भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसलाम और भारत ८१
सीधे सादे सिद्धान्त थे, जो कम से कम उस समय के भारत की अनेक हिन्दू
सम्प्रदायों के मुक़ाबले में मामूली जन सामान्य के लिए अधिक सरल,
हितकर और सुसाध्य थे । भारत के जिन लोगों ने उस समय इसलाम
मत स्वीकार किया, उनमें अधिकांश संख्या उन छोटी जाति के लोगों की
थी जो उस समय की भारतीय वर्ण व्यवस्था को अपने लिए अन्याय अनुभव
करते थे, और भारतवासियों की किसी संख्या का इसलाम मत स्वीकार
करना ठीक वैसा ही था जैसा उनका वैदिक मत को छोड़ कर बौद्ध मत
स्वीकार करना या बौद्ध मत को छोड़ कर वैष्णव मत या शैव मत स्वीकार
करना, या चीनियों या बरमियों का अपने अपने मतों को छोड़ कर भारतीय
बौद्ध मत को स्वीकार करना, इत्यादि ।
भारतवासियों और भारतीय नरेशों का अरब सौदागरों के साथ सुन्दर
व्यवहार, उनका अपने अपने राज में इसलाम मत को पूरी स्वतन्त्रता देना,
और उस शुरू ज़माने के भारतवर्ष में हिन्दुओं और मुसलमानों का
परस्पर प्रेम सम्बन्ध ही वह बात थी जिसके सबब ख़लीफ़ा उमर ने अरब
सेना को हिदायत की थी कि भारत पर सैनिक हमला न किया जाय, और
जिसके सबब से एशिया, अफ़रीका और यूरोप में अरब साम्राज्य के
पूरा विस्तार पा जाने के वर्षों बाद तक भी मुसलमानों की ओर से भारत
पर हमला नहीं किया गया ।
भारत की क़रीब एक चौथाई आबादी के धीरे धीरे इसलाम मत
स्वीकार करने में राजनैतिक दबाव या ज़बरदस्ती का हिस्सा कहाँ तक था, इसके
सुबूत में हम केवल दो एक इतिहास लेखकों की सम्मतियाँ नीचे देते हैं ।
भारतीय मुसलमानों का ज़िक्र करते हुए इतिहास लेखक आरनॉल्ड लिखता है—
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