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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

किया। ❀ अव्यक्त, निर्गुणु ब्रह्म और सगुण ईश्वर में भेद किया जाने लगा ।
इस तरह की अनेक सम्प्रदायें क़ायम हुईं, जिनमें लोगों को विशेष 'दीक्षा'
देकर भरती किया जाता था । इनमें से कोई कोई सम्प्रदाय यह मानती थी
कि दीक्षित मनुष्य अभ्यास करते करते नबी और स्वयं ख़ुदा के रुतबे तक
पहुँच सकता है । गुरु (पीर) को ईश्वर और कहीं कहीं ईश्वर से भी बढ़
कर रुतबा दिया जाने लगा । मोतज़ली सम्प्रदाय के लोगों ने इस बात का
खुले प्रतिपादन किया कि क़ुरान सदा के लिए निर्भ्रान्त ईश्वर वाक्य नहीं
है, बल्कि मनुष्य जाति की उन्नति के साथ साथ हर मनुष्य की आत्मा के
अन्दर बराबर समय समय पर इलहाम होता रहता है'। अलग़िज़ाली
(१०५७-११५२) ने क़ुरान, शरीयत और मामूली मुसलिम कर्मकाण्ड से
असन्तुष्ट होकर संसार से पृथक तप (रियाज़त), अभ्यास (शग़ल) और
ध्यान (ज़िक्र) शुरू किया और अपनी आत्मा के अन्दर शान्ति अनुभव की।
इस तरह के आज़ाद ख़याल सूफ़ियों के अनेक मठ (ख़ानक़ाहें) क़ायम हुए,
जिनमें अद्वैत (वहदतुलवजूद) का उपदेश दिया जाता था, संयम (नफ़्सकुशी)
पर ज़ोर दिया जाता था और भक्ति (इश्क़) और योग (शग़ल) को मुक्ति
का एक मात्र मार्ग बताया जाता था । कवियों और वैज्ञानिकों में अनेक
तरह के अविश्वासी पैदा होने लगे, जो नबी और क़ुरान से इनकार करते
थे, दोज़ख़ और बहिश्त और रोज़े और नमाज़ का मज़ाक़ उड़ाते थे और
सगुण ईश्वर के अस्तित्व को तर्क विरुद्ध बतलाते थे, यहाँ तक कि ख़लीफ़ा
यज़ीद (मृत्यु सन् ७४४) को भी इन्हीं नास्तिकों में गिना जाने लगा। प्रसिद्ध
विद्वान और महात्मा अबुल अला अलमआरी (मृत्यु सन् १०५७) के विचारों

  • Frielhander : Heterodoxies of Shiites. J. A. O. S. No, 23 and 29.