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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ऐसे कहि कर गहि लै चाले। पार नदी के जंगल घाले ॥
शुभकरणी को करि वह राजा। अपने महलन जाय बिराजा ॥
इतसे भी उत सुख बहुभारी। ना कोइबैरी ना जंजारी ॥
अपनी करणी से सुख पावै। रहै अशोक न चिन्ता आवै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। शुभ करणी करि पाया बासा ॥
दो० ऐसे मानुष देह को, जानहुँ नगर समान।
राजा यामें जीवहै, शुभकरणी परमान ॥
नाहिं तौ चौरासी जङ्गल है। भांति भांतिका जितही भौ है ॥
पशू पशूको जित भषिजावै। नित भयमानि नहीं सुख पावै ॥
बहु दुख पावै खोटी करनी। जैसी करनी तैसी भरनी ॥
शुभकरनी को जो नर धावै। बहुत भांति सुख सुरपुरजावै ॥
दो० भूप उमरअपनी किया, अपना पूरण काम।
ऐसेही शुभ कर्म्म सों, तुमहूँ पावो धाम ॥
अरु इक कथा कहौं अतिनीकी। जा सुनिजाय अविद्या१ जीकी ॥
इक राजा था बहु परबीना। सो वह पुत्र विनाथा हीना ॥
एक समय वहि रोग जुआया। पुत्र बिना बहुतै कलपाया ॥
कौनकाज अब ह्यांको करिहै। जो मेरो देहीं यह मरिहै ॥
यह मन करत सिद्ध इकआया। राजाने सब वाहि सुनाया ॥
सिद्ध कही सुत गोदं घलावो। बेटाकरि तिहिराज बिठावो ॥
राजा कही जु ध्यान लगावो। राज भाग में ताहि बतावो ॥
फिरिउनकही जुखोलि दिखाऊं। साहूकारका पुत्र बताऊं ॥
वाके भाग्य लिखा यह राजा। ताको सुत करि कीजै काजा ॥
फिर उन वाकोगोद जु लीन्हा। ह्यांको रोज काज सब दीन्हा ॥
कोइक दिनमें उन तनत्यागा। पुत्र राज्य करने तब लागा ॥
१ मूर्खता २ बैठालेव ॥

धर्मजहाजवर्णन ४१
राज्य पितासों नीका कीन्हा । प्रजाआदिको सब सुख दीन्हा ॥
दो० राज करत वर्षे भई, सुखले अरु सुख दीन ।
नगर मध्य वाके कोऊ, विना द्रव्य नहिं हीन ॥
एक दिना ऐसो भो काजा । सोवत चौकि उठा वह राजा ॥
भोर भये सब फौज बुलाई । हरिकी आज्ञा सो समुझाई ॥
कहा जहांतक परजा मेरी । ताको लूटो जाय सबेरी ॥
आज्ञा ले सब फौज पधारी । प्रजा लूटि लई तिन सारी ॥
दूजे कही कि हां तुम जावो । लूटे सब ते भवन जलावो ॥
घर परजाके सभी जलाये । नीच ऊंचने बहुदुख पाये ॥
तीजे वचन भूप यों भाखो । कहाफौज सों खोज न राखो ॥
शस्त्र¹ सों बड़े बड़े नर मेलो । लड़के वाले कोल्हू पेलो ॥
यह सुनि सकलप्रजाघिरिआई । राजा पास पुकार सुनाई ॥
बहुतक राजा भये अनूठा² । अपनी प्रजा नहीं कोहुं लूटा ॥
दो० पहिले सबको सुख दिया , अब भे तुम दुखदाय ।
कारण यह कहि दीजिये , सबही को समुझाय ॥
यह कहि साहूकार ने , जो था वाका बाप ।
कुयश चला संसार में , बहुत लगाये पाप ॥
साहुकार पण्डित घने , और बड़ेही लोग ।
कोल्हूकी सुनि कतल³ की, बहुतक माना शोग ॥
आये हैं फरयाद⁴ को , सुने बिगड़ते काज ।
सकल प्रजाको मारिकै , किसकाकरिहौ राज ॥
संकल प्रजा तुव शरणहैं , बकसि देव महराज ।
अपनी अपनी भूमि में , फेरि बसैं सब साज ॥
राजा कही सु मैं नहिं जानूं । अपने मुख से कहा बखानूं
१ हथियार २ उत्तम ३ मारना ४ गोहारि

४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कहा पुरुष सो इक तुम आनौ । जिनका कहासांच तुममानौ ॥
यह सुनि जवाब सवालहि वारे । आकरि बैठे सबन मँझारे ॥
सो इक नर बहुतै इतबारी । जिनकीसाखिहुतीबहु भारी ॥
तिनको लै राजा के पासा । खड़े किये सब चरणन दासा ॥
राजा उठि उन्हीं के माहीं । मिलि बैठो पुनि वाही ठाहीं ॥
राजा कही जु हरि की ओरैं । ध्यान लगावो मनको मोरैं ॥
घड़ी चारि जब ध्यानलगाया । नभ से शब्द यही जो आया ॥
