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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों। आसन दोनों बरणौं हैं ज्यों ॥
अथ पद्मासनविधि ॥
पहिले आसन पदम बताऊं। ज्यों की त्यों मूरति दिखलाऊं ॥
पहिले बावां पांव उठावै। दहिनी जङ्घा ऊपर लावै ॥
दहिना पांव फेरि यों लावै। बांवीं साथल ऊपर राखै ॥
बावां कर पीछे सों लावै। बाम अँगूठा गहि तन तावै ॥
ऐसे हाथ दाहिना लावै। दहिन अँगूठा पकड़ दृढ़ावै ॥
ग्रीवालटक चिबुक हिये आवै। नासा आगे दीठि लगावै ॥
दिव्यदृष्टि हो कौतुक दरशै। कहै शुकदेव अभैपद परशै ॥
दो० कै हिरदै राखै चिबुक, कै सम राखै देह।
कै घौटों दोउ हाथ रखि, कै अँगूठा गहिलेह ॥
अथ सिद्धासनविधि ॥
दूजा आसनसिद्ध जुकीजे। बावां पांव गुदाढिग दीजै ॥
दाहिन पांव लिंगपर आवै। दृष्टि सुभ्रुकुटी पै ठहरावै ॥
अचरज जहां अधिक दरशावै। खुले कपाट मोक्ष गति पावै ॥
आसन साधि व्याधि परिहरै। भूख नींद जोपै वश करै ॥
दो० एड़ी पावै पांव की, सीवन मध्ये राख।
लिंग गुदा के मध्य में, मूल बोलिये साख ॥
संयम सूं इन्द्री गहै, राखै सरल शरीर।
दृष्टि उठा भ्रुकुटी धरै, मिटै जु दोनों पीर ॥
दहिनी लावै लिंगपर, भाग बराबर राखि।
बारी बारी कीजिये, शुकदेवा कहै भाखि ॥
अथ प्राणायामअंग वर्णन ॥
चौथे प्राणायामही, कहूँ सुनौ चित लाय।
जाबल जीवै पनकुं, चढ़ै गगन कूं धाय ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६३
षटचक्कर कूं छेदि करि, सुखमनही की राह।
दलसहस्रके कमल में, पहुँचै करै उछाह ॥
हिरदै में अस्थान है, प्रान वायु का - जान ।
वाके रोंके सबरुकैं, वायुन में परधान ॥
जैसे गंगा एकही, घाट घाट के नावँ ।
ऐसे प्राणहि वायु के, नावँ कहे बहु ठावँ ॥
चौरासी अस्थान' पर, चौरासीही वायु।
तामें दश ये मुख्य हैं, बरणौं सुनिये ताय ॥
प्राण अपान समानही, और व्यान , उद्यान ।
नाम धनंजय देवदत, कूरम किरकल जान ॥
दशवायू जो एकही, तिनमें दीरघ दोय ।
सोवै प्राण अपानहैं, तिन्हें पिछानै कोय ॥
प्राणजाय प्राणैं मिलै, रहे प्राणके प्रान।
शुकदेव कहि वर्णन करूं, अब इनके अस्थान ॥
प्राणवायु हिरदै के ठाहीं। बसै अपान गुदा के माहीं ॥
वायु समान नाभि अस्थाना । कंठ माहिं बाई उद्याना ॥
व्यान जुव्यापक है तन सारै । नाग वायु सों उठै डकारै ॥
पलक उघाड़ै कूरमबाई । देवदत्तसूं होय जँभाई ॥
किरकल वायु जु भूख लगावै । मुखै धनंजय देह फुलावै ॥
सब में प्राण वायु मुखजानौं । सो हिरदै के मध्य पिछानौं ॥
हिरदाही, देही के माहीं । जो कुछ है सो झांही झांही ॥
योगेश्वर ह्यांईं फल पावैं । ह्यांसू अनहद नाद जगावै ॥

६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चक्रवर्णन ॥
दो० अब चक्र¹ बरनन करूं, पाछे प्राणायाम ।
बरणूं नारी सुषमना, सुधरै सबही काम ॥
हैं वे सूरति कमल की, छोटे और विशाल ।
मूलसुं लेकर शीशलौं, एकहि जिनकी नाल ॥
कुं० लालरंग पहिला कहूँ चक्रधार तिहि नाँवँ ।
चार पँखरी² तासु की हैं जु गुदा के ठावँ ॥
हैं जु गुदा के ठावँ देह तांही पर राजै ।
चारों अक्षर तहाँ देव गन्नेश विराजै ॥
पवन सुरत हां लैधरै खोलि कहैं शुकदेव ।
दूजा लिंगस्थानही जाको सुन अब भेव ॥
पीतबरण षट पँखरी नामजु स्वाधिष्ठान ।
षट अक्षर जापै दिये ब्रह्मा दैवत जान ॥
ब्रह्मा दैवत जान सँग सावित्री³ दासा ।
इन्द्र सहित सब देव तहां सबही का बासा ॥
मणिपूरक चक्र कहूं तीजा नाभि स्थान ।
नीलबरण दश पँखरी दश अक्षर परमान ॥
दो० विष्णु जहांका देवता, महालक्ष्मी संग ।
चरणदास अब कहतहूँ, चौथे को परसंग ॥
अनहदचक्र हिरदयबिषे, द्वादशदल अरुश्वेत ।
शिवशक्ती⁴ जहाँ देवता, द्वादश अक्षर भेद ॥
पँचवां चक्र कंठ में, विशुद्ध नामजिहिकेर ।


