भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
नासकेतलीलावर्णन । ५६७
जैसे पाप करै नर लोई । जम सूरत बनिआवै वोई ॥
याकूं मार पकड़ ले जावैं । जैसे कर्म किये भुगतावैं ॥१६॥
दोहा ॥
या प्रानी जा भांति के, लीन्हे पाप लगाय ।
वा भांती जम आय हैं, भयको रूप बनाय ॥१७॥
चौपाई ॥
कोई सूकर पर चढ़ आवै । कांधे गदा बहुत डरपाव ॥
कोई चढ़े सिंघ की पीठा । करमें गुरज बुरी ही डीठा ॥
कोई जम चढ़आवै भैंसे । बुरी आंख अरु ऊंचे कैसे ॥
कोई आवै जरक सवारी । दांत बड़े मुगदर लिये भारी ॥
कोई मुरदे के चढ़ि कांधे । खैंचु कमान तीर ही सांधे ॥
कोई कुत्ते पर चढ़ि धावे । हाथों फासी सीस घुमावे ॥
कोइ आवै गधा पलानैं । काढै जीभ बुरही बानैं ॥
जगमें बुरे कर्म जिन कीन्हे । तिनकूं यों आवत जम चीन्हे ॥
बुरी बुरी सूरत ही बनिआवैं । कहांलगकहूंबहुतभयलावैं ॥१८॥
दोहा ॥
बुरे कर्म पापी करें, जिनकी यह गत जान ।
भले कर्म जो करत हैं, तिनका करूं बखान ॥१९॥
जो जग में पुण्यात्मा, चरणदास सुखपाय ।
तन छूटे गण पारषद, सुख सूं ही ले जाय ॥२०॥
चौपाई ॥
गण आवन कों रूप बखानूं । भिन्न भिन्न जैसे मैं जानूं ॥
कोई आवत ऐसे देखा । धरि आवै तपसीका भेखा ॥
कोई रूप वैशनों आवै । गलमाला अरु तिलक बनावै ॥
कोई आत पिता के रूपा । कोई आवै गुरू सरूपा ॥
५६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोई करत कीरतन धावैं । हरि के गुण गावतही आवैं ॥
कोई आवै माला फेरत । वा प्रानी कूं हितसूँ हेरत ॥
कोई रथ विमान ले आवैं । हरि गुरुका कोइ नाम जपावैं ॥
कोई पालकी घोड़े ल्यावैं । कोई हाथी लीये आवैं ॥
शुभकर्मी कूँ तहां चढ़ावैं । सुखदेते जमपुर ले जावैं ॥२१॥
दोहा ॥
मृत्युलोकसूँ राह जो, जमपुरही की जान ।
छ्यासी सहस जोजन सबै, इतनों है परमान ॥२२॥
आठ ठौरहै कष्ट की, वाही मारग माहिं ।
दुख सुखही भुगतावते, जमगण ले ले जाहिं ॥२३॥
चौपाई ॥
जब प्रानी की छूटे देही । सब मिल आवैं कुटुम्ब सनेही ॥
बांध जोड़ कर अरथी करै । चार मनुष्य कै कांधै धरै ॥
ले जावैं मरघट के मांहीं । मुंह झुलसैं अरु देह जलाई ॥
तब हां नेक नहीं ठहरावैं । अपने अपने घरकूँ जावैं ॥
जबहीं जुदे होय परवारी । मात पिता सुत धन अरु नारी ॥
पाट पटम्बर हीरे मोती । सबही अलगहोय कुलगोती ॥
बाग महल हाथी अरु घोड़े । सबने पीठदई मुख मोड़े ॥
राजकटक अरु मुलक भौमही । दूरहोय सबतेज जौमही ॥
बीर भतीजे अरु यह देही । रनजीत कहैं कोई नाहिं सनेही ॥
जूवे हारा धाडी लूटा । ऐसे चाला सबसे छूटा ॥२४॥
दोहा ॥
जिन कारन बहु पापकरि, लाता दरब कमाय ।
अपना कर कर जानता, देता तिन्हें खुलाय ॥२५॥
वे वाके होवें नहीं, तोड़ि कहैं यह बात ।
नासकेतलीलावर्णन । ५६६
जैसा कीया सो लुणैं, हम तेरे नहिं साथ ॥ २६ ॥
सबही मिल कहने लगे, हम तेरे अब नाहिं।
पाप पुण्य जो कुछ किया, सोही संगहि जाहिं ॥ २७ ॥
चौपाई ॥
जगत ठाठ जब ऐसे कहैं । तब प्रानी हकधक हो रहैं ॥
जबही मुंडी धुनने लागे । कहै माहिं क्यों इनके पागे ॥
हाय हाय मैं कछु नहिं कीया । राम भगति में मन नहिं दीया ॥
जिन कारन बहु पाप कमाये । सो मेरे अब काम न आये ॥
साध संग के माहिं न मिलिया । दया धर्मकी राह न चलिया ॥
भला कर्म सबही बिसराया । खोटे कर्मन सूं चितलाय ॥
सोच सोच सब और निहारैं । कोई न संगी हुआ हमारैं ॥
यों प्रानी पछतावा करै । जममारै लै आगे धरै ॥
चरणदास कहैं कछु न बसावै । ऐसे बांधा जमपुर जाव ॥२८॥
