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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति सटीक लिप्यंतरण (transcription) प्रस्तुत है:

कहि शुकदेव सुन चरणहिंदासै। जो कुंडलिनी हृदयप्रकासै ॥
दो० कुण्डलिनी परकाशही, भौंरा एक अनूप ।
सोउ प्रकाशत है तहां, सुवरण कोसो रूप ॥
हिरदयमें उजियारही, होत चपल यहि भांति।
जैसे धूमर मेघमें, बिजलीही दमकाति ॥
कहि शुकदेव चरणदास बताऊं। और अनूठी सिद्धि सुनाऊं ॥
चाहै परदेही में बरूं। अपनी कायाको परिहरूूं ॥
रेकच प्राणायाम प्रतापै। कुण्डलिनी जो अपनी आपै ॥
रेचक किये बाहरे आवै। परकायामें जाय समावै ॥
अस्थिर होय जाय ज्यों जानो। सदा विराजत ऐसे मानो ॥
ऐसे पहिली देह गिरावै। ज्यों मणिको डोरा ,तजिजावै ॥
जब चाहै अपने घट माहीं। परासक्तही आवै छाही ॥
काया पलट कहत है याको। कोइक योगी जानत ताको ॥
दो० चाहै तनको छोड़ करि, देह कलप धरि और ।