दो० ढील भूप तैं क्योंकरी , इनकी कीजै जेल ।
बड़े कतलही कीजिये , छोटे कोल्हू पेल ॥
तीनहिं बार लगाया ध्यानी । वारंवार यही भइ बानी ॥
भूप कही कहा दोष हमारा । कोपित भयो जो सिरजनहारा १ ॥
अब तुम परजासों कहि देवो । कतल पेलना कोल्हू लेवो ॥
आय नरनकहि सबमें खोली । सुनि परजा ऐसे उठि बोली ॥
कहन सकल आपस में लागे । हम हैं मूरख बड़े अभागे ॥
हम शुभकर्म कबहुँ नहिं कीन्हे । तिथि पर्वहि केहुदाननदीन्हे ॥
कथा कीर्त्तन में नहिं कहे । कुटुंब जाल में पागे रहे ॥
हरि की भक्ति नहीं चित लाई । ताते अब होतो मुकताई ॥
दो० हरी ही को बिसराइया , पूत महल के काज ।
नाम रहैगो जगत में , सो भी रहा न आज ॥
चले नरक को निश्चय जैहैं । मार यमों की निश्चय खैहैं ॥
कांपत है सब देह हमारी । आपस में भावैं नर नारी ॥
ऐसे ही सब रो रो बोलैं । ब्याकुल भये धरणिमें डोलैं ॥
एक ठाँव ह्वै मता उपाया । सो राजा को जायसुनाया ॥
करजोरे मुख तृण गहिलीन्हे । नखशिखलौं तनदीन जुकीन्हे॥
१ पैदा करनेवाला ॥

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४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकग्रन्थ ।
यह सुनि परजा सब हरषाई । अपने अपने घरको आई ॥
कोउ सिरकी कोउ छप्पर डारा । पका मंदिर नाहिं विचारा ॥
चोरी जारी सबै बिसारी । ढीले भये सभी व्योहारी ॥
अरु साधुनकी वृत्ती धारी । बालक युवा जेंरठ नरनारी ॥
रहे नहीं वै खोटे मनके । भये तपस्वी कृश सब तनके ॥
दो० जो कछु गाड़ो द्रव्य गृह, करी न ताकी आंट ।
राखि लिया षटमास का, अरु सब दीन्हा बांट ॥
जिते धनिक तिन सब यह कीन्हा । हते अनाथ तिनहि दैदीन्हा ॥
कहैं परस्पर धन कहा करिहैं । छठे महीना पीछे मरिहैं ॥
यही समझि उपजा बैरागा । सकलइन्द्रियन का रस त्यागा ॥
फीके लगे भोग सब जगके । सहज काम तब छूटे अघके ॥
सबकी दशा एक जो भई । मौत जानि करि चिन्ता ठई ॥
दिन दिन दुर्बल होते जावैं । हरिहीका जप ध्यान लगावैं ॥
एक एक दिन लागै प्यारा । भजन करैं जगिन्यारा न्यारा ॥
हठ अरु वाद न कोऊ ठानै । इक इक घरी अमोलकि जानै ॥
कहैं कि खोवैं तौ कित पावैं । कथा कीर्तन सों चित लावैं ॥
कथा कीर्तन जित तित होई । साधु समागम ह्वै गये सोई ॥
घरघर शुभ कर्मन व्योहारा । धर्म पकड़ि अधरम सब डारा ॥
ज्यों ज्यों दिवस अवधिके आवैं । घने घने शुभ कर्म कमावैं ॥
दो० जाको होवै मौतभय, जगमें लगै न चित्त ।
झुकै रामकी ओरही, बहुत लगावै हित्त ॥
उन पुरुषनकी यह गति भई । जगकी चाल डारि सब दई ॥
लाड़ चाव व्योहार न कोई । ब्याह सगाई पुत्र न होई ॥
काम क्रोध नहिं उपजै मोहा । लोभ मान नहिं प्रीति न द्रोहा ॥
१ चाल २ वृद्ध ३ प्रेम ४ गुणों का गान करना ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४५
ऐसे रहि शुभ कर्म्म जु करें । सदा मौत से सब जन डरें ॥
सहज सहज फिरि वहदिन आया। डरे नहीं शुभकर्म्म कमाया ॥
आपसमें कहें हमको क्या है। यमकी मार नरक भय नाहै ॥
राजा जान्यो वह दिन आया। अपना सेवक तुरत पठाया ॥
कही कि फौज सबै वनि आवैं । कतल करन परजा को धावैं ॥
फौजें सजिकरि ठाढ़ी भईं । आज्ञा ओर दृष्टि जो दई ॥
राजाके मन ऐसी आई । उन सब पुरुपन लेहुँ बुलाई ॥
सांचे सबही के इतवारी । फेरि बुलावो अवकी वारी ॥
यही शोचि फिरि शीश उठाया। आज्ञाकारी निकट बुलाया ॥
दो० कामदार सों यों कही, वैसो पुरुप बुलाय ।
जिनमें मिलिवैठा प्रथम, हरिसों ध्यान लगाय ॥
फिरि उनहिंन को लियो बुलाई। मिलि बैठा सबका सुखदाई ॥
कहीकि सब मिलि सुरति उठावो। रामओर को ध्यान लगावो ॥