दोहा ॥
पकड़ बांध जम ले चलैं, गल में डार जंजीर ।
पापी जीवन दुख सहित, देत घनी ही पीर ॥ २६ ॥
जो जीहै पुण्यात्मा, सोवै सुखसूँ जाहिं ।
तिनकूं गण ले जात हैं, जम नहिं छूवैं छाहि ॥ ३० ॥
चौपाई ॥
दो हजार जोजन मगमाहीं । सहजरूप दुख सुख
६०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लोहे कीसी कीलें पैनी । चुभचुभ जाय महादुख दैनी ॥
वह पैंडा है अति दुखदाई । जाहिं कष्ट सूं लोग लुगाई ॥
अरु धरमी जी सुख सूं जावैं । दिये दान सब आगै आवैं ॥
रथ चंडोल पालकी म्याना । हाथी घोड़े और विमाना ॥
ऐसी विध के बाहन आवैं । उन ऊपर चढ़ि बाट लंघावैं ॥
चरणदास कहैं जो ह्यां देवैं । जाका बदला आगे लेवैं ॥३१॥
दोहा ॥
जोजन दोय हजारही, पैंडा बालू रेत ।
दान जिन्हों पनहीं करी, सो-लंघि हैं सुख सेत ॥३२॥
आगै बारह सहसही, जोजन खांडे धार ।
महाविषम वह बाट है, पाप पुण्यही लार ॥३३॥
घोड़े के या बैलके, रथ देवे जो कोय ।
वह पैंडा सुख सूं लंघै, ताकूँ दुख नहिं होय ॥३४॥
चौपाई ॥
वाके आगे जलही आवै । रुकरहा भरा थाह नहीं पाव ॥
चहूँ ओर डरही डर लागै । आठ सहस्र जोजन वह जागै ॥
भूमिदान जिन दीया होई । सुखसूँ जाय पार हो सोई ॥
ऊंचा दान किया फल लावै । पगसूं धरती लगती जावै ॥
जलसूँ उतर चलै जो आगै । राह अँधेरी डर बहु लागै ॥
तीस सहस जोजन मगजानौ । तामें कष्ट अधिक पहचानौ ॥
बिजली चमक गरज बहुमानो । परलयकीसी निश्चित आनौ ॥
दानकिये दीवे तहां आवैं । सो प्रानी चांदिन में जावैं ॥
पचभीषम तुलसी के ठांईं । कै ठाकुरद्वारे के माहीं ॥
कै सतगुर के भवन मँझारै । बाटमाहिं कै दीपक जारै ॥
ब्राह्मण कै घर कै धर्मशाला । तीरथ पर कै दीवा बाला ॥३५॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०१
दोहा ॥
प्रानी इसही दानसों, चांदिनही में जायँ ।
रनजीत कहै सुख कूं लंघै, उसही अंधेरु माहिं ॥३६॥
चौपाई ॥
आगैं भयानक ऊबट बाटा । उतर चढ़नके बहुतक घाटा ॥
बहुतक डर जहां आगै आवैं । प्रानी अतिव्याकुल हो जावैं ॥
कहा कहूं बहुते दुखदाया । जाकूं देखे कांपै काया ॥
आठ सहस जोजन मगसोई । तामें धीरज रहै न कोई ॥
आगै तप्त भानकी जारै । सोतो जोजन सहस अठारै ॥
वा पैड़ेमें तो सुख पावैं । कुवे बावड़ी ताल खुदावैं ॥
कै पो देवे मारग माहीं । प्यासे जलकूं नाटै नाहीं ॥
धर्मशाला में रखै भराई । कै ब्राह्मण घर दे पोंहचाई ॥
ठाकुरद्वारे माहिं भगवै । कै गुरद्वारे भर पहुँचावै ॥
कै सुन्दर से भवन बनाये । दिये दान जिन हां फलपाये ॥
बाटमाहिं जो बृक्ष लगावे । ऐसा दान काम हां आवे ॥
आय प्रापत जल हां होवै । तपत प्यास प्रानी की खोवै ॥
छ्यासीसहसजोजनमगगहिया । भिन्न भिन्न मैं तुमसों कहिया ३७
दोहा ॥
जमपुरी के निकट है, ताको करूं बखान ।
बैतरनी नदी जहां, सौ जोजन परवान ॥३८॥
चौपाई ॥
पीप रकत तामाहीं भरिया । प्रानी थरहर धीर न धरिया ॥
बीछू कीड़े सांप घनेही । दुखसों उतरे पाप सनेही ॥
जो अपने स्वामी कूं मारै । और ब्राह्मन कूं हनडारै ॥
प्यास लगै जब ऐसे करै । रकत पीप पी तृष्णा हरै ॥
६०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बैतरनी कोई सकै न देखा । तामें लहरैं उठैं अनेका ॥
जाके हले जीव वे सारै । तल ऊपर कभी लगै किनारै ॥
अरु हां रक्षा करै न कोई । नाते हितू न संगी होई ॥
कृतघ्नी बिस्वांसी घाती । निजधर्मनके होय न साथी ॥३६॥
दोहा ॥
विना विचारे करत है, बरत करै जो भंग ।
