन (तनास्रुख़) इत्यादि को
अपने सिद्धान्तों में स्थान दिया और यह प्रतिपादन किया कि मनुष्य की
आत्मा भी बढ़ते बढ़ते ख़ुदा के रुतबे तक पहुँच सकती है। 'अली इलाही'
सम्प्रदाय के लोगों ने एक से अधिक स्त्री के साथ विवाह और तलाक़ की
प्रथा दोनों को नाजायज़ क़रार दिया। मसजिद में जाना और शारीरिक
'शरई' पवित्रता को भी उन्होंने अनावश्यक बताया। अनेक सम्प्रदायों ने
क़ुरान के ज़ाहिरा अर्थों को न मान कर उसे अलङ्कार के रूप में मानना शुरू
- Nicholson : A Literary History of the Arabs, p. 259
किया। ❀ अव्यक्त, निर्गुणु ब्रह्म और सगुण ईश्वर में भेद किया जाने लगा ।
इस तरह की अनेक सम्प्रदायें क़ायम हुईं, जिनमें लोगों को विशेष 'दीक्षा'
देकर भरती किया जाता था । इनमें से कोई कोई सम्प्रदाय यह मानती थी
कि दीक्षित मनुष्य अभ्यास करते करते नबी और स्वयं ख़ुदा के रुतबे तक
पहुँच सकता है । गुरु (पीर) को ईश्वर और कहीं कहीं ईश्वर से भी बढ़
कर रुतबा दिया जाने लगा । मोतज़ली सम्प्रदाय के लोगों ने इस बात का
खुले प्रतिपादन किया कि क़ुरान सदा के लिए निर्भ्रान्त ईश्वर वाक्य नहीं
है, बल्कि मनुष्य जाति की उन्नति के साथ साथ हर मनुष्य की आत्मा के
अन्दर बराबर समय समय पर इलहाम होता रहता है'। अलग़िज़ाली
(१०५७-११५२) ने क़ुरान, शरीयत और मामूली मुसलिम कर्मकाण्ड से
असन्तुष्ट होकर संसार से पृथक तप (रियाज़त), अभ्यास (शग़ल) और
ध्यान (ज़िक्र) शुरू किया और अपनी आत्मा के अन्दर शान्ति अनुभव की।
इस तरह के आज़ाद ख़याल सूफ़ियों के अनेक मठ (ख़ानक़ाहें) क़ायम हुए,
जिनमें अद्वैत (वहदतुलवजूद) का उपदेश दिया जाता था, संयम (नफ़्सकुशी)
पर ज़ोर दिया जाता था और भक्ति (इश्क़) और योग (शग़ल) को मुक्ति
का एक मात्र मार्ग बताया जाता था । कवियों और वैज्ञानिकों में अनेक
तरह के अविश्वासी पैदा होने लगे, जो नबी और क़ुरान से इनकार करते
थे, दोज़ख़ और बहिश्त और रोज़े और नमाज़ का मज़ाक़ उड़ाते थे और
सगुण ईश्वर के अस्तित्व को तर्क विरुद्ध बतलाते थे, यहाँ तक कि ख़लीफ़ा
यज़ीद (मृत्यु सन् ७४४) को भी इन्हीं नास्तिकों में गिना जाने लगा। प्रसिद्ध
विद्वान और महात्मा अबुल अला अलमआरी (मृत्यु सन् १०५७) के विचारों
- Frielhander : Heterodoxies of Shiites. J. A. O. S. No, 23 and 29.
८८ पुस्तक प्रवेश
पर बुद्ध के विचारों की छाप साफ़ दिखाई देती है। अबुल अला आत्मा के
आवागमन में विश्वास करता था, कड़ा निरामिषभोजी था, यहाँ तक
कि दूध और शहद या चमड़े के उपयोग को भी पाप मानता था, प्राणिमात्र
के साथ दया का उपदेश देता था, आहार और वस्त्रों में अत्यन्त परहेज़गार
था और ब्रह्मचर्य को आत्मा की उन्नति के लिए आवश्यक बताता
था, मसजिद, नमाज़, रोज़े और दिखावटी मज़हब का वह बड़ा विरोधी
था।* अपने एक पद में वह लिखता है—
“ला इलाह इल्लल्लाह ! सच है, किन्तु जो मनुष्य कि अँधेरे
में भी उस स्वर्ग को खोजता है, जो स्वर्ग मेरे अन्दर और तुम्हारे
अन्दर मौजूद है, उसकी अपनी आत्मा के सिवा कोई दूसरा रसूल
भी नहीं है।”
अबुलअला संसार को माया मानता था ।
उमरख़य्याम के स्वतन्त्र विचार प्रसिद्ध हैं। रतजगे करना, लम्बे लम्बे
उपवास रखना, और कई तरह के नियम और तप सूफ़ियों ने मोहम्मद
साहब की ज़िन्दगी से सीखे, किन्तु सूफ़ियों के सिद्धान्तों पर ईसाई मत,
प्राचीन ईरान के ज़रथुस्त्री मत और भारतीय हिन्दू और बौद्धमतों इन सब
की छाप भी साफ़ दिखाई देती थी। मोहम्मद साहब ने संसार से पृथक रहने
को मना किया था, किन्तु उनके अनुयाइयों में आरम्भ से ही इस तरह के
लोग पैदा हो गए थे जिनका सिद्धान्त संसार से भागना ( अलफ़िरारो
मिनददुनिया ) था। कट्टर मौलवियों और इन आज़ाद ख़याल सूफ़ियों में
बराबर झगड़ा चला आता था, फिर भी सैकड़ों साल तक हज़ारों और
- Baerlein : Abul-Ala, the Syrian.
