भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिज्ञासु भारत ६१
अपने दुखित देशवासियों को फिर से शान्ति, प्रेम और आशा का सन्देश
सुनाया।
इसलाम का प्रभाव
शुरू से लेकर ईसा की आठवीं सदी तक भारत में जितने धार्मिक और
सामाजिक सुधार के आन्दोलनों ने जन्म लिया, वे प्रायः सब उत्तर ही से
शुरू हुए। किन्तु आठवीं सदी के समय से यह एक नई बात देखने में आती
है कि इस तरह के आन्दोलनों को जन्म देने का श्रेय उत्तर के स्थान पर
अब दक्खिन को मिलने लगा। आठवीं से पन्द्रहवीं सदी तक दक्खिन
भारत का यह बड़प्पन क़ायम रहा। शङ्कर, रामानुज, निम्बादित्य
वासव, वल्लभाचार्य और माधव सब दक्खिन के रहने वाले थे। इसका एक
सबब निस्सन्देह यह था कि उन दिनों अधिकांश मुसलमान सन्त, सूफ़ी
और दरवेश दक्खिन और पच्छिम में ही जाकर बसते थे। इन भारतीय
आचार्यों के उपदेशों और सिद्धान्तों पर इसलाम की साफ़ छाप दिखाई
देती है। एक विद्वान इतिहासज्ञ लिखता है—
“इसलाम के अनुयाइयों की उपस्थिति ने जाति भेद,
आत्मिक जीवन और ईश्वर के अस्तित्व इत्यादि विषयों पर लोगों
को विचार करने के लिए उत्तेजित किया।”*
इतिहास लेखक बार्थ लिखता है—
“अफ़ग़ानों, तुरकों या उनके सहधर्मी मुग़ल विजेताओं
- " The presence of the followers of Islam stimulated thought on such
subjects as caste, spiritual birth and the personality of God."—Kabir and
Kabir Panth, by H. G. Westcott, London, 1907, p. 45.