मिथ्या वाद करै घना, रँगे लोभ के रंग ॥४०॥
चौपाई ।
सोवै नदी ही के माहीं । गिरते देखे पतित तहां हीं ॥
पतितों दीखे राध रकत की । पुनवारे कूं घीव शहद की ॥
जिसने दीया अन्नही दाना । और बसे तीरथ अस्थाना ॥
और नहात है गंगासागर । दृढ़ व्रत अपना रखै उजागर ॥
पोथी धरम सासतर केरी । लिखा लिखादे दान घनेरी ॥
साधों के चरितों की इछ्या । सतगुरू सेती लेवे दीछ्या ॥
जिन गौदान करै शुभबारा । ताकी पूंछ पकड़ हो पारा ॥
घने मनुष मैं उतरत देखे । बहुत सितांबी सुनौं बसेखे ॥४१॥
दोहा ॥
वाके आगे गिरि बड़ा, धरम सैल जिहनाव ।
सोनेका निर्मल इसा, जों बिलोर की दांव ॥४२॥
पतितनकूं दीखे नहीं, दीखे तो भय रूप ।
देखत है पुन्यात्मा, सुन्दर महा अनूप ॥४३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने महामार्गस्थानंनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
ऋपिउवाच ॥ दोहा ॥
फेर ऋषीश्वर बोलिया, नासकेत महाराज ।
मारग की जो तुम कही. नीके समझी आज ॥ १ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०३
अब कहिए धर्मराय की, और सभा की खोल।
तुम दाता सुखदान हो, मीठे तुम्हरे बोल ॥ २ ॥
सभी करें परनामही, हमतो चरनही दास।
सुनबे को मन चाव करि, आ बैठे तुम पास ॥ ३ ॥
नासकेतउवाच ॥
नासकेत कर जोर कर, ऐसे बोले बैन।
तुम चरनन की रेनुका, हमरी है सुखदैन ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
नासकेत कहि दास तुम्हारे। तुम ह्यां आये भाग हमारे ॥
धरम राय की सबै सुनाऊं। और सभाकी खोल दिखाऊं॥५॥
दोहा ॥
जम नगरी वा पास ही, जिसके द्वारे चार।
छोटे नग्गर और बहु, वाही ठोर मंझार ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रतन जड़े जहां बहुते भांती। वा नगरीकी अतिही क्रांती ॥
बहुत अपसरा नृत्य करत हैं। बाजे बजत गीत उचरत हैं ॥
ताते सुन्दर होय रहा है। फूल बिछे बहु भूमि महा है ॥
सभामाहिं धर्मराय निहारा। ज्यों तारों में चन्दा सारा ॥
ऋषि जोगी तिंहपास विराजैं। किन्नर गन्धर्व अति छविछाजैं ॥
विद्याधर तिन केही पासा। बड़े सरप रहे उमँग हुलासा ॥
अत्रे मैत्रे भारद्वाजा। भृगु मरीच दधीच सुराजा ॥
गोतम दुरवासा महा जोगी। चिवन पुलस्त सुमित्र असोगी ॥
गालवि जातूकरन महामति। धर्म अधर्म विचार करैं नित ॥
और ऋषीश्वर बहु सतवादी। धरमरायढिंग जिनकी गादी ॥
बारह सूरज की समरूपा। बस्तर पहरैं रतन अनूपा ॥
६०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चतुर वेद के पढ़ने वारे । अरु मीमांसा जानन हारे ॥
बहुत शास्त्र आप बनाए । धर्म काज जगमांहि चलाए ॥
धरमराय उन केही मांहीं । शोभांवत अधिक छविपाई ॥
सिरपर सुन्दर मुकुट धरेही । बहुत भांति के रतन जड़ैही ॥
तेज कहूं ज्यों बारह भाना । करै न्याव ज्यों दूध अरुपाना ॥
प्रानी कूं जमगण ले जांई । खड़ा करै जाकर वह ठांई ॥
धरमराय कहै हां ले जावो । चित्रगुपतही कूँ दिखलावो ॥
पाप पुण्य का लेखा करै । प्रानी किया सु दुख सुख भरै ॥
छिपकर अरु परगट ज्यो कीया । चित्रगुप्त ने सब कह दीया ॥
पाप पुण्य सब कह समझावै । धर्मराय जब न्याव चुकावै ॥
कहैक पहले भुगतै पापा । नरक मांहि फिर देहु संतापा ॥
दोहा ॥
नरक अठारह है जहां, जिन किये जैसे पाप ।
वैसे मांही डाल हैं, तैसो तिन्हें संताप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
ऐसा जमपुर चार दुवारे । भांत भांत के न्यारे न्यारे ॥
