भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंपवन ठवकलग ताहि जगावै । तब ऊरध¹ को शीश उठावै ॥
नाभि ठौर ताका है वासा । पद्मराग मणि ज्यों परकासा ॥
सात लपेटे बाई जानौ । ताते शक्र कुण्डली मानौ ॥
नाड़ी सहस लगी हैं वाको । सोपर छुटी जानिको ताको ॥
जिनमें तीन नारि अधिकाई । इड़ा पिंगला सुषमन गाई ॥
तिनके माहिं शिरोमणिसुषमन । नालकमल जानतयोगी जन ॥
जायपहुंचि ब्रह्मरंधर ताहीं । ऊरध कमल सातवें माहीं ॥
आवन जोन पवन की बाटा । सकत चढ़न ऊरधका घाटा ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । आगे कहूं जुहो परकासा ॥
दो० नागिनि सूक्ष्म जानिये, बाल सहस वा भाग ।
शुकदेव कहैं अँकारही, रक्त बरण ज्यों नाग ॥
कुंभक हो अत्यन्त जब, तब ऊरधको जाय ।
ब्रह्मरंध्र में आयकर, घड़ी दोय ठहराय ।
अमृत का करि पानही, पूरण हो अभ्यास ।
उड़ते देखै सिद्धि तब, वाको माहिं अकास ॥
पै देखत है नैन विनाहीं । चहै करै लीला उन माहीं ॥
खेचर मिलि खेचर है जावै । यह भी शक्ति उड़नकी पावै ॥
अधिकी ठहरै लगै समाधा । यह तौ कहिये खेल अगाधा ॥
शिवशक्ती जहाँ मेला होई । होय लीन मन उनमन सोई ॥
योग युक्ति करि याको पावै । परासक्त अपने बल लावै ॥
चाहै अर्द्ध ठौर लैआवै । जब चाहै ऊरध लैजावै ॥
कबहूं हिरदयके मधि आनै । याही को आपनपौ जानै ॥
इच्छा करै सिद्धि की जैसी । होय प्राप्त सो वेगिहि तैसी ॥
चहै अस्थूल सूक्ष्म तन धारूं । वैसाही होय जाय सबारूं ॥
१ ऊपर ॥