अज्ञा होय सोइ तुम मानौ । मेरा दोप कछू मत जानौ ॥
मोको अज्ञा होय सो करिहौं। अपने हिये नेकनहिं धरिहौं ॥
राजा कहि मिलि ध्यान लगाया। ऐसा शब्द गगनसों आया ॥
राजा मैं अब बकसि दियाहै। सकल प्रजाको शुद्ध हियाहै ॥
जिन पर मोको कोप भया था। तिनके कारण खड्ग लियाथा ॥
सर्व प्रजा सो वातें डारी। करिसुकर्म हरिभक्ति सँभारी ॥
दो० ताते अज्ञा यों दई, रचो कुटुँव घरवार ।
शुभकर्म्मन को कीजिये, खोटे कर्म्म निवार ॥
राजाकही खोलि दृग दीजै। अज्ञाभई सोई अब कीजै ॥
खोलि आँख कर जोरिके भाखे। बकसे गये तुम्हारे राखे ॥
जो तुम कहौ सोई अब करें। बचन तुम्हारे हिरदय धरें ॥
राजा कही यही तुम कीजो। रामनामको संगी लीजो ॥

४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुको ध्यान धरो मनमाहीं । विपति जासुसों आवतनाहीं ॥
अपनी त्रिया त्रियाकरि जानो । परतिरियाको माता मानो ॥
परधन को पाहन १ सम देखो । शुभकर्मनको करो विशेखो ॥
बोलौ सांच झूठको नाखो । निन्दा हिंसा नेक न राखो ॥
है रहियो सबके सुखदाई । करुवा वचन न बोलौ भाई ॥
जो व्यवहार करौ सो सांचा । लोक प्रलोक न आवै आंचा ॥
दो० भाषत श्रीशुकदेवजी, सुनौ चरणही दास ।
राजा ने उपदेश दै, खोई सबकी त्रास ॥
फिरि वै पुरुष बिदा है आये । हरि राजाके वचन सुनाये ॥
जिन बातनसों बकसे सारे । सो रखियो तुम हिये मँझारे ॥
उज्ज्वल कर्म भूलि मति जैयो । हरिकीभक्ति माहिँही रहियो ॥
सुनिकरि आपसमें फैलाई । एक एक ने सुनी सुनाई ॥
सबने मानी निश्चय कीन्ही । प्रकट २ सुअपनी आंखिनं चीन्ही ॥
हाथ कँगनको दर्पण केहा । जैसी करणी भुगतै जेहा ॥
खुशीभये लागे व्यँवहारा । रामभक्तिको लिये सँभारा ॥
कहि शुकदेव चरणहीदासा । सकल प्रजा रहै उमगहुलासा ॥
दो० चरणदास सुनिये श्रवण, मैं उपदेशूं तोहिं ।
जो पहिले हरिको भजै, पाछे दुःख न होहिं ॥
कथा कहौं इक और पुरानी । करणी करै सुसमुझै प्रानी ॥
इन्दुनाम इक ब्राह्मण हुता । जाके दश सुत अरु इक सुता ॥
सुता व्याहि दइ घरकी हुई । जाके पीछे माता मुई ॥
पिता मुवा दश पुत्र रहेथे । आपसमें सब बैठि कहेथे ॥
ऐसी कछू जु करणी कीजै । जगमें ऊंची पदवी लीजै ॥
इकने कही हूजिये भूपा । सुन्दर देही धरौ अनूपा ॥
१ पत्थर २ जाहिर ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४७
तेज मुल्कमें होवै भारी । हुकुम जुमानैं नर अरु नारी ॥
और एक ऐसे उठि बोला । सावधान ह्वै अन्तर खोला ॥
दो० राजाही का हुकम तो, थोरेही में जोय ।
ऐसी करणी कीजिये, भूपचक्रवै होय ॥
एकद्वीप नौखण्ड में, जाको पूरो राज ।
एक और उठि बोलिया, यह भी ओछा साज ॥
चक्रवर्त्ति१ में इन्द्र बड़, देवन हूँ को भूप ।
उम्र बड़ी आनंद बड़े, दुख की लगै न धूप ॥
करणी करत इन्द्रही लोगा । होकर राजा कीजै भोगा ॥
जहाँ अप्सरा नृत्य करत हैं । सुन्दर अधिकी रूप धरत हैं ॥
और बड़ा भाई यों भाखा । सुरपतिहूको नाहीं राखा ॥
कहा कि पदवी ब्रह्माकीसी । और न दीखै काहू हीसी ॥
जाके एक दिवसही माहीं । चौदह इन्द्र सर्व ह्वै जाहीं ॥
सब ब्रह्मण्ड आसरे वाके । बिनशिजायँ मिटिजायँ जाके ॥
तीनि लोकका पिता वही है । वेद पुराणन माहँ कही है ॥
करणी करिकरि ब्रह्मा हूजै । ऐसी पदवी क्यों नहिं लीजै ॥
दो० सगरे यों उठि बोलिया, सत्य सत्य यह बात ।
ऐसाही अब कीजिये, ठहराई सब भ्रात ॥
दशहू करन तपंस्या लागे । पारब्रह्मकी ओरी पागे ॥
अधिक तपस्या कीन्ही भारी । मास सूखिगया दीखैं नारी ॥
हाड़ त्वचा२ चिपटी रहगई । लोहू धातु३ कछू ना ठई ॥