लाखों मनुष्य चारों ओर से आ आकर इन सूफ़ियों की ख़ानक़ाहों में जमा
होते थे और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उस ज़माने के मुसलमानों के
जीवन और विचारों पर इनका बहुत गहरा प्रभाव था ।
महात्मा मन्सूर का नाम संसार भर में प्रसिद्ध है । मन्सूर ने
भारत की भी यात्रा की थी । उसका मुख्य सिद्धान्त और वाक्य "अनल
हक़" था, जिसका ठीक वही अर्थ है जो 'अहं ब्रह्म' का है। अपने आज़ाद
ख़यालों के सबब से ही मन्सूर को क़ैद किया गया और सन् ६२२ ईसवी में
यातनाएँ दे देकर सूली पर चढ़ा दिया गया । कबीर, दादू, नानक और
अन्य भारतीय महात्माओं के वचनों में मन्सूर के वाक्य के वाक्य इधर से
उधर तक भरे हुए हैं। मन्सूर सबको खुदा मानता था और हर तरह की दुई
को धोखा बतलाता था । क़ुदरती तौर पर इस अद्वैतवाद ने उस समय के
असंख्य मुसलमानों में सब मज़हबों की एकता और एक दूसरे की ओर
उदारता के विचार भी पैदा किए। सूफ़ियों के साहित्य में योगाभ्यास के
मुक़ामात, समाधि, सत्सङ्ग की महिमा, गुरु के महत्व, प्राणायाम इत्यादि का
खूब ज़िक्र आता है और भक्ति के उन्माद में गाने, बजाने और नाचने की
तारीफ़ की गई है । शेख़ बदरुद्दीन के विषय में, जो तेरहवीं सदी में भारत
में आकर रहने लगा था, लिखा है कि जब वह इतना बूढ़ा हो गया था कि
हिल डुल न सकता था तब भी हरि कीर्तन की आवाज़ पर वह तुरन्त अपने
बिस्तरे से कूद कर जवान मनुष्य की तरह नाचने लगता था । जब उससे
पूछा जाता था कि इस निर्बल अवस्था में शेख़ कैसे नाच सकता है तो वह
जवाब देता था, "शेख़ कहाँ है ? इश्क़ नाच रहा है ।" *
- Blochman and Jarrett : Ayeen-i- Akbari, vol, iii, p. 368.
६० पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह सूफ़ियों का मार्ग भक्तिमार्ग था, उनका सिद्धान्त अद्वैत
था, इश्क उनकी पूजा थी और ब्रह्म में लीन होकर तद्रूप हो जाना उनकी
निजात (मोक्ष) थी।
दक्षिण में धर्म सुधार की लहरें
ईसा की आठवीं सदी से पहले भारत की धार्मिक अव्यवस्था का
ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं। बौद्ध मत समाप्त हो चुका था और शैव मत,
वैष्णव मत और शाक्त मत ने उसकी जगह ले ली थी। बौद्ध मत
के उच्च सदाचार और मनुष्यमात्र की समता के सिद्धान्तों के स्थान पर
फिर से असंख्य देवी देवताओं, मत मतान्तरों, कर्मकाण्ड, जात पाँत, ऊँच
नीच और हज़ारों अन्य पाखण्डों ने अपना साम्राज्य जमा लिया था। मदुरा
के जैन राजा ने जब शैव प्रचारक तिरुज्ञान के उपदेश से जैन मत त्याग
कर शैव मत स्वीकार किया और मदुरा की शेष प्रजा ने जैन मत को छोड़ने
से इनकार किया तो राजा ने तिरुज्ञान की सलाह से अनेक जैनों को
फाँसी पर लटकवा दिया। धर्म के नाम पर इस तरह के अत्याचार उस
समय जैनों और बौद्धों के ऊपर जगह जगह सुनने में आते थे। ऐसी
हालत में उन हज़ारों मुसलमान फ़क़ीरों और सूफ़ियों के सिद्धान्तों और
उनके चरित्र का भारतीय जनता पर हितकर प्रभाव पड़ना, जो शुरू की
सदियों में अधिकतर दक्खिन और पश्चिम में आकर बसे, एक स्वाभाविक
घटना थी। अनेक हिन्दू विद्वानों के चित्तों में भी उस समय अपने देश की
