भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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निस्सन्देह कहीं कहीं इस तरह की मिसालें भी मिलती हैं जिनमें
राजनैतिक या अन्य बातों से प्रेरित होकर भारत के किसी किसी मुसलमान
नरेश ने इसलाम मत के प्रचार के हित में अपने अधिकारों का अनुचित
प्रयोग किया, किन्तु इसके विपरीत केवल बाबर और अकबर ही नहीं, बल्कि
अधिकांश और असंख्य अन्य मुसलमान शासकों के लेख और उनकी
आज्ञाएँ इस विषय की नक़ल की जा सकती हैं, जिनसे मालूम होता है कि
वे अपनी हिन्दू और मुसलमान प्रजा को एक दृष्टि से देखते थे और राज-
शासन में किसी तरह का धार्मिक पक्षपात अपने लिए हितकर न समझते
थे । इतिहास से यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि वर्त्तमान भारतीय मुसल-
मानों में से ८० नहीं, ९९ फ़ीसदी के इसलाम मत स्वीकार करने का सबब
केवल उस समय के असंख्य मुसलमान फ़क़ीरों, पीरों और दरवेशों की
सच्चरित्रता और इसलाम की आन्तरिक सामाजिक और अन्य विशेषताएँ थीं ।
जिज्ञासु अरब
अरबों के अन्दर नई धार्मिक लहरें
भारत के ऊपर अरब के इस नए मत का प्रभाव केवल उन लाखों या
करोड़ों भारतवासियों तक ही परिमित न था, जिन्होंने इस नए मत को
स्वीकार कर लिया । उस सामाजिक अराजकता के दिनों में, जिसका चित्र हम
tribute than of the work of conversion."—Asiatic Studies, by Sir Alfred
Lyall, London, 1882, p. 288.