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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 690 में से

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पृष्ठ 114

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७६

अथ मूर्च्छा ॥
सतवीं कुम्भक मूरछा, पूरक ऐसे होय ।
खैंचत होवै सोरसा, मेघधार ज्यों जोय ॥
बन्ध जलन्धर दीजिये, सहज कण्ठ तल ताज ।
रेचित वाई मूरछित, होय यही पहिंचान ॥
सुखदायी सुखवृधि करन, कही सोइ शुकदेव ।
केवल कुम्भक आठवीं, गुरुसों पावै भेव ॥
पूरक रेचकही सहित, ये कुम्भक करि लेहि ।
केवल कुम्भकनामधै, जबलग ह्यां चित देहि ॥
केवल कुम्भक आशधरि, येहू साधत लोग ।
बलपावै वशपौन हो, और भजैं तन रोग ॥
अथ केवल कुम्भक ॥
आयु बढ़ावै सिद्धिदे, लागै और समाधि ।
केवल कुम्भक गुण भरी, बिन परमाण अगाधि ॥
केवल कुम्भक जब सधै, तब ये सब रहि जाहिं ।
जैसे सूरज उद्यते, तारे सब लुकि जाहिं ॥
केवल कुम्भक योग में, ज्यों नगरी में भूप ।
रेचक पूरक के विना, जैसे बँधा जु कूप ॥
सो तुम सों पहिले कही, विधिगति सब समुझाय ।
सो सुनि तुम हिरदयधरी, देहौना बिसराय ॥
प्राणायाम बड़ातप सोई । प्राणायाम सों बल नहिं कोई ॥
प्राण वायुको यह वश लावै । मनको निश्चल करि ठहरावै ॥
आयुर्दायको यही बढ़ावै । तनमें रोग रहन नहिं पावै ॥
पाप जलावै निर्मल करै । उपजै ज्ञान तिमिर सब हरै ॥
योग युक्ति की जड़ यह जानो । याहि टेकगहि करना ठानो ॥