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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

इस्लाम और भारत ८३
“इस्लाम का प्रचारक बलप्रयोग न कर सकता था और × ×
जिन हमला करने वालों ने यहाँ पर विजय प्राप्त की और जो
यहाँ बस गए, उन्होंने भी प्रायः कभी भी बलप्रयोग करना
नहीं चाहा । इसकी वजह भी काफ़ी थी और वह वजह यह थी
कि बलप्रयोग करने में उनका हित न था। वे राज, बादशाहतें या
साम्राज्य क़ायम करना चाहते थे; न कि अपनी ही टैक्स देने
वाली प्रजा के साथ घरेलू युद्ध छेड़ना या इस विशाल द्वीपप्राय
की युद्धप्रेमी जातियों की अदम्य शत्रुता को अपने विरुद्ध भड़का
लेना; ये जातियाँ हिन्दू थीं और हिन्दू रहीं।”*
तेरहवीं सदी के अन्त से सोलहवीं सदी के प्रारम्भ तक जब कि भारत में
अपना साम्राज्य क़ायम करने के लिए मुसलमानों के प्रयत्न जारी थे, उस
समय के विषय में सर अलफ़्रेड लॉयल लिखता है कि मुसलमान नरेश—
“आम तौर पर लड़ाई में इतने मशगूल रहते थे कि वे धर्म
प्रचार की ओर अधिक ध्यान न दे सकते थे या यह कि उन्हें
लोगों को मुसलमान बनाने की अपेक्षा उनसे टैक्स वसूल करने
की अधिक चिन्ता रहती थी।”†

  • “The missionary of Islam could not use force and . . ., as to
    the invaders who conquered and remained, they seldom or never wished to
    use it, for the sufficient reason that it was not their interest. They wanted
    to found principalities, or kingdoms, or an empire, not to wage an internecine
    war with their own taxpaying subjects or to arouse against themselves the
    unconquerable hostility of the warrior races of the gigantic peninsula, who
    were and who remain Hindoos.”—Ibid, p. 45.
    † “. . . generally too busily engaged in fighting to pay much
    regard to the interests of religion, or else thought more of the exaction of