पूरब दिशा एक है द्वारा । दूजा पच्छिम और निहारा ॥
तीजा उत्तर दिशा सुनाऊं । चौथा दक्षिण और बताऊं ॥
कहूं द्वार पूरब की जानूं । जाकी महिमा सभी बखानूं ॥
जिन प्रानी ऐसे कर्म कीने । कपड़े लकड़ी जाड़े दीने ॥
पानी गर्मी मांहि पिलाये । रस्ते में जिन वृक्ष लगाये ॥
थके मनुष बाहन चढ़वाये । भूखे कूँ भोजन करवाये ॥
गुरु के सेवन की ब्रतलीनी । अरु साधन की संगत कीनी ॥
उत्तम तीरथ किये संभारी । दया धरम हिरदय में धारी ॥
कथा कीरतन बरत बसेखे । पूरब द्वारे बढ़ते देखे ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०५
साथ अप्सरा हरि गुणगावैं । करत कीरतन ही ले जावैं ॥६॥
दोहा ॥
पूरबद्वारे की कही, सुनों ऋषीश्वर चैन ।
पच्छिम द्वारा अब कहूं, सोभी है सुख दैन ॥१०॥
चौपाई ॥
जिन मात पिताकी आज्ञामानी । पर निन्दा कबहू नहीं ठानी ॥
नित्त प्रति कुछ कीया दाना । परधन कूं विंष्ठा सम जाना ॥
काम क्रोध जिनके नहीं मोहा । काहूँ सें राखै नहिं द्रोहा ॥
परतिरिया मनमें नहीं लीनी । नारायन की पूजा कीनी ॥
वे पच्छिम द्वारे हो जावैं । अपने लक्षन सूं सुखपावैं ॥
द्वार तीसरे की सुन बाता । सभी सुनाऊं ताकी काथा ॥
जो प्रानी है पर उपकारी । पर कारजहित दुखसहैं भारी ॥
अपने कारज ढील लगावैं । पर कारज कूँ उठ उठ धावैं ॥
आपन दुखसह पर सुख दीना । जीवत परमारथही कीना ॥
आप धर्म कर और करावैं । हिरदय दया नाम चितलावैं ॥
सो जावैं उत्तरही द्वारै । साधरूप गण तिनके लारै॥११॥
दोहा ॥
विष्णु भक्ति की नेष्ठा, साध विप्र की सेव ।
धर्म बरत में डिढ रहै, सिरपर रख गुरुदेव ॥१२॥
चौपाई ॥
अरुभलेकर्म जिन कीने नाहीं । खोटे कर्मन के पडमाहीं ॥
सो चौथे द्वारे हो जावैं । बाटमाहिं जम बहुत सतावैं ॥
पाप किये जिन ऐसे ऐसे । सबही खोल बताऊं तैसे ॥
दुष्टबड़े तनमन दुखदाई । सब जीवन सूं करै बुराई ॥
६०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाये कूं बहुतै मारै । छिपकर परघरही कूं जारै ॥
पक्षी पकड़ फन्द में डारै । जीव हतन की मन में धारै ॥
हरे बिरछ कूं जो वे काटैं । अरु चोरीकर लूटत बाटैं ॥
गऊ ब्राह्मण की कर घातैं । मात पिता सूं टेढ़ी बातैं ॥१३॥
दोहा ॥
जार करम हित सूं करै, गरभ गिरावै जान ।
पर निन्दा बहुती करैं महा मूढ़ अज्ञान ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
और वै हैं विस्वासी घाती । बोलैं झूठ महा अपराधी ॥
झूठी साख भरै न लजावैं । परघरही सूं धन ठगलावैं ॥
जाका नोन खाय वा मारै । रस्ते मांहि आगहू डारै ॥
खुशी होय परकी कर हांसी । मनमें राखै सब सूं गांसी ॥
डिभ कपट छल भगल अहारा । जो कुछ किया सो नांहि विचारा ॥
साधसंग में मन नहिं दीन्हा । गुरुका कहा पंथ नहिं चीन्हा ॥
बेमुख हो आवना त्यागैं । दुनियां के दुख धंधे पागैं ॥
वेद पुरानन कों नहिं मानैं । शास्त्र की निन्दाही ठानैं ॥
पाप अनेक करत नहिं डरैं । मनमें पाप पाप धुन धरैं ॥
औगुन ग्राही गुन नहिं पकड़ैं । दीन होय जासों बहु अकड़ैं ॥
धरमजु अपने स्वामी केरा । ताकी निन्दा करै घनेरा ॥
परकी चुगली हित कर करैं । गुरूके बचन न हिरदै धरैं ॥
रिण देवैं अरु ब्याज बढ़ावैं । ताका धान खुशी हो खावैं ॥
ब्याज लैन में भारी हान । निरफल जाय करै जो दान ॥
हाय हाय कर जनम गंवावै । सब कुछ रख संतोष न आवै ॥
संकल फांसी जिन गल माहीं । दक्षिण द्वारे होते जाईं ॥१५॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०७