सब जन चित्रहिसे रहगये । कठिन तपस्या करते भये ॥
फूलपात जलहू नहिं लीन्हा । ऐसा तप दशहूने कीन्हा ॥
तन त्यागे दूजेही जन्मा । दशहू भ्रात हुये जो ब्रह्मा ॥
१ चारों दिशाओं का राजा २ खाल ३ वीर्य ॥

४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिनके दश ब्रह्माण्ड बने हैं। एकएक तिनमाहिं ठने हैं ॥
करणी कबहुँ न निष्फल जावै । जो मनधारे सोई पावै ॥
दो० करणी सों भये इन्द्रहु, करणी ब्रह्मा सोय ।
करणी सों ईश्वर भये, शुकदेवा कहै गोय ॥
दश हजार इक बीसही, वर्ष तपस्या कीन्ह ।
हरिजाको बदलो दियो, मांगो सो वर दीन्ह ॥
चारौ युगके माहिं जो, करणीही परधान१ ।
गुरु शुकदेवा कहत है, चरणदास उरआन ॥
उज्ज्वल कर्म्मन के कियें, दिनदिन उज्ज्वलहोय ।
मनमें उपजै भक्तिही, प्रेम पदारथ सोय ॥
चरणदास तुम करणी कीजो । याही में मन नीके दीजो ॥
ऐसा जन्म बहुरि नहिं पैहै । बीतिजाय पुनि बहु पछितै हैं ॥
मनुष देह को दुर्लभ जानौ । याको पा शुभकरणी ठानौ ॥
यो देही में करी कमाई । जाय स्वर्ग में नौनिधि पाई ॥
भक्तिकरी देही के माहीं । जा बैकुण्ठ सु आये नाहीं ॥
या देही में ज्ञान भया है । जीव ब्रह्म जो होय गया है ॥
मूरख करणी को नहिं जानै । कथनी कथिकथि बहुत बखानै ॥
थोथी कथनी काम न आवै । थोथा फटकै उड़ि उड़ि जावै ॥
दो० कथनीही के बीचमें, लीजो तत्त्व२ विचार ।
सार सार गहि लीजियो, दीजो डारि असार ॥
थोथी कथनी वही जु जानौ । बिन करणी जो करै बखानौ ॥
लोक प्रलोक न शोभा पावै । बकिबकिबकि खाली रहिजावै॥
कथनी के शूरा बहु जाने । करणी में कायर अरु याने ॥
शूरा वही जु करणी करै । दया धर्म्मलै सन्मुख अरै ॥
१ मुख्य २ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४६
पाँव धरे सो नाहीं उठावै । करणी करता चला जु जावै ॥
फिरै जबहिं फल लैकर आवै । सो वह शूरा मल्ल कहावै ॥
कायर बीचहि सों फिरि आवै । सो वह करणी को बिसरावै ॥
आपन खोट न जानै भोंदू । वह तौ कथनीही का गोंदू ॥
दो० ऐसे जगमें बहुत हैं, वैसे जगमें नाहिं ।
कोई कोइहि देखिये, सतगुरु के मग माहिं ॥
होनहार को बहुत बतावैं । पै ताको कछु मर्म न पावैं ॥
कहैं कि होनी होय सुहोई । ताको मेटिसकै नहिं कोई ॥
याको समझ उपाय न करिया । श्रद्धा तजि कायरह्वै परिया ॥
समझि निखट्टु¹ गृही भहे । वेष धारि बिन करणी रहे ॥
जानतनाहिं जु पिछिली करणी । अब कै भई जु होनी भरणी ॥
परालब्ध² अरु भाग्य कहावै । पिछले कर्म्मन से उपजावै ॥
अबके करै सु आगे पावै । कछू कछू फल अभी दिखावै ॥
कै काहू गाली दै देखो । कै काहू को मारि विशेखो ॥
कै काहूको अशन खवावो । कै काहूको शीश नंवावो ॥
कै करि चोरी द्यूतहि³ खेलौ । कै काहूको गुस्सा झेलौ ॥
दोनों का फल आगे आवै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
प्रगट देखिये यही तमाशा । नीच ऊंच करणी परकाशा ॥
दो० कोटि यही उपदेश है, यही जु सगरी बात ।
करणीही बलवंत है, यों शुकदेव दिखात ॥
मनकी करणी ज्ञान है, परमातम लखिलेय ॥
ब्रह्मरूप है जाय जब, छूटै सबही भय ॥
भवसागर⁴ में भय घने, ताकी लगै न आंच ॥
झूठेको भय बहुत है, भय नहिं व्यापै सांच ॥
१ कोईकाम न करनेवला २ कर्म्म ३ जुवां ४ संसार ॥

५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
करणीही सों पाइये, पारब्रह्म का खोज ।
सतगुरु पै चलि जाइये, मेटै सबही सोज ॥
इच्छाब्रह्म करी सोइ करणी । ईश्वर रूप धरालै धरणी ॥
महतत् करि अहँकार जुकीये । तीनरूप^१ उनको करिदीये ॥