१ आधार,स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनहद, विशुद्ध, आज्ञा ये छः चक्र
शरीर के अन्तर रहते हैं २ पंखुरी ३ सरस्वती ४ पार्वती ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६५
षोड़श दल जीव देवता, षोड़श अक्षर हेर ॥
छठयों भौंहन बीच में, अज्ञा चक्कर सोय ।
ज्योति देवता जानिये, दो दल अक्षर दोय ॥
शिष्यवचन ॥
कमलों पर अक्षर कहे, समझ न आई मोहिं ।
कौन कौन अक्षर तहां, सतगुरु कहिये सोहिं ॥
गुरुवचन ॥
पहिला कमल अधार सुनाऊं । वशषस अक्षर वरण बताऊं ॥
दूजा कमल जु स्वाधिष्ठाना । बा भा माया रल जु बखाना ॥
तृत्तिये मणिपूरक जो कहिये । डा ढा णा ता था ही लहिये ॥
दा धा ना पा फा जो गाये । ये दश अक्षर वरण बताये ॥
चौथे चक्र अनाहद माहीं । द्वादश अक्षर वरण बताहीं ॥
का खा गा घा ङा जो जान । चा छा जा झा ञ ट ठ जुमान ॥
पँचवां षोड़श विशुद्ध जो आछे । आदि अकार अकार सुपाछे ॥
छठा जो अज्ञा चक्कर मानौ । हंस वरण दो अक्षर जानौ ॥
दो० भवँर गुफा मंडल अखंड, तिरवेणी जहँ न्हान ।
नित परबी जहाँ होत है, करै पाप की हान ॥
उलट पवन बेधै षटन, ऊपर पहुंचै जाय ।
शुकदेव कहैं चरणदासजू, सुषमन सहज समाय ॥
कमलसहस दल सातवां, शीश मध्यही वास ।
तहां देवता सचगुरु, पूरी करै जो आस ॥
ह्यांतक सुषमन का सिरा, सो सातौ की नाल ।
हैं वे उलटे षट कमल, तलै अपान बयाल ॥
अपान् वायु कूं साधिकरि, ऊपर लावै मोड़ ।
जब होवै उलटे कमल, मुख अकाशकोओड़ ॥

६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अपान वायु ज्योंज्यों बढ़ै, चक्र चक्र के पास ।
त्यों त्यों सीधै होय सब, पूरा जान अभ्यास ॥
अपान वायु आवै जबे, चक्र अनाहद माहिं ।
दश प्रकार के नादही, शनैःशनैः खुलि जाहिं ॥
पहिले नाद सुनै जो ऐसा । चिड़ी चीकला बोलै जैसा ॥
एकहि बार कहै यों चिन्न । दूजीबार कहै चिन चिन्न ॥
क्षुद्रघंट ज्यों तीजी जानौ । चौथी नाद शङ्ख पहिंचानौ ॥
पँचवीं नाद बीन ज्यों गाजै । छठवीं उपज ताल ज्यों बाजै ॥
सतवीं नाद मुरलिया ऐसी । अठवीं उठै पखावज जैसी ॥
नवै नफ़ीरी नाद सुनावै । दशवें सिंह गरज उपजावै ॥
नौ तजि दशवैं सूं हित लावै । अनहद सुनि अनहद होजावै ॥
होय जीव सो ब्रह्म अगाधा । जो कोइ सुनै सुअनहदनादा ॥
दो० खुलै जो अनहदनाद ज्यों, सोसाधन सुनि लेहु ।
जासों पहुँचै सिद्धि को, या करणी चित देहु ॥
चक्राधार सों खैंचि करि, अपान वायु सजलेह ।
स्वाधिष्ठान के पासही, तीन लपेटै देह ॥
याकीविधि सब तोहिं सुनाऊं । जैसे है तैसे समझाऊं ॥
पहिले मूल द्वार को शोधै । बंध लगाय अपान निरोधै ॥
पहिले चक्कर में ठहरावै । खैंचि दूसरे के ढिग लावै ।
वाके आसौ पास फिरावै । दहिने तीनि लपेट लगावै ॥
फिरि मणिपूरक में पहुंचावै । फेरि अनाहद में लैजावै ॥
अनहद खुलै सुनै सुखपावै । फिरिहांप्राण अपान मिलावै ॥
हिरदय कंठ मध्य ठहरावै । संयम सों ताको पहुंचावै ॥
बंध दूसरो तहां लगावै । चरणदासं शुकदेव बतावै ॥

' अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६७
अष्टपदी ॥
पहिले अनहदनाद खुलैहिय ऊपरै ।
कंठ सु नीचे रोंकि ध्यान ह्वांईं धरै ॥
जहांअपरबल होय जु अनहद शब्दही ।
फिरियों जानो जाय कंठ के मध्यही ॥
तहां किये अभ्यास ध्यान राखैधना ।
होवै अधिकीनाद सुनै साधूजना ॥
केतक द्योसन माहिं ब्रह्म रन्धरकनै ।
जाय खुलै जहँ नाद सुरतिदै ह्वां सुनै ॥
शनै शनै यो होय जानेंकोइ साधही ।
हिरदय अरु ब्रह्मलोकलों एकैनादही ॥
मीठी और सवाद बहुतही पाइये ।
सतगुरु के परताप जहां मनलाइये ॥
ब्रह्मलोककी बात सुनै होवै जुह्वां ।
सबही सूझैं वस्तु जुकछु होवैं तहां ॥
दो० अनहद के सम औरना, फल बरणे नहिं जाहिं ।
पटतर कछू न देसकूं, सब कछु है वा माहिं ॥
पांच थकै आनंद बढ़ै, अरु मनुआ वश होय ।
शुकदेवकहि चरणदाससुनि, आपअपनजाखोय ॥
नाड़िन में सुपमन बड़ी, सो अनहद की मात ।
कुम्भक में केवल बड़ा, सो वाही का भ्रात ॥
मुद्रा बड़ी जु खेचरी, वाकी बहिनी जान ।
अनहद सा बाजा नहीं, और न या सम ध्यान ॥
सेवक से स्वामी.भवै, सुनै जु अनहद नाद ।

६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जीव, ब्रह्म हैजात है, पावै अपनी आद ॥
चरणदास अब कहत हूँ, वही जु प्राणांयाम ।
शुकदेव कहै ताके किये, पावै मन विश्राम ॥
बहत्तरहजार आठसौचौंसठनारी । सबकी जड़है नाभि मँझारी ॥
तिनमहँ दश नाड़ी शिरमौरी । पाँच बायें पाँच दहनी ओरी ॥
जिनमें तीनि अधिक परधान । इड़ा पिंगला सुषमनजान ॥
उनमें सुषमन अधिक अनूप । सो वह कहिये अग्नि स्वरूप ॥
दश नाड़ी अस्थान बताऊं । ठौर ठौर तेहि कहि समझाऊं ॥
दो० नाड़ि शङ्खिनी गुदामें, किरकल लिंगस्थान ।
पोषा सरवन दाहिने, जसनी बायें कान ॥
गंधारी दृग बामही, हस्तिनि दाहने नैन ।
नारि लंबका जीभमें, सब सवाद सुखदैन ॥
नासा दहिने अंगहै, पिंगल सूरज वास ।
इड़ा सुबायें ओर है, जहां ससियर परकास ॥
दोऊ मध्य में सुषमना, अद्भुत वाको भेव ।
ब्रह्म नाड़िहू कहत हैं, यों कह सो शुकदेव ॥
इड़ा ब्रह्मा जमुना जहां, सुषमन विष्णु निवास ।
और सरस्वति जानिये, येहो चरणहिं दास ॥
शिव पिंगल गंगा सहित, सो वह दहिने अंग ।
तिरवेणी याते भई, मिलीं जु तीनौ संग ।
कबहुँ इड़ा स्वर चलत है, कबहूँ पिंगल माहिं ।
मध्य सुषमना बहत है, गुरु बिन जानै नाहिं ॥
सोवह अग्नि स्वरूप है, बड़ी योग सरदार ॥
याहीते कारज सरै, ऐसी सुषमन नार ॥
इनसों प्राणायाम करीजै । पूरक कुम्भक रेचककीजै ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
इड़ा पिंगला मारग थाकै । उलटि सुषमना चालनलागैं ॥
बायें खैंचना पूरक जानौ । ठहरावन को कुम्भक मानौ ॥
फेरि उतारै रेचक वोई । प्राणायाम कहावै सोई ॥
दो० इड़ा पवन पूरक करै, कुम्भक राखै रोक ।
रेचक पिंगल सों करै, मिटैं पापके थोक ॥
पिंगल रोकै पवन न जावै । इड़ा और सो वायु चढ़ावै ॥
कुम्भककरि हिय चिबुक लगावै । जितकातित मनको ठहरावै ॥
सोलह मात्रा पूरक लीजै । चौंसठि कुम्भकमें जपकीजै ॥
रेचक फिरि बत्तीस उतारै । धीरे धीरे ताहि निवारै ॥
पहिल पहिलही कीजै आधे । तीनि महीने ऐसे साधे ॥
यासे आगे फेरि बढ़ावै । दोय आठ अरु चारि चढ़ावै ॥
बढ़त बढ़त ऐसेही बढ़ै । योंहीं चौंसठि ताहीं चढ़ै ॥
इड़ा वायुसों पूरक कीजै । पिंगल सों रेचक तजिदीजै ॥
फिरि पिंगलसों पूरक धारै । बहुरि इड़ाहीसों निरवारै ॥
ऐसे बारीबारी करिये । जीते प्राण वायु अघ हरिये ॥
होयसकै कुम्भक सरकावै । चौंसठि से भी परै बढ़ावै ॥
शिष्यवचन ॥
दो० चरणदास करजोरिकह, सुनौ गुरू शुकदेव ।
कौन समै याको करै, राति दिना कहिदेव ॥
मात्रा कासों कहत हैं, जो बतलायो जाप ।
केतौ करै अहारही, जाको कहिये नाप ॥
गुरुवचन ॥
ॐ बिन्दी के सहितही, ताहि मात्रा जान ।
बीजमन्त्र तासों कहत, प्रणव को पहिंचान ॥