जटिल धार्मिक स्थिति को सुलझाने की चिन्ता उत्पन्न हुई। एक दूसरे के बाद
शङ्कर, रामानुज, निम्बादित्य, वासव, वल्लभाचार्य, माधव इत्यादि अनेक
सन्त, महात्मा भारत के दक्खिन में पैदा हुए, जिन्होंने अपने अपने ढङ्ग से
जिज्ञासु भारत ६१
अपने दुखित देशवासियों को फिर से शान्ति, प्रेम और आशा का सन्देश
सुनाया।
इसलाम का प्रभाव
शुरू से लेकर ईसा की आठवीं सदी तक भारत में जितने धार्मिक और
सामाजिक सुधार के आन्दोलनों ने जन्म लिया, वे प्रायः सब उत्तर ही से
शुरू हुए। किन्तु आठवीं सदी के समय से यह एक नई बात देखने में आती
है कि इस तरह के आन्दोलनों को जन्म देने का श्रेय उत्तर के स्थान पर
अब दक्खिन को मिलने लगा। आठवीं से पन्द्रहवीं सदी तक दक्खिन
भारत का यह बड़प्पन क़ायम रहा। शङ्कर, रामानुज, निम्बादित्य
वासव, वल्लभाचार्य और माधव सब दक्खिन के रहने वाले थे। इसका एक
सबब निस्सन्देह यह था कि उन दिनों अधिकांश मुसलमान सन्त, सूफ़ी
और दरवेश दक्खिन और पच्छिम में ही जाकर बसते थे। इन भारतीय
आचार्यों के उपदेशों और सिद्धान्तों पर इसलाम की साफ़ छाप दिखाई
देती है। एक विद्वान इतिहासज्ञ लिखता है—
“इसलाम के अनुयाइयों की उपस्थिति ने जाति भेद,
आत्मिक जीवन और ईश्वर के अस्तित्व इत्यादि विषयों पर लोगों
को विचार करने के लिए उत्तेजित किया।”*
इतिहास लेखक बार्थ लिखता है—
“अफ़ग़ानों, तुरकों या उनके सहधर्मी मुग़ल विजेताओं
- " The presence of the followers of Islam stimulated thought on such
subjects as caste, spiritual birth and the personality of God."—Kabir and
Kabir Panth, by H. G. Westcott, London, 1907, p. 45.
३२ पुस्तक प्रवेश
के इस देश में आने से बहुत पहले खिलाफ़त के अरब लोग
यात्रियों के रूप में इन तटों पर पहुँच चुके थे और देशवासियों
के साथ तिजारत का सम्बन्ध और मेल जोल पैदा कर चुके थे ।
अब देश के ठीक इन्हीं हिस्सों में नवीं सदी से लेकर बारहवीं
सदी तक वे ज़बरदस्त धार्मिक तहरीकें शुरू हुईं जो शङ्कर,
रामानुज, आनन्दतीर्थ और वासव के नामों के साथ सम्बन्ध
रखती हैं। ऐतिहासिक सम्प्रदायों में से अधिकांश इन्हीं तहरीकों
से पैदा हुईं और बहुत दिनों तक हिन्दोस्तान में इनसे मिलती
जुलती और कोई चीज़ न थी।"*
थोड़ी सी सरसरी तुलना से मालूम हो सकता है कि उस समय के
क़रीब क़रीब सब हिन्दू आचार्यों ने अपने समय के इसलाम से काफ़ी
विचार लिए ।
अब हम आठवीं सदी से लेकर पन्द्रहवीं सदी तक के मुख्य मुख्य
भारतीय आचार्यों और महात्माओं के उपदेशों की इसलाम और सूफ़ियों
के उपदेशों के साथ थोड़ी सी तुलना करते हैं। हमारा हरगिज़ यह
मतलब नहीं है कि इन महात्माओं ने जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन
किया, वे सब किसी न किसी रूप में या कम से कम बीज रूप में भारत
के उससे पहले के धार्मिक साहित्य में मौजूद न थे, इसमें भी सन्देह
नहीं कि ख़ासकर शङ्कर जैसे विद्वानों ने अधिकतर भारत के प्राचीन ज्ञान
भण्डार से ही अपनी ज्ञान पिपासा को तृप्त किया और उसी
आधार पर अपने शेष देशवासियों को ठीक मार्ग पर लाने का प्रयत्न किया।
- Barth: Religions of India.