राजस^२ तामस^३ सात्त्विक^४ जानौ । एही त्रैगुण मनमें आनौ ॥
राजस सों जगको उपजावै । सात्त्विक सों पालै सिरजावै ॥
तामस सों विनशावै तोड़ै । बहुत सृष्टि नहिं भूपर जोड़ै ॥
जोड़ै तौ वह कहां समावै । धरती का परमाण^५ कहावै ॥
योजन पचास क्रोड़ बताई । वेद पुराणन में जो गाइ ॥
धरती करणीही सों ठाढ़ी । कछुवा शेष भये जो आढी ॥
करणीही सों घन वरसावै । वादल मिलती पवन चलावै ॥
दो० करणी सों करतारही, धरा ब्रह्म का नावँ ।
माया भी तौ उन करी, खेली बहु विधि दावँ ॥
कोई निराकार बतलावै । कोई निर्गुण कहि समझावै ॥
कोइ कहै दोनों से न्यारा । है जु अकर्त्ता अलख^६ अपारा ॥
कहैं कि माया कियो पसारा । जेता दीखै यह संसारा ॥
तौ कहु माया कितसों आई । अन्त यही हरिने उपजाई ॥
वही सृष्टि का कारण काजा । वाने जगत प्यारकरि साजा ॥
देह देह में वह दरशावै । चतुर हो चतुराई पावै ॥
जैसे बरतन गढ़ै कुम्हारा । सव में दीखै सिरजनहारा^७ ॥
चित्र^८ मध्य चित्रामी सूझै । सुरति लगाय लगाय उरूझै ॥
जवहीँ बनी वनाई नीकै । कहि शुकदेवजु अपने जीकै ॥
१ ब्रह्मा विष्णु महेश २ रजोगुण ब्रह्मा ३ तमोगुण शिव ४ सतोगुण विष्णु
५ अंदाज ६ न देखपड़नेवाला ७ बनानेवाला ८ तस्वीर ॥

धर्मजहाजवर्णन । ५१
दो० बिना किये कछु होयना, आपहि लेहु विचार ।
करणी देखी दूर लों, शोचा वारंवार ॥
चरणदास तोसों कहौं, उठि उद्यम को लाग ।
आलस सकल गवांयकै, विषयन² में मतिपाग ॥
कारज लोक प्रलोक के, विन करणी हो नाहिं ।
करणी ही सों होतहैं, करणी सबके माहिं ॥
खोटे कर्म्मन सों दुखी, या दुनिया के बीच ।
करणी ही सों होतहै, नर ऊंचा अरु नीच ॥
संगति मिलि करने लगे, ऊंचे नीचे कर्म्म ।
बुद्धि मैली जो होति है, खोवै अपना धर्म्म ॥
सतसंगति सों रहत है, धर्म्म कुसंगति जाय ।
चरणदास शुकदेव कहि, दोनों दिये दिखाय ॥
धर्म गया जब सत गया, भ्रष्ट भई अति बुद्धि ।
तबहिं पाप अरु पुण्यकी, कछू रही ना शुद्धि ॥
पाप पुण्यही सत्य है, ठहरि रहा ब्रह्माण्ड ।
इन दोनों के मिटतही, होत खण्डहू खण्ड ॥
पाप पुण्य व्यवहार है, ताहि देखि प्रत्यक्ष ।
जाही सेती प्रेत यम, देवत गण अरु यक्ष ॥
चौरासी अरु पुरुष सब, चंद सूर³ लौं जान ।
पाप पुण्य के फेर में, सबही पड़े पिछान ॥
पाप किये नरकै पड़े, पावै दुःख अपार ।
पुण्य किये सुख बहुत है, देखो दृष्टि उघार ॥
विरले जन को होत है, पाप पुण्य की सूझ ।
सोइ छुटै जग जाल सों, बहुतै रहै अरूझ ॥
१द्वन्ध २ काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ३ सूर्य ॥

५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लक्ष बात की बात है, कोटि बात की जान ।
पाप पुण्य सों जानिये, लाभ होय कै हान ॥
करणी बिन थोथा रहै, कछू न पावै भेव ।
विभव प्राप्त कहुँ होयना, कहैं जु यों शुकदेव ॥
होनी कहैं जु वेभी सारे । करणी करते दृष्टि निहारे ॥
बिन करणी व्यवहार न चालै । नहीं तौ बैठे रहजा ठालै ॥
कृत्य करै सो भी यह करणी । बनिया हाट पांडिया वरणी ॥
करणीही सों खावै पीवै । योग करै बहुतै दिन जीवै ॥
मन मांजै सबही परकाशै । करणीबिन झूठी सब आशै ॥
करणीही सों सिधि द्वै जावै । अष्टसिद्धि करणी सों पावै ॥
जीवन्मुक्ती करणी हेती । सुनिले सकल शास्त्र१ सों तेती ॥
गुरु सों निश्चय यहै जु कीनी । रणजोता मैं तुम को दीनी ॥
दो० यह तौ धर्म जहाज है, मैं तोहिं दई निहार ।
भवसागर मों डारियो, चढ़ै सो उतरै पार ॥
बादवान पुनि खेइयो, दीजो ताहि चलाय ।
पानी पाप निकासियो, नेकहु ना भरिजाय ॥
चढ़ि उतरै जो पारही, पावै सुख का धाम ।