७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कोमल भोजन कीजिये, आधी रखिये भूख ।
पवन बसै सुखसों जहां, तन नहिं पावै दूख ॥
साठिघरी दिनराति की, आठ तासुके याम ।
लीजै चौथा भागही, कीजै प्राणायाम ॥
चारभाग ताके करै, चार समै ठहराय ।
चार चार घटिका करै, दृढ़ब्रत चित्तलगाय ॥
और दूसरी भांति सुनीजै । हो नसकै तौ याको कीजै ॥
बारह ॐ पवन चढ़ावै । कुम्भक माहिं बीस ठहरावै ॥
बारह पिंगल पवन उतारै । राति दिनामें चारहिबारै ॥
फेरि बढ़ावै कुम्भक दुगुनी । केते द्यौसन में फिर तिगुनी ॥
फिर पिंगल सों पूरक लीजे । इड़ा बायु रेचकही कीजे ॥
बिरिया एक इड़ा सों खेंचे । पिंगल दूजीबार जु एंचे ॥
कबहुँ यासू कबहुँ वासों । रेचक करै जो पूरक जासों ॥
कुंभक तिगुनी सो अधिकावे । होयसके जितनी सरकावे ॥
दो० भांति दूसरी और सुनि, साधन अधिक अनूप ।
गुरु बिन भेद न पाइये, महा गुप्त सों गूप ॥
अष्टपदी ॥
प्राण वायुकी युक्ति कहौं जेहि बातहै ।
द्वादश अंगुल नासिका आगे जातहै ॥
संयमही सों सहज जु उलट घटाइये ।
शनैशनैही साध जु ताहि समाइये ॥
अपान वायुको खेंचि प्राण घर लाइये ।
फिरि बाहर सों रोंकि जु तिन्हें मिलाइये ॥
तीनि कर्म पूरकके कुम्भकके कहे ।
१ धीरेधीरे ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७१
रेचकही के कर्म दोय निश्चय भये ॥
दो रेचक के कर्म पूरक के तीनहीं ।
ये सबही रहिजायँ होय जब छीनहीं ॥
पूरक रेचक छुटै केवल कुम्भकयही ।
ठौर समैका बंध न राखै नाशही ॥
या किरियाको अन्त जानौ तुम हां तहीं ।
प्राणवायु को रोकै कायाके महीं ॥
दो० साठहजार इक्कीसलख, सबके श्वास परमान ।
यह तौ रोकै देहमें, जबलग एकहि प्रान ॥
याकेहू ये सौ दिना, साधन भवै जु सिद्धि ।
केवल कुम्भक जानिये, पूरी हवै जु विद्धि ॥
अष्टपदी ॥
इतनी होवै शक्ति रुकन जब श्वासकीं ।
रहै नहीं परमाण जु गिनती मासकी ॥
द्वादशकै सौ बर्ष सहस कै लाखही ।
चाहै जब लग रखै सांच यह साखही ॥
गुप्त महा यह जान कठिन है साधना ।
कोटिनमें कोइ एक करै आराधना ॥
देखा देखी बहुत मनुष याकू लगैं ।
कोई चढ़ै परमान घने मगमेंथकैं ॥
चरणदास यह समझि कहें शुकदेवहीं ।
शनैशनै सों करै पांय या भेवही ॥
दो० मूल बंध अरु खेचरी, मुद्राही को जान ।
दोनोंके साधे बिना, होय अपान न प्रान ॥
खेचरि मुद्राकहूँ बखानै । जाको कोटिन में कोइ जानै ॥
७