दोहा ॥
दक्षिण द्वारे. और हैं, सबै नरक दुखदाय ।
अति कलेश जहां होत है, पतितन कूं हां जाय ॥ १६ ॥
सुनो ऋषी अब कान दे, जमदूतों का रूप ।
काले सुरमे की तरह, अति ही घोर सरूप ॥ १७॥
जित पापी हाहा करै, हो रहा अति ही शोर ।
अंधकार ऐसा जहां, सूझै निस नहिं भोर ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
जहां किरम कुत्ते अरु कागा । बीछू रीछ अरु काले नागा ॥
अरु कांटे लोहे सम भाला । चीते गिद्ध सिंह बिकराला ॥
जमके दूत जहां बलकारी । लोहे के मुगदर कर भारी ॥
जासूं पतितन के सिर मारैं । त्राह त्राह कर बहुत पुकारैं ॥
उस द्वारे में नरक घनेरे । सो मैं अपनी आखों हेरे ॥
सुनत रोम ठाढ़े होजावैं । कंपै कलेजा अति थहरावैं ॥
सुनो ऋषी मै कहूं जु सारी । देख डरा उपजा भै भारी ॥
नरकोंमाहिं जीव बहु भरिया । मोदेखत बहुतक जहां गिरिया १६
दोहा ॥
नरक हजारों है जहां, हाय हाय ही होय ।
जीव पुकारत है पड़े, आगे सुनिये सोय ॥ २० ॥
तिनही में जो हैं बड़े, नरक अठारह मुख्य ।
नाव बखानूं जिनन के, अरु ह्वाँके सब दुख्य ॥ २१ ॥
चौपाई ॥
पहिले कुंभीपाक सुनावैं । जीवनकुं तामाँहि पकावैं ॥
दूजा नरकु अबीची खोला । लहर उठें जी खाँहि झकोला ॥
रौरव महा नरक जो भारा । जी रोवै बहु करैं पुकारा ॥
६०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौथा गुड़ जिम नरक महारे । गुड़ रस ज्यों औटत है हाँरे ॥
कूप नरक कूये सम जानों । लोहू पीप भराहै मानों ॥
महा कीट नरक बतलाऊं । तामें कीड़े भरे बताऊं ॥
असिपत्तर वन नरक कहीजे । खाँड़ेकी सम पात लहीजे ॥
नरक सुदारुण है भय भीता । तेज बड़ा तीक्षन दुख दीता॥२२॥
दोहा ॥
एक नरक निरस्वाँस है, तहाँ घुटे जो स्वाँस ।
ऐसा दुख हां होत है, ज्यों ठगमारी फांस ॥ २३ ॥
कुल संकुल जो नरक है, ताही कूँ सुनलेह ।
पापी कूँ संकलों सहित, जकड़े वाकी देह ॥ २४ ॥
चौपाई ॥
सूचीमुख पापी जो पावै । सुई छेक मुख हो गिरजावै ॥
महाघोर नरक अति भारी । तामें भैहै अधिक अपारी ॥
सूलही रूप नरक कूँ जानौं । सूली की ज्योताही पिछानौं ॥
नर्क अगनकुण्ड महातपत है । ताकूँ देखे हिया कंपत है ॥
नरक तेल जंत्र जो देखा । कल्हू की समताहि बसेखा ॥
दुखद दुख की खान घना है । नरक वही दुखरूप बना है ॥
अंधकार जो नरक बताऊं । महा अंधेरा तहाँ सुनाऊं ॥
नरक विलोचन वही कहावे । जहाँ जाये अंधा होजावे ॥२५॥
दोहा ॥
अति गरमी जाड़ा घना, भयानक खग सुन लेह ।
परवत सँू दैं डारिकैं, सस्तर छेदैं देह ॥ २६ ॥
ऐसे ऐसे दुख घने, पततन बारमबार ।
खोटे कर्मन के किये, दुखी लखे नर नार ॥ २७ ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०६
ऋषि उवाच ॥ दोहा ॥
नरक इकट्ठे तुम कहे, नासकेत महाराज ।
जुदे जुदे बरनन करो, हमें सुनावो आज ॥१॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत कहै सबै सुनाऊं । एक एक कूँ जुदा दिखाऊं ॥
सभी ऋषीजो ह्वां चित दीजै । नरकोंकी गति सब सुनलीजै ॥
पहिले कुंभीपाक कहतहूं । ता डर सं हरिध्यान धरतहूँ ॥
जा जा पापी जहां परत है। जम जिनकूँ बहु मार धरतहै ॥
उन पापी जो पाप कमाये । सो तुमसूं अब कहूं सुनाये ॥
गऊ ब्राह्मण पशु बहु मारै । पक्षी आदि जीव हनडारै ॥
दानकरत भांजी जो मारै । अरु ब्रह्मचारी का तप टारै ॥
और गरीबन कूं हनडारै । और मित्रका घात विचारै ॥
सोवे कुंभी नरक मँझारी । जाय परत है नरकें नारी ॥
कुंभीपाक कहूं परवाना । जाका मुख है घड़े समाना ॥
