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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 690 में से

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पृष्ठ 115

८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
अड़ि आसनसों याको कीजै। नवो द्वार पटनीके दीजै॥
पांचौ इन्द्रीके रस पेलौ। इड़ा पिंगला सुपमन खेलौ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। प्रत्याहार सुनि विषै निरासा॥
इति चौथाप्राणायामअंग सम्पूर्णम् ॥
अथ पांचवां प्रत्याहारअंग वर्णन॥
दो०-प्रत्याहार जो पांचवां, समझाऊं चर्णदास।
शुकदेव कहकहूँ खोलकरि, नीके समझौ तास॥
प्रत्याहार पांचवां कहिये। सो योगीको निश्चय चहिये॥
विषय ओर इन्द्री जो जावै। अपने स्वादन को ललचावै॥
तिनकी ओर न जाने देई। प्रत्याहार कहावै एई॥
रोंकिरोंकि इन्द्रिनको लावै। ध्यान आतमा माहिं लगावै॥
जैसे कछुआ अंग समेटै। रंक शीतकाला में लेटै॥
जैसे माता पूत खिलावै। बालक वस्तू कों ललचावै॥
सरप आग अरु शस्तर कोई। कछू और दुखदायी होई॥
तिनको बालक नाहीं जानै। पकड़नको दौड़ै मन आनै॥
दो०-बालक जानत है नहीं, दुखदायी सब एह।
जो पकरूंगा हाथ से, दुख पावैगी देह॥
माता जानत है सबै, खोंटी खरी विकार।
राखै सुतको खैंचिकरि, वारंवार निहार॥
ऐसेही बुधि ज्ञान सों, पांचौ इन्द्री रोक।
विषय ओरसों फेरिये, लहै न अपना भोग॥