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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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जिज्ञासु अरब १३
फिर भी नीचे की तुलना से यह स्पष्ट हो जायगा कि कम से कम उस
समय इन आचार्यों ने बहुत दरजे तक इसलाम से अपने सिद्धान्तों में
सहायता और पुष्टि प्राप्त की, और एक दरजे तक भारत ही के अनेक
प्राचीन विचारों ने अरब और ईरान से टक्कर खाकर एक नए वेश और
पुनरुज्जीवित रूप में फिर भारत के अन्दर प्रवेश किया।
सब से पहले हमारा ध्यान शङ्कराचार्य की ओर जाता है। शङ्कराचार्य
ने बौद्ध मत के विरुद्ध उस समय की अनेक हिन्दू सम्प्रदायों को मिला कर
उन्हें दार्शनिक नींव और एक सुन्दर व्यवस्थित रूप देने का ज़बरदस्त
प्रयत्न किया। शङ्कर ने अपने से पहले के हिन्दू धर्म में अनेक नवाचार
किए। उसने सब वर्गों के लोगों के लिए सन्यास की दीक्षा को जायज़
क़रार दिया। 'मनुष्य-पञ्चक' में उसने एक स्थान पर लिखा है— "कोई
भी तत्वदर्शी मनुष्य मेरा सच्चा गुरु है, चाहे वह द्विज हो और चाहे
चाण्डाल।" वैष्णव और शैव आचार्यों ने अनेक स्थानों पर शङ्कर का कड़ा
विरोध किया। शङ्कर का अद्वैतवाद निस्सन्देह भारतीय था, किन्तु उस
समय के मुसलमान सूफ़ियों के अद्वैतवाद के साथ उसमें गहरी समानता
थी। कम से कम शङ्कर से पहले भारत में किसी ने भी अद्वैतवाद को इस
तरह का रूप न दिया था। इसलाम के कठोर एक ईश्वरवाद और शङ्कर
के अद्वैतवाद में भी थोड़ी सी समानता अवश्य है। शङ्कर के समय में
इसलाम भारत में पहुँच चुका था। लिखा है कि जिस प्रदेश में शङ्कर का
जन्म हुआ था, वहाँ का हिन्दू राजा तक इसलाम मत स्वीकार कर चुका
था ।*

  • Fawcett : Anthropology, Bulletin, vol. iii, No. I.