सोलह जोजन तल बिस्तारा । बहुदुख पावे गिरने हारा ॥
बड़े बड़े कीड़े लग जाहीं । महादुर्गंध बुरी तिह माहीं ॥
तामें बहुत बरस दुख पावै । पाप भुगत कर बाहर आवै ॥
दूजा नरक अवीची आगे । वामें गिरै पाप अस लागै ॥२॥
दोहा ॥
अधम संग जोपै करै, कन्या डारै मार ।
अभक्ष भक्ष गुरु कूं हनै, गर्भ गिरावै नार ॥ ३ ॥
जो कोइ अवै पाहुना, अपने घरके माहिं ।
अनजल की पूछी नहिं, आदर दीया नाहिं ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
नरक अवीची में दुख भारी । पापी भुगतें नर कहा नारा ॥
६१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुत बरस निकसन कूं लागै । जैसी करै सो आवै आगै ॥
तीजा नरक महा भयकारी । रौरव नांव जहां डरभारी ॥
ताकूं देख कंपत है देही । शुभकर्मों बिन कौन सनेही ॥५॥
दोहा ॥
जामें तप्ती रेत है, सूरज सदा तपाय ।
इकरस जलताही रहै, नैकन कभू सिराय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रोवैं जीव अनेक पड़ेही । कबहूं बैठैं कबहुं खड़ेही ॥
अति व्याकुल तिनकौं दुखभारा । त्राह त्राह कर उठैं पुकारा ॥
करम कहूँ उनके अब कीये । ता पापन सूं वामें दीये ॥
पहल नारि सूं भोग विचारै । रूप ढरै तब मन सूं डारै ॥
राजविषै जिन न्याव न कीना । अपनी परजाकूं दुख दोना ॥
बिन औगुन डांडै अरु मारै । करै कुन्याय बंध में डारै ॥
अरु जिन ब्राह्मण वेद पुराना । पढ़ि पढ़िके कछु भेदन जाना ॥
वेदनमें के कर्म न कीने । पाखण्ड कर करही द्रव्यलीने ॥
आनदेव अरु गिरह पुजाये । हरि ओरी कूं नाहि लगाये ॥
पेटकाज भूम डारत डोलै । अपने स्वारथ मिथ्या बोलै ॥७॥
दोहा ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य जो, अरु शुदर जगमांहिं ।
अपने अपने धरमकी, राह संभारत नांहि ॥८॥
चौपाई ॥
राह वेद की चलते नाहीं । बे मरजाद रहैं जगमाहीं ॥
संक्रायत व्यतिपात न जानैं । द्वादसी मावस ना पहिचानैं ॥
समय पायहु दान न दीया । रसना हरिका नाम न लीया ॥
तिथि अरु परबी समै न साधी । चौकान्हान तजा अपराधी ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६११
संयम पूजा कछू न जानी । बेमुख चाल चला मनमानी ॥
तरपन अरु नित नेम न कीना । गायत्री में चित नहिं दीना ॥
अरु पूरा सतगुर नहिं करि हैं । रौरव नरक मांहि सो परिहैं ॥
चौथा नरक सो गुड़ जिम जानौ। औटत रहत कड़ाहा मानौँ ९॥
दोहा ॥
जामें पापी जीवही, परत आयही आय ।
जिन पापों से गिरत है, सो मैं कहूं सुनाय ॥ १० ॥
चौपाई ॥
जो काहू के बसन चुरावै । विद्या पढ़ गुरकूँ बिसरावै ॥
काहू कारज भांजी मारै । अरु कहू का बुरा बिचारै ॥
सकर काहू की हर लावै । और लोह गुड़ नून चुरावै ॥
गुड़ जिम नरक सुभुगते सोई । तामें अधिक महादुखहोई ११॥
दोहा ॥
कूप नरक है पांचवां, जाका करूं बखान ।
तामें लोहू पीप है, कूंवेकी सम जान ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
तापै काग बहुत घिर रहिया । बड़ी चोंच लोहे सम घरिया ॥
तामें पापी कूं गहि डारै । तिरआवै वह चोंचहि मारै ॥
बड़े पतित मूरख अभिमानी । जनम पाय हरिभक्ति न जानी॥
पूरा सतगुरु ढूंढ़ न कीना । परमेश्वर का नाम न लीना ॥
साधन की संगति नहिं कीनी । कथा कीरतन सुरत न दीनी ॥
अरु दासी सँग गमन करत है । सोभी याही नरक परत है ॥
हिरदय दया क्षमा नहिं आई । मनुषा देही रतन गंवाई ॥
यासम पाप और कहा होई । कूप नरक में डूबै सोई ॥