७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
सकल शिरोमणि योग मंझारी। ज्यों मनुषों में छत्तर धारी ॥
शीश फूल ज्यों गहनो माहीं । या बिन ताड़ी लागै नाहीं ॥
साधन कर कर जीभ बढ़ावै । सो ब्रह्मरंधरताईं लावै ॥
उरैताल वा ठौर कहावै । रसना सूं द्वां बंध लगावै ॥
जासूं पवन न सरकन पावै । श्रवण नैनजू बाट रुकावै ॥
प्राणवायु बाहर नहिं आवै । मुखनासा हो निकस न जावै ॥
शुकदेव कहैं चरणदास बताऊं । आगे मूलबंध समुझाऊं ॥
दो० मूल बन्ध जानौ यही, एंडी गुदा लगाव ।
थक दहनी वावीं कभी, सिध आसन ठहराव ॥
मूलबन्ध जा कारण दीजै । सो मैं कहूँ सबै सुनि लीजै ॥
अधार चक्रसूं पवन उठावै । स्वाधिष्ठानहिं के ढिग लावै ॥
दहिनी ओर कूं ताहि फिरावै । ऐसी तीन लपेट लगावै ॥
सीधा ह्वै ऊपर कूं धावै । मणिपूरक चकर में आवै ॥
शनई शनई ताहि चढ़ावै । चकर चकर में पहुंचावै ॥
भूचकर के ऊपर ताईं । ब्रह्मरंध्र के लावै ठाईं ॥
ऐसे षट चकर कूं शोधै । प्राण वायु को यों परबोधै ॥
अपान वायु जो ह्यांतक आव । प्राण वायु ह्वै सहज समावै ॥
शुकदेव कहै सुन चरणहिं दासा । सहज शून्यमें करै निवासा ॥
अथ अष्ट प्रकार के कुम्भक वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० प्राणायाम की विधि सबै, गुरु तुम दई सुनाय ।
सो लेकरि हिरदै धरी, ताहि न देउं भुलाय ॥
चरणदासके शीश पर, तुम्हीं गुरु शुकदेव ।
कुम्भक अष्ट प्रकार के, तिनको कहिये भेव ॥
लक्षण नाम स्वभाव गुण, जुदे जुदे समुझाय ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७३
चरणदास के मन विषे, सुनबेको अति चाय ॥
गुरुवचन
अब आठौ कुम्भक कहूँ, नावँ भेद गुण रूप ।
शुकदेव कहैं परसिद्ध हैं, योगहि माहिं अनूप ॥
प्रथम कुम्भकही कहूँ, नावँ जु सूरज भेद ।
दूजे ऊजाई सुनो, साधे छूटै खेद ॥
शीतकार अरु शीतली, पाँचवीं भस्त्रक जान ।
छठीं जु अमरी नाम है, नीके समझि पिछान ॥
नावँ मूर्छा सातवीं, अठवीं केवल होय ।
रणजीता सबसे बड़ी, आयु बढ़ावै सोय ॥
पवन पूर पूरकही कीजै । पाछे बन्ध जलन्धर दीजै ॥
कुंभक रेचकके मधि जानौ । ह्याईं बन्ध उड्यान पिछानौ ॥
पवन जोरही सूं गहि लीजै । अध ऊर्ध्व संकोच न कीजै ॥
मध्यम कीजै पश्चिम तानै । ब्रह्म नारिके माहिं समानै ॥
नाड़ीं पवन खैंचिये ऐसे । भरिये सब संध्यान जु जैसे ॥
अपान वायु कुं ऊपर लावै । प्राण वायु नीचे लै जावै ॥
जोपै यह साधन बनि आवै । योगी बूढ़ा होन न पावै ॥
तरुण अवस्था देखै ऐसी । नितहीरहै जानिये जैसी ॥
अथ सूर्यभेदन ॥
कुं० कुम्भक सूरज भेदही, पहिले देहुं सुनाय ।
सुख आसन कै कीजिये, अथवा वज्र लगाय ॥
अथवा वज्र लगाय, पूरक दहिने स्वर कीजै ।
नख शिख सेती रोंकि, वायू कुं बन्ध करीजै ॥

