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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 690 में से

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पृष्ठ 116

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८१
ज्यों ज्यों इनको भोगदै, परबल हाती जाहिं ।
विना भोग होहीं नहीं, वह बल रहै जुनाहिं ॥
नैन जु भोगैं रूप को, और गन्ध को घ्रान ।
षटरस भोगै जीभही, शब्दहि भोगै कान ॥
त्वचा भोगि अस्पर्शको, बाढ़ै अधिक विकार ।
पांचौ इन्द्री जानिले, इनका यही अहार ॥
इनसेमिलिमिलि मनबिगड़ि, होयगया कछुऔर ।
इन्द्री रोकै मन रुकै, रहै जु अपनी ठौर ॥
ज्यों ज्यो होवै प्राणवश, त्यों त्यों मनवश होय ।
ज्यों ज्यों इन्द्री थिररहें, विषयजाय सब खोय ॥
ताते प्राणायाम करि, प्राणायामहिं सार ।
पहिले प्राणायामकर, पीछे प्रत्याहार ॥
इति प्रत्याहारअंगसम्पूर्णम् ॥
अथ षष्ठधारणाअंग वर्णन ॥
दो० तत्त्वनकी कहुँ धारणा, तिनमें करै प्रवेश ।
शनैःशनैः साधिकरि, पहुँचे निर्भयदेश ॥
पहिले भूमि धारणा कीजै । ठौर कालजेमें चितदीजै ॥
पीतवरण चौकोर अकारो । विधि दैवत है तहां विचारो ॥
प्राण लीनकरि पांचघड़ीहीं । चित अस्थिर होवैगा जबहीं ॥
यासों पृथिवीको वश करिये । यही धारणा जो चित धरिये ॥
हिरदै से ऊपर जल जानो । कण्ठतईं ताको पहिंचानो ॥