जिज्ञासु अरब १३
फिर भी नीचे की तुलना से यह स्पष्ट हो जायगा कि कम से कम उस
समय इन आचार्यों ने बहुत दरजे तक इसलाम से अपने सिद्धान्तों में
सहायता और पुष्टि प्राप्त की, और एक दरजे तक भारत ही के अनेक
प्राचीन विचारों ने अरब और ईरान से टक्कर खाकर एक नए वेश और
पुनरुज्जीवित रूप में फिर भारत के अन्दर प्रवेश किया।
सब से पहले हमारा ध्यान शङ्कराचार्य की ओर जाता है। शङ्कराचार्य
ने बौद्ध मत के विरुद्ध उस समय की अनेक हिन्दू सम्प्रदायों को मिला कर
उन्हें दार्शनिक नींव और एक सुन्दर व्यवस्थित रूप देने का ज़बरदस्त
प्रयत्न किया। शङ्कर ने अपने से पहले के हिन्दू धर्म में अनेक नवाचार
किए। उसने सब वर्गों के लोगों के लिए सन्यास की दीक्षा को जायज़
क़रार दिया। 'मनुष्य-पञ्चक' में उसने एक स्थान पर लिखा है— "कोई
भी तत्वदर्शी मनुष्य मेरा सच्चा गुरु है, चाहे वह द्विज हो और चाहे
चाण्डाल।" वैष्णव और शैव आचार्यों ने अनेक स्थानों पर शङ्कर का कड़ा
विरोध किया। शङ्कर का अद्वैतवाद निस्सन्देह भारतीय था, किन्तु उस
समय के मुसलमान सूफ़ियों के अद्वैतवाद के साथ उसमें गहरी समानता
थी। कम से कम शङ्कर से पहले भारत में किसी ने भी अद्वैतवाद को इस
तरह का रूप न दिया था। इसलाम के कठोर एक ईश्वरवाद और शङ्कर
के अद्वैतवाद में भी थोड़ी सी समानता अवश्य है। शङ्कर के समय में
इसलाम भारत में पहुँच चुका था। लिखा है कि जिस प्रदेश में शङ्कर का
जन्म हुआ था, वहाँ का हिन्दू राजा तक इसलाम मत स्वीकार कर चुका
था ।*
- Fawcett : Anthropology, Bulletin, vol. iii, No. I.
५४ पुस्तक प्रवेश
रामानुज और अन्य आचार्यों के उपदेशों में एक ईश्वरवाद पर ज़ोर,
भक्ति का उन्माद, प्रपत्ति, गुरुभक्ति, जातिभेद का ढीलापन, इत्यादि
अनेक बातें इसलाम के साथ मिलती हुई हैं। इनमें से अनेक विद्वानों के
ग्रन्थों में अनेक मुसलमान सूफ़ियों के ग्रन्थों के साथ कहीं कहीं आश्चर्य-
जनक समानता दिखाई देती है।
लिङ्गायत सम्प्रदाय की स्थापना बारहवीं सदी के क़रीब हुई। वासव,
चन्न वासव और एकान्त रमय्या तीनों आचार्य इस सम्प्रदाय के संस्थापक
माने जाते हैं। लिङ्गायत सम्प्रदाय एक शैव सम्प्रदाय है। लिङ्गायत लोग
एक ईश्वर (परशिव) को मानते हैं। अपने गुरु 'अल्लमा प्रभु' को वे
ईश्वर का अवतार मानते हैं। मुसलमानों के 'चार पीरों' के समान वे
भी चार आराध्य मानते हैं। दीक्षा के नियम बिलकुल वैसे ही हैं जैसे
सूफ़ियों में। लिङ्गायत लोग जातिभेद को नहीं मानते। पैरिया ठीक
उसी तरह उनकी सम्प्रदाय में लिया जा सकता है जिस तरह ब्राह्मण।
दोनों में कोई अन्तर नहीं माना जाता। विवाह में कन्या की रज़ामन्दी
आवश्यक समझी जाती है। बाल विवाह की मनाही है। तलाक़ की इजाज़त
है। विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाज़त है। मुर्दे बजाय फूँकने के दफ़न
किए जाते हैं। श्राद्ध इत्यादि नहीं किए जाते। लिङ्गायत लोग आवागमन
के सिद्धान्त को नहीं मानते। सब लिङ्गधारी एक दूसरे के साथ खा पी
सकते हैं, विवाह सम्बन्ध कर सकते हैं। ये लोग अपने को 'जङ्गम' या
'वीर शैव' भी कहते हैं। बेलगाम, बीजापुर और धारवाड़ ज़िलों में ३५
फ़ीसदी और मैसूर और कोल्हापुर रियासतों में १० फ़ीसदी आबादी लिङ्गायतों
की है। निस्सन्देह लिङ्गायतों के सिद्धान्तों में अनेक बातें ऐसी हैं जो इसलाम