७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बायें सेती रेचिये, हौरै हौरै जान ।
कपाल धौंकनीजानिये, चरणदास पहिचान ॥
दो० वायु किरम पीड़ा हरै, कीजै वारंबार ।
कुम्भक सूरज भेदनी, शुकदेव कहै हियधार ।
अथ ऊजाई ॥
अब ऊजाई कुम्भक सुनिये । समझ सीखमन माहीं गुनिये ॥
दोउ सुर समकर पवन चढ़ावै । पेट कण्ठ लौं ताहि भरावै ॥
ताको रोकै दृढ़ करि राखै । सहजइड़ा सों रेचक नाखै ॥
ऐसे जो कोई साधन करै । रोग सलेषम के सब हरै ॥
हिरदय कण्ठ माहिं जो होई । कफका रोग रहै नहिं कोई ॥
रोग जलन्धरही का भागै । भजै वायु दुख पावक जागै ॥
बैठत चलत पवनको भरै । यही उजाई कुम्भक करै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । तीजी शीतकार समुझावै ॥
अथ शीतकार
दो० ओड़ जँभाई नासिका, लीजै खिंचै जु पौन ।
ताहि कछू ठहरायकै, छोड़ै मुख सों जौन ॥
धीरे धीरे खैंचिये, सीसी शब्द उचार ॥
सुन्दर होवै तेजवन्त, अधिक रूप को धार ॥
भूख प्यास व्यापै नहीं, आलस नींद न होय ।
तनचेतनही होत है, रहै उपाधि न कोय ॥
यहि विधि साधतही रहै, होय योगिन मैं भूप ।
चरणदास शुकदेव कहि, कुम्भक यही अनूप ॥
अथ शीतली
कहूँ शीतली कुम्भक आगे । जो कोइ करै भागतिहि जागे ।
तालु मूल जिह्वा बल सेती । प्राण वायु पीवै कर हेती ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७५
कुम्भक राखै सबतन माहीं । ढीला गात रमावै ह्वाहीँ ॥
नासा सेती रेचक कीजै । एकमास सिधिहो सुखलीजै ॥
पीजै पवन जीभको मोड़े । सहजै छोड़ै नासा ओड़े ॥
दोनों रंध्रसे तजि दीजै । यों अभ्यास पूर करलीजै ॥
ताप तिली गोला ज्वर होई । वाके तनमें रहै न कोई ॥
देह पुरानी नूतन होय । तीनि वरष साधै जो कोय ॥
जैसे सांप केंचुली भौंहिं । श्वेत बाल तजि काले होहिं ॥
काहू भांतिका दुख नहिं व्यापै । भूख प्यास तिसभाजै आपै ॥
अथ भस्त्रिका ॥
दो० अबकहूँकुम्भकभस्त्रिका, पित कफ वायु नशाय ॥
अगिनि बढ़ै अभ्याससों, तीनि गांठि खुलिजाय ॥
आसनपद्म सुयाविधि करै । बामजंघ दहिनो पग धरै ॥
बावों पग दहिनी पर लावै । जांघनसों दोउहाथ मिलावै ॥
ग्रीवा पेट बराबर राखै । आगे सुनु शुकदेवा भाखै ॥
मुख मूदै रेचै नासासूं । पूरक चपल करै श्वासासूं ॥
रेचक पूरक ऐसे कीजै । वारंवार तजै अरु लीजै ॥
जैसे खाल लोहारा भरै । रेचक पूरक आतुर करै ॥
करत करत जबहिं थकिजावै । नेक ठहरि दूजी विधि लावै ॥
फिरि पूरक सूरजसों करै । पवन उदरके माहीं भरै ॥
तर्जनि अँगुली सों दृढ़ रोकै । नासामध्य धारकरि जोखै ॥
दो० कुम्भक पिछली भांतिकरि, रेच इड़ासों वाय ।
कफ पित वायु नशायकै, लेवै अग्नि बढ़ाय ॥
कुण्डलिनी देवैजगा, यह कुम्भक सुखदाय ।
करै जुहित व्रत धारिकै, चरणदास चितलाय ॥
कुण्डलिनी सरकायकै, बेधै तीनों गांठ ।

७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसी पँचवीं भस्त्रिका, रहै न कोई आंठ ॥
ब्रह्मनाड़िका के छिद्र माहीं। रोंकिरही मुखदेरहि ह्नाहीं ॥
लाय लपेटै नाभी ठाहीं। दृढ़है बैठी सरकै नाहीं ॥
सवा बिलस्त कि जाकीदेही। तामें अस्थित जीव सनेही ॥
शक्ति नांगिनी यही जु कहिये। याके भेद गुरूंसों लहिये ॥
महा अपरबल जागै नाहीं। ताते नर सब मरिमरि जाहीं ॥
कोइ इक योगी ताहि डुलावै। सुपमन बाट गगन लैजावै ॥
ब्रह्मरंध्र में जाय समावै। लगै समाधि बहुत सुखपावै ॥
जो कछु होय सो कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० शिव शक्ति भेलाभ वय, रहै न द्वितिया भाव ।
कुण्डलिनी परबोधका, जो कोइ करै उपाव ॥
शिष्यवचन ॥
व्यास पुत्र शुकदेवजी, किरिपाकरी दयाल ।
चरणदास आधीनही, समझो भयो निहाल ॥
एकबार फिरि खोलिकै, कुण्डलिनी समुझाव ।
याके सबही भेद को, सुनबेको अतिचाव ॥
गुरुवचन ॥
फिरभी तोसों कहतहौं, कुण्डलिनी विस्तार ।
ताके सगरे भेदही, सुनिकै हियमें धार ॥
नाभिस्थान नागिनि रहै, कुण्डल शशी अकार ।
प्राण पियारा वही है, आगे सुनो विचार ॥
कुंभक कर्म कोई करै, देवै शक्ति जगाय ।
जैसे लागी लष्टिका, नागन शीश उठाय ॥
सीखी गुरूंसों कुंभक साधै। नीकी विधि ताको अवराधै