आनँदही आनँद लहै, करै तहां विश्राम ॥
शिष्यवचन ॥
दो० धन्य श्रीशुकदेव हो, वचन तुम्हारे धन्य ।
सब संदेह मिटाय करि, निश्चल कीन्हो मन्य ॥
व्यास पुत्र तुम मम गुरु देवा । करूं मान२सी तुम्हरी सेवा ॥
मन में तुम्हरी पूजा साजू । तुमसों पूंछ करौं सब काजू ॥
मेरे ध्यान शिताबो आये । जो थे सो सन्देह मिटाये ॥
१ सांख्ययोग मीमांसा न्याय वैशेषिक धर्मशास्त्र २ जो मन में की जाय ॥

धर्मजहाजवर्णन । ५३
मैं तौ ध्यान करतही रहूँ। तुम्हरी मूरति हिरदय गहूँ ॥
मेरे जीवन प्राण अधारा । मैं नहिं रहौं चरण से न्यारा ॥
तुम्हरो चरणन दास कहाऊं । वार वार तुम पै बलि जाऊं ॥
तुम्हीं को ईश्वर करि मानूं । पारब्रह्म तुम्हीं को जानूं ॥
और न कोई दूजी आसा । मो हिरदय में राखौ वासा ॥
दो० अपने चरणहिं दास को, सब विधि दिया अघाय ।
स्तुतिकरूं तौ क्या करूं, मोपै कही न जाय ॥
इति श्रीगुरुचेलेका संवादधर्मजहाजसम्पूर्णम् ३ ॥
अथ श्रीगुरुशिष्यसंवादअष्टाङ्ग
योग प्रारम्भः ॥
शिष्यवचन ॥
दो० व्यासपुत्रधनिधनि तुम्हीं, धनि धनि यह अस्थान ।
मम आशा पूरी करी, धनिधनि वह भगवान ॥
तुम दर्शन दुरलभ महा, भये जु मोको आज ।
चरण लगो आपादियो, भये जु पूरण काज ॥
चरणदास अपनोकियो, चरणन लियो लगाय ।
शिरकरधरिसबकछुदियो, भक्तिदई समुझाय ॥
बालपने दरशन दिये, तबहीं सब कछु दीन ।
बीज जु वोया भक्तिका, अब भया वृक्ष नवीन ॥
दिन दिन बढ़ता जायगा, तुम किरपा के नीर ।
जबलगमाली ना मिला, तवलग हुता अधीर ॥
अरु समुझाये योगही, बहु भांती बहु अंग ।

५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऊरधरेता ही कही, जीतन बिंद अनंग ॥
अरु आसन सिखलाइया, तिनकी सारी विद्धि ।
तुम्हरी कृपा सों होहिंगे, सबही साधन सिद्धि ॥
इक अभिलाषा और है, कहि न सकूं सकुचाय ।
हिये उठे मुख आयकरि, फिरि उलटी ही जाय ॥
गुरुवचन ॥
दो० सतगुरु से नहिं सकुचिये, एहो चरणहि दास ।
जो अभिलाषा मन विषे, खोलि कहौ अब तास ॥
शिष्यवचन ॥
सतगुरु तुम आज्ञादई, कहूँ अपनी बात ।
योगअष्टांग बुझाइये, जाते हियो सिरात ॥
मोहिं योग बतलाइये, जोहै वह अष्टांग ।
रहनीगहनी विधिसहित, जाके आठो आंग ॥
मत मारग देखे घने, ह्यांसियरे भये प्रान ।
जो कुछ चाहौ तुम करौ, मैं हौं निपट अयान ॥
गुरुवचन ॥
योगअष्टांग बुझाइहैं, भिन्न भिन्न सब अंग ।
पहिले संयम सीखिये, जाते होय न भंग ॥
शिष्यवचन ॥
संयम काको कहतहैं, कहौ गुरू शुकदेव ।
सो सबही समुझाइये, ताको पावै भेव ।
गुरुवचन ॥
प्रथम सूक्ष्म भोजन खावै । क्षुधामिटै नहिं आलस आवै ॥


१ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि ये
अष्टांगयोग कहलाते हैं ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५५
थोड़ासा जल पीवन लीजै । सूक्ष्म बोलै वाद न कीजै ॥
बहुत नींद भर सोवै नाहीं । दूजा पुरुष न राखै पाहीं ॥
खट्टा चरपरा खार न खावै । बीरज क्षीण होन नहिं पावै ॥
करै न काहू वैरी मीता । जगवस्तुकी रखे न चीता ॥
निश्चल द्वै मनको ठहरावै । इन्द्रिनके रस सब बिसरावै ॥
तिरया तेल नहिं देह छुवावै । अष्ट सुगन्ध¹ अंग नहिं लावै ॥
पुरुषन की राखै नहि आसा । गुरुका रहै चरणही दासा ॥
दो० काम क्रोध मद लोभ अरु, राखैना अभिमान ।
रहै दीनताई लिये, लगै न माया वान ॥
छल नहिं करै न छल में आवै । दम्भ² झूठके निकट न जावै ॥
टोना यंत्र भूत नहिं ध्यावै । झूठ जानके सब बिसरावै ॥
धातु रसायनि मन नहिं लीजै । झूठ जानि याहू तजिदीजै ॥
स्वांग तमाशे बाग न जैये । आसन ऊपर बैठा रहिये ॥