महा कीट छठा जो देखा । कूप की जो ताहि बसेखा ॥
६१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तामें विष्ठा बहुते भरिया । कुलबुलाट कीड़ोंने करिया ॥
बड़े बड़े कीड़े ता माहीं । पापी के तनमें चिपटाहीं ॥
भली वस्तु जिन छिपकर खाही । आप अकेले दिया न काही ॥
आपही आप सुगन्ध लगाई । काहूका लिया अन्न चुराई ॥
अरु ऐसे बहु पाप कमावै । सो महाकीट नरकमें जावै १३॥
दोहा ॥
नरक सातवाँ जानिये, असिपत्तरबन नांव ।
दरखत की सम है बड़ा, पातदु धारै श्याम ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
ज्यों तरवार पात वे पैने । पतितनकूँ भारी दुखदैने ॥
पापी कूं वा नीचै लावै । खड़ा करै नाहीं बैठावै ॥
पात झड़े खांड़े सम लागे । कटै माँस हाड़ ही ताकै ॥
त्राहि त्राहि जहां होरही भारी । सुनकर चेतै नाहिं अनारी ॥
सुनौ ऋषीश्वर और तमासा । देखा धरमराय के पासा ॥
काहू जमका कोइल बाहन । कोऊ काग चढ़े ही जाहन ॥
कोऊ हिरन चढ़ा ही जावै । कोऊ गीदड़ चढ़ा डरावै ॥
उनके मुख विकराल बने हैं । नानाविध भये रूप ठने हैं ॥
कालारंग कठोर बड़ेही । अधिकी तामस भौंह चढ़ेही ॥
नेतर लाल डरावन तीखे । दुखदाई वे पापी जीके ॥
तनमाहीं दुरगन्ध जु आवै । लांबी काया अति डरवावै ॥
मोटी देही ऊंचे केश। बहुतोंकामुख करहै भैसा ॥१५॥
दोहा ॥
बहुतों के मुख श्वान से, बहुतों के मुख बाघ ।
बहुतक चीते मुखबने, बहुतों के जों नाग ॥ १६ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६१३
आनन बहुत बिलाव से, बहुतन के मुख बैल ।
घोड़े से मुख बहुत हैं, चित खोटे तनमैल ॥ १७ ॥
थोरे से बरनन किए, अरु मुख नाना रूप ।
तनमाहीं जौं रोंगटे, दीखत है बिट रूप ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
काहूके करमें तिरशूला । काहूके कर जलता पूला ॥
काहू हाथ में तीक्ष्ण बरछी । कै तोपैं तलवारैं तिरछी ॥
बहुतौं के कर मुगदर भाले । गदा कुल्हाड़े हैं विकराले ॥
बहुतौं के कर मूसल लाठी । बहुतों के कर लोहे साठी ॥
और गोफन है हाथौं तिनके । और और कर सस्तर जिनके ॥
सस्तर लीयें जु गिनती नाहीं । ऐसे दूत लखे ऊंह ठांहीं ॥
धरमराय की आज्ञा साथा । छेदत हैं पतितन के गाता ॥
मारैं बांधै दया न नेको । महाकलेश तहां मैं देखो ॥ १६ ॥
दोहा ॥
-नासकेत ऐसे कही, नैनों देखी बात ।
रनजीता यों कहत है, सब ऋषियों के साथ ॥ २० ॥
चौपाई ॥
और दूत घोरी मुख तिनका । पैनी डाढ़ कान बड़ जिनका ॥
मोटे होठ खड़े जो केशा । नैनालाल अगन के भेशा ॥
ऐसे जम पतितन के ताहीं । डारैं असिपत्तरबन माहीं ॥
कामी क्रोधी जो नर जावैं । उन कूं वै बहुत्रास दिखावैं ॥
जो कोई काटै हरिया पीपल । और चुरावै बाड़ी में फल ॥
काटैं वृक्ष जीव दुख देवै । झूठी साख भरै दरब लेवै ॥
राखा बरत भंग कर डारै । गुरका धरम-सीस नहिं धार-॥
ऐसे पाप करें बजमारे । नरक सातवें जा हत्यारे ॥२१॥
इति श्री नासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
नरक सुदारुण और है, महाकष्ट की खान ।
जहां कामी नर नारही, भुगतैं बहु दुख मान ॥ १ ॥
चौपाई ॥
बहुते खंभ नारकी सूरत । बहुते पुरुष रूपकी मूरत ॥
जो कोइ परतिरिया गल लावैं । जिनकों जलते खम्भमिलावैं ॥
कहैं कि अपना कीया भोगो । अब क्यों मनमें मानत सोगो ॥
वा नारी कूं लेह पिछाना । जाके संग बहुत सुखमाना ॥
विरथा मनुषा देह गँवाई । तुमर्ते खर कूकुर अधिकाई ॥
जो नारी पर पुरषा माती । खोटा करम किया वा साथी ॥