पवन ठवकलग ताहि जगावै । तब ऊरध¹ को शीश उठावै ॥
नाभि ठौर ताका है वासा । पद्मराग मणि ज्यों परकासा ॥
सात लपेटे बाई जानौ । ताते शक्र कुण्डली मानौ ॥
नाड़ी सहस लगी हैं वाको । सोपर छुटी जानिको ताको ॥
जिनमें तीन नारि अधिकाई । इड़ा पिंगला सुषमन गाई ॥
तिनके माहिं शिरोमणिसुषमन । नालकमल जानतयोगी जन ॥
जायपहुंचि ब्रह्मरंधर ताहीं । ऊरध कमल सातवें माहीं ॥
आवन जोन पवन की बाटा । सकत चढ़न ऊरधका घाटा ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । आगे कहूं जुहो परकासा ॥
दो० नागिनि सूक्ष्म जानिये, बाल सहस वा भाग ।
शुकदेव कहैं अँकारही, रक्त बरण ज्यों नाग ॥
कुंभक हो अत्यन्त जब, तब ऊरधको जाय ।
ब्रह्मरंध्र में आयकर, घड़ी दोय ठहराय ।
अमृत का करि पानही, पूरण हो अभ्यास ।
उड़ते देखै सिद्धि तब, वाको माहिं अकास ॥
पै देखत है नैन विनाहीं । चहै करै लीला उन माहीं ॥
खेचर मिलि खेचर है जावै । यह भी शक्ति उड़नकी पावै ॥
अधिकी ठहरै लगै समाधा । यह तौ कहिये खेल अगाधा ॥
शिवशक्ती जहाँ मेला होई । होय लीन मन उनमन सोई ॥
योग युक्ति करि याको पावै । परासक्त अपने बल लावै ॥
चाहै अर्द्ध ठौर लैआवै । जब चाहै ऊरध लैजावै ॥
कबहूं हिरदयके मधि आनै । याही को आपनपौ जानै ॥
इच्छा करै सिद्धि की जैसी । होय प्राप्त सो वेगिहि तैसी ॥
चहै अस्थूल सूक्ष्म तन धारूं । वैसाही होय जाय सबारूं ॥


१ ऊपर ॥

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति सटीक लिप्यंतरण (transcription) प्रस्तुत है:

कहि शुकदेव सुन चरणहिंदासै। जो कुंडलिनी हृदयप्रकासै ॥
दो० कुण्डलिनी परकाशही, भौंरा एक अनूप ।
सोउ प्रकाशत है तहां, सुवरण कोसो रूप ॥
हिरदयमें उजियारही, होत चपल यहि भांति।
जैसे धूमर मेघमें, बिजलीही दमकाति ॥
कहि शुकदेव चरणदास बताऊं। और अनूठी सिद्धि सुनाऊं ॥
चाहै परदेही में बरूं। अपनी कायाको परिहरूूं ॥
रेकच प्राणायाम प्रतापै। कुण्डलिनी जो अपनी आपै ॥
रेचक किये बाहरे आवै। परकायामें जाय समावै ॥
अस्थिर होय जाय ज्यों जानो। सदा विराजत ऐसे मानो ॥
ऐसे पहिली देह गिरावै। ज्यों मणिको डोरा ,तजिजावै ॥
जब चाहै अपने घट माहीं। परासक्तही आवै छाही ॥
काया पलट कहत है याको। कोइक योगी जानत ताको ॥
दो० चाहै तनको छोड़ करि, देह कलप धरि और ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७६