दृढ़ ह्वै लगै युक्तिके माहीं । ताते विघ्न होय कछु नाहीं ॥
रूठा रहै जगत लोगन सों । न्यारा रहै सबही भोगन सों ॥
इन्द्र आदि लौं सुख संसारी । नेक न चाहै चित्त मँझारी ॥
सिमिटि रहै हिय माहिं समावै । ऐसे योग सधै सिधि पावै ॥
दो० ऋद्धि सिद्धि अरु कामना, तिनकी रखै न आस ।
मान बड़ाई चपलता, त्यागै चरणहिं दास ॥
गहि संतोप क्षमा हिय धारै । संयम करिकरि रोग निवारै ॥
अहङ्कारको छोटा करिये । कुटिल मनोरथमन नहिं धरिये ॥
बसिये जितहि देश सुस्थाना । निर उपाधि धरती अस्थाना ॥
भली भूमि लखि गुफा बनावै । नीची ऊंची रहन न पावै ॥
१ तेल, फुलेल, चोवा, चन्दन, कपूर, इत्र, केसरि, कस्तूरी ये अष्ट सुगन्ध
कहलाते हैं २ मिथ्या बातें बनाना ॥
६

५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
जिमीं बराबर चौरस होई । होय लदाव कि मधरी सोई ॥
साँकर द्वार कपाट लगावै । कहूँ छिद्र रहने नहिं पावै ॥
तामें बैठि योग तप कीजै । दूजो पुरुष न भीतर लीजै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । जगसों रहिये सदा उदासा ॥
दो० यह सब निश्चयही करै, योग युक्ति के साथ ।
पहिले ऐसा होय करि, पीछे साधन साध ॥
आठ अंग कहुं योगके, सुनो चरणहीं दास ।
मेरे बचनन के विषे, चितदै करौ निवास ॥
यमके अंग प्रथम सुनि लीजै । दूजे नियम कहूँ चित दीजै ॥
तीजे आसन हितकरि साधौ । प्राणायाम चौथे आराधौ ॥
प्रत्याहार पांचवां जानौ । छठे धारणा को पहिंचानौ ॥
सतवें ध्यान मिटै सब बाधा । कहूँ आठवां अंग समाधा ॥
शिष्यवचन ॥
धन्य धन्य तुम श्री गुरुदेवा । मेरे प्राणनाथ शुकदेवा ॥
व्यास पुत्र तुम दीन दयाला । मम अनाथ को कियो निहाला ॥
आठ अंग मोहिं दिये सुनाई । अब कहु भिन्न भिन्न समुझाई ॥
एक एकको जुदा बखानो । जासों जाय दास पर जानो ॥
गुरुवचन
दो० एक एक का कहतहौं, जुदा जुदा विस्तार ।
श्रवणन सुनौ विचारिकै, लेलै हियमें धार ॥
अथ यमअंग वर्णन
प्रथम कहौं यम के दश अंगा³ । समझैं योग न होवै भंगा ॥
१ कँवारा २ प्राण अपान व्यान उदान समान ३ अहिंसा, सत्यदृढ़ असत्-
त्याग, ब्रह्मचर्य धरना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य, तृष्णा इनसे पृथक्
रहना, क्षमा, धैर्य, दया, आर्जव, मिताहार यानी सूक्ष्म भोजन करना ये यमके
दश अंग कहलाते हैं ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५७
प्रथम अहिंसाही सुन लीजै । मनकरि काहू दोष न कीजै ॥
कड़ुवा वचन कठोर न कहिये । जीवघात तनसों नहिं दहिये ॥
तन मन वचन न कर्म लगावै । यही अहिंसाधर्म कहावै ॥
दूजे सत्य सत्यही बोले । हिरदै तौलि वचन मुख खोलै ॥
तीजे असते त्याग सुनीजै । तनमन सों कछु नाहिं हरीजै ॥
तन चोरी के लक्षण नाखै । मनकी चोरी को नहिं राखै ॥
चौथा ब्रह्मचर्य बतलाऊं । भिन्न भिन्न करि ताहि सुनाऊं ॥
दो० ब्रह्मचर्य यासों कहैं, सुनहु चरणही दास ।
आठ अंगैं सो नारिकी, नेक न राखै आस ॥
यती होय दृढ़ काँछ गहीजै । वीर्य क्षीण नहिं होने दीजै ॥
मैथुन कहूँ अष्ट परकारा । ब्रह्मचर्य रहै इनसे न्यारा ॥
सुमिरणतियाको नहि करिये । श्रवणनसुरति रूप नहिं धरिये ॥
रस शृंगार पढ़े नहिं गावै । नारिनसों नहिं हँसै हँसावै ॥
दृष्टि न देखे विष नहिं दौरै । मुख देखै मन होजा औरै ॥
बात इकन्त करै नहिं कबहीं । मिलन उपाय जुत्यागै सबहीं ॥
स्पर्शअष्टम निकट न जावै । कामजीति योगी सुखपावै ॥
अष्टप्रकारके मैथुन जानों । इन्हें तजे ब्रह्मचर्य पिछानों ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा । ब्रह्म सत्य में करै निवासा ॥