तिनके कारन खंभ तपाये । बहुती लाल किये उरलाये ॥
जमकहै यह तो जार तुम्हारे । इनकी सूरत लेहु निहारे ॥
जिनके संग काम बस रतियां । तुमतें भली गधी अरु कुतियां ॥
आगैसें सूझा नहिं तुमकूं । कै तुम सुना नहीं था हमकूं ॥
भुगतो याही नरक मँझारी । निकसन की आवै नहि बारी ॥
क्रिया जो काम अजोग निरारा । परमेश्वरका आयसु टारा ॥२॥
दोहा ॥
जरते थंभों बांधकर, मार कहै जम ओह ।
जो कुछ कीया जगत में, जाका फल अवलोह ॥ ३ ॥
त्रास इसी जमलोक का, सुनता था अकनाहिं ।
तन मन सूँ लागारहा, मैथुनही के माहिं ॥ ४ ॥
परवी अरु दिन बरतके, किया जो मैथुन कर्म ।
नासकेतलीलावर्णन । ६१५
विषय भोग बोरा भया, भूला शील अरु धर्म ॥ ५॥
चौपाई ॥
निरस्वास नरक विकरारा । जामें पतितन कूं दुखभारा ॥
ऐसे पापन सों हां जावै । जो वे गुरुकी बस्तु चुरावै ॥
ब्राह्मण तथा देवता होई । इनका अंश चुरावै कोई ॥
बूढ़े अरु बालक का लीया । माल चुराय बहुत दुख दीया ॥
कै बूढ़ी कै बिधवा नारी । तिनका दरब चुराय अनारी ॥
जाय परत है नरक मंझारा । श्वासरुकै जहां दुःख अपारा ॥
दसवां कुल संकुल जो देखा । तामें दुखहै अधिक विशेखा ॥
ब्राह्मण क्षत्री शुदर वैशा । भारी पाप किया जिन ऐसा ॥
मांस खाय मदिरा जिन पीया । सोवा नरक माहिं गहदीया ॥
मारा जीव मांस ले खाया । जाका पातक बहुत बताया ॥
मोल मंगाय लाय जो खावैं । सोभी पापी बहु दुखपावैं ॥
उसी ठौर मैं यही निहारा । भयानक अधिकी दुखहां भारा ॥
अगनरूप जलते द्रुम देखे । दस जोजन लांबे जु बसेखे ॥
जोंजन पांच घेर विस्तारा । एक एक का न्यारा न्यारा ॥
संकल सूं हां बांधै पापी । हाहा शब्द कहैं संतापी ॥
जम लोहे की लाठी मारैं । मुगदर सों सिर फोर ही डारैं ॥
उनका चिमटों चाम उपाड़ैं । सीसा तावैं मुख में डारैं ॥
वेतो जलते अधिक पुकारैं । ज्यों ज्यों जम तामसकर मारैं ॥६॥
दोहा ॥
नरक ग्यारवां कहतहूँ, सूचीमुख है नाम ।
तहां अधिक दुख होत है, महाबुरी वह ठांव ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
जहाँ जायकै पापी पड़ई । जो कोई ऐसे करम करैई ॥
६१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिन्हों पराई नारी मारी । अरु सतगुरकी निन्दा धारी ॥
धरमशास्त्र वेद पुरानी । इनहूं की निन्दाही ठानी ॥
तीरथ की निन्दा मुखलावै । सो सूचीमुख नरकही जावै ॥
नरकजु महाघोर इक नाऊं । सो विकराल भयानक ठाऊं ॥
तामें शूकर सिंह अरु कागा । रहें भेड़िया काले नागा ॥
जिसने पाप किये बहुभारी । सो जावे वा नरक मँझारी
करम कमाये खोटे खोटे । ऐसे पाप किये जिन मोटे ॥८॥
चौपाई ॥
जो कोइ बैठ बाट क माहीं । एक एक कूं देखत जाईं ॥
पर तिरिया की ओरी झांकैं । जिनकी कागे निकासत आंखैं ॥
जो कोइ बनमें आग लगावैं । जिनका मांस सिंघही खावैं ॥
जो कोई पापी गांवही जारै । तिनकी देह भेड़िया फाड़ै ॥
परघर कूं जो पावक लावै । शूकर जिनके हाथ चबावैं ॥
जाने विष देकर नर मारे । खावैं तोड नागही कारे ॥
ऐसे वाही नरक मँझारा । वे दुख पावैं अधिक अपारा ॥
चरनदास कहैं नासहीकेता । भाषत है जो कुछ हां देखा ॥६॥
दोहा ॥
शूलरूप , इक नरक है, शूली की ज्यों जान ।
पाप किये जिन राजमें, सोई गिरत है आन ॥१०॥
चौपाई ॥
मीरगन कूं जिन तीर चलाये । करी शिकार मारले आये ॥
नाहक नर शूलों पर दोये । हेत दरब के ताचन कोये ॥
जो वा नरक माहिं ले बासा । बहुती दीखै अधिकी त्रासा ॥
करमनका फल छूटै नांहीं । देखै अपनी आंखों हांहीं ॥११॥