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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

६० पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह सूफ़ियों का मार्ग भक्तिमार्ग था, उनका सिद्धान्त अद्वैत
था, इश्क उनकी पूजा थी और ब्रह्म में लीन होकर तद्रूप हो जाना उनकी
निजात (मोक्ष) थी।
दक्षिण में धर्म सुधार की लहरें
ईसा की आठवीं सदी से पहले भारत की धार्मिक अव्यवस्था का
ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं। बौद्ध मत समाप्त हो चुका था और शैव मत,
वैष्णव मत और शाक्त मत ने उसकी जगह ले ली थी। बौद्ध मत
के उच्च सदाचार और मनुष्यमात्र की समता के सिद्धान्तों के स्थान पर
फिर से असंख्य देवी देवताओं, मत मतान्तरों, कर्मकाण्ड, जात पाँत, ऊँच
नीच और हज़ारों अन्य पाखण्डों ने अपना साम्राज्य जमा लिया था। मदुरा
के जैन राजा ने जब शैव प्रचारक तिरुज्ञान के उपदेश से जैन मत त्याग
कर शैव मत स्वीकार किया और मदुरा की शेष प्रजा ने जैन मत को छोड़ने
से इनकार किया तो राजा ने तिरुज्ञान की सलाह से अनेक जैनों को
फाँसी पर लटकवा दिया। धर्म के नाम पर इस तरह के अत्याचार उस
समय जैनों और बौद्धों के ऊपर जगह जगह सुनने में आते थे। ऐसी
हालत में उन हज़ारों मुसलमान फ़क़ीरों और सूफ़ियों के सिद्धान्तों और
उनके चरित्र का भारतीय जनता पर हितकर प्रभाव पड़ना, जो शुरू की
सदियों में अधिकतर दक्खिन और पश्चिम में आकर बसे, एक स्वाभाविक
घटना थी। अनेक हिन्दू विद्वानों के चित्तों में भी उस समय अपने देश की
जटिल धार्मिक स्थिति को सुलझाने की चिन्ता उत्पन्न हुई। एक दूसरे के बाद
शङ्कर, रामानुज, निम्बादित्य, वासव, वल्लभाचार्य, माधव इत्यादि अनेक
सन्त, महात्मा भारत के दक्खिन में पैदा हुए, जिन्होंने अपने अपने ढङ्ग से