अथ मूर्च्छा ॥
सतवीं कुम्भक मूरछा, पूरक ऐसे होय ।
खैंचत होवै सोरसा, मेघधार ज्यों जोय ॥
बन्ध जलन्धर दीजिये, सहज कण्ठ तल ताज ।
रेचित वाई मूरछित, होय यही पहिंचान ॥
सुखदायी सुखवृधि करन, कही सोइ शुकदेव ।
केवल कुम्भक आठवीं, गुरुसों पावै भेव ॥
पूरक रेचकही सहित, ये कुम्भक करि लेहि ।
केवल कुम्भकनामधै, जबलग ह्यां चित देहि ॥
केवल कुम्भक आशधरि, येहू साधत लोग ।
बलपावै वशपौन हो, और भजैं तन रोग ॥
अथ केवल कुम्भक ॥
आयु बढ़ावै सिद्धिदे, लागै और समाधि ।
केवल कुम्भक गुण भरी, बिन परमाण अगाधि ॥
केवल कुम्भक जब सधै, तब ये सब रहि जाहिं ।
जैसे सूरज उद्यते, तारे सब लुकि जाहिं ॥
केवल कुम्भक योग में, ज्यों नगरी में भूप ।
रेचक पूरक के विना, जैसे बँधा जु कूप ॥
सो तुम सों पहिले कही, विधिगति सब समुझाय ।
सो सुनि तुम हिरदयधरी, देहौना बिसराय ॥
प्राणायाम बड़ातप सोई । प्राणायाम सों बल नहिं कोई ॥
प्राण वायुको यह वश लावै । मनको निश्चल करि ठहरावै ॥
आयुर्दायको यही बढ़ावै । तनमें रोग रहन नहिं पावै ॥
पाप जलावै निर्मल करै । उपजै ज्ञान तिमिर सब हरै ॥
योग युक्ति की जड़ यह जानो । याहि टेकगहि करना ठानो ॥

८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
अड़ि आसनसों याको कीजै। नवो द्वार पटनीके दीजै॥
पांचौ इन्द्रीके रस पेलौ। इड़ा पिंगला सुपमन खेलौ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। प्रत्याहार सुनि विषै निरासा॥
इति चौथाप्राणायामअंग सम्पूर्णम् ॥
अथ पांचवां प्रत्याहारअंग वर्णन॥
दो०-प्रत्याहार जो पांचवां, समझाऊं चर्णदास।
शुकदेव कहकहूँ खोलकरि, नीके समझौ तास॥
प्रत्याहार पांचवां कहिये। सो योगीको निश्चय चहिये॥
विषय ओर इन्द्री जो जावै। अपने स्वादन को ललचावै॥
तिनकी ओर न जाने देई। प्रत्याहार कहावै एई॥
रोंकिरोंकि इन्द्रिनको लावै। ध्यान आतमा माहिं लगावै॥
जैसे कछुआ अंग समेटै। रंक शीतकाला में लेटै॥
जैसे माता पूत खिलावै। बालक वस्तू कों ललचावै॥
सरप आग अरु शस्तर कोई। कछू और दुखदायी होई॥
तिनको बालक नाहीं जानै। पकड़नको दौड़ै मन आनै॥
दो०-बालक जानत है नहीं, दुखदायी सब एह।
जो पकरूंगा हाथ से, दुख पावैगी देह॥
माता जानत है सबै, खोंटी खरी विकार।
राखै सुतको खैंचिकरि, वारंवार निहार॥
ऐसेही बुधि ज्ञान सों, पांचौ इन्द्री रोक।
विषय ओरसों फेरिये, लहै न अपना भोग॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८१
ज्यों ज्यों इनको भोगदै, परबल हाती जाहिं ।
विना भोग होहीं नहीं, वह बल रहै जुनाहिं ॥
नैन जु भोगैं रूप को, और गन्ध को घ्रान ।
षटरस भोगै जीभही, शब्दहि भोगै कान ॥
त्वचा भोगि अस्पर्शको, बाढ़ै अधिक विकार ।
पांचौ इन्द्री जानिले, इनका यही अहार ॥
इनसेमिलिमिलि मनबिगड़ि, होयगया कछुऔर ।
इन्द्री रोकै मन रुकै, रहै जु अपनी ठौर ॥
ज्यों ज्यो होवै प्राणवश, त्यों त्यों मनवश होय ।
ज्यों ज्यों इन्द्री थिररहें, विषयजाय सब खोय ॥
ताते प्राणायाम करि, प्राणायामहिं सार ।
पहिले प्राणायामकर, पीछे प्रत्याहार ॥
इति प्रत्याहारअंगसम्पूर्णम् ॥
अथ षष्ठधारणाअंग वर्णन ॥
दो० तत्त्वनकी कहुँ धारणा, तिनमें करै प्रवेश ।
शनैःशनैः साधिकरि, पहुँचे निर्भयदेश ॥
पहिले भूमि धारणा कीजै । ठौर कालजेमें चितदीजै ॥
पीतवरण चौकोर अकारो । विधि दैवत है तहां विचारो ॥
प्राण लीनकरि पांचघड़ीहीं । चित अस्थिर होवैगा जबहीं ॥
यासों पृथिवीको वश करिये । यही धारणा जो चित धरिये ॥
हिरदै से ऊपर जल जानो । कण्ठतईं ताको पहिंचानो ॥