दो० पँचवीं सुखदाई क्षमा, जलन बुझावै सोय ।
जोटुक आवै घटविषे, पातक डारै खोय ॥
१ विद्या पढ़ना व्रत करना नित्यकर्म संध्यावन्दनादि करना भिक्षा मांगि
कर भोजन बनाय गुरु को नैवेद्य लगाय भोजन करना इसे ‘ब्रह्मचर्य कहते
हैं २ स्मरण, सुरति, शृङ्गारावलोकन, हास्य करना, दृष्टि सों त्रिया रूप
देखना, मिलन उपाय, स्पर्श, एकान्त में वार्त्तालाप करना ये अष्टाङ्ग विषय
के कहलाते हैं ॥

५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोई दुष्ट कछू कहिजावो । गाली देकर कोइ खिझावो ॥
कै कोइ शिरपर कूड़ा डारो । कै कोइ दुखदेबो अरु मारो ॥
बाकी कछू न मनमें लावै । उलटा उनको शीश नवावै ॥
ऐसी क्षमा हिये में लावो । बोलौ शीतल अग्नि बुझावो ॥
छठाँ अंग धीरज का जानौ । धीरजही हिरदय में आनौ ॥
योगयुक्ति धीरज सों कीजै । सब कारज धीरज सों लीजै ॥
धीरज सों बैठै अरु डोलै । धीरज राखि समुझिकर बोलै ॥
आनि परै दुख ना अकुलावै । धीरज सों दृढ़ता गहिलावै ॥
दो० धीरज रहा तौ सब रहा, काहूसे न डराय ।
सिंह प्रेत अरु कालका, धीरज सों डरजाय ॥
दया सातवीं अब सुनि लीजै । सब जीवन की रक्षा कीजै ॥
लख चौरासी का सुखदाई । सबके हित की कहै बनाई ॥
रहिये तन मन बचन दयाला । सबही सों निर्वैर कृपाला ॥
अठवै कहूँ आर्य्यवै खोलै । कोमलहृदय सों कोमलबोलै ॥
सबको कोमल दृष्टि निहारै । कोमलता तन मन में धारै ॥
कोमल धरती बीज बवावै । बढ़े बेगि फूलै फल लावै ॥
ऐसे कोमल हिया बनावै । योग सिद्धि करि पद पहुँचावै ॥
यही आर्य्यव लक्षण जानो । शुकदेवकहैं रणजीतपिछानो ॥
दो० मिताहार जो नवें की, समझ लेहु मनमाहि ।
सतगुन भोजन खाइये, ऐसा वैसा नाहिं ॥
खावै अन्न विचारिकै, खोंटा खरा सँभार ।
जैसाही मन होत है, तैसा करै अहार ॥
सूक्ष्म चिकना हलका खावै । चौथाभाग छोड़ि करि पावै ॥
वानप्रस्थ कै हो संन्यासै । भोजन सोलह ग्रास गिरासै ॥
अरु गृहस्थ बत्तीस गिरासा । आव नींद न बहुत न श्वासा ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५६
ब्रह्मचारी भोजन करै इतना । पठनमाहिँबीरजरहै जितना ॥
दशवां शौच पबित्तर रहिये । कर दातौन हमेश नहइये ॥
जो शरीर में होवै रोगा । रहै न तन जल छूवन योगा ॥
तौ तन माटी से शुधि कीजै । अबअंतरकी शुधि सुनलीजै ॥
राग द्वेष हिरदय सों टारै । मन सों खोटे कर्म निवारै ॥
दो० दशप्रकारका कहा यह, पहिल योगकी नीव ।
नेम कहूं अब - दूसरा, सो है साधन सीव ॥
अथ नेमअंगवर्णन ॥
दूजा अंग नियम का गाऊं । भिन्न भिन्न सब अंग सुनाऊं ॥
पहला तप इन्द्री वश कीजै । इनके स्वाद सभी तजि दीजै ॥
खातें पीतैं सोवत जागत । योगी इन्द्रिन कूं वश राखत ॥
तनकूं वश कर मनकूं मारै । ऐसी विधि तपका अँगधारै ॥
दूजा अंग कहूं संतोषा । हानि भये नहिं माने शोका ॥
लाभ भये नाहीं हरषावै । ऐसी समझ हिये में लावै ॥
परारब्ध तन होय सु होई । सँकलप बिकलपरखैनकोई ॥
दो० तीजा आस्तिक अंग है, जाका सुनो विचार ।
समझ समझ मनमें धरो, ताको गहो संभार ॥
शास्त्र सुने परतीत जो कीजै । सत्तब्रह्म निश्चय करिलीजै ॥
बुध निश्चय आतम के माहीं । जगत सांच करि मानै नाहीं ॥
चौथा दान अंग विधि होई । पात्र कुपात्र विचारै सोई ॥
एक दान उपदेश जु दीजै । भवसागर सों पार करीजै ॥
दूजा दान अन्न अरु पानी । दीजै कीजै बहु सनमानी ॥
१ इन्द्रियवश, संतोप, आस्तिक, शास्त्रचिंतन, दान देना, ईश्वराराधन,
सिद्धांतश्रवण, लाजयुक्त, तत्त्वदृद, जाप ये दशअंग नियमके कहलाते हैं ॥