भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५६७
जैसे पाप करै नर लोई । जम सूरत बनिआवै वोई ॥
याकूं मार पकड़ ले जावैं । जैसे कर्म किये भुगतावैं ॥१६॥
दोहा ॥
या प्रानी जा भांति के, लीन्हे पाप लगाय ।
वा भांती जम आय हैं, भयको रूप बनाय ॥१७॥
चौपाई ॥
कोई सूकर पर चढ़ आवै । कांधे गदा बहुत डरपाव ॥
कोई चढ़े सिंघ की पीठा । करमें गुरज बुरी ही डीठा ॥
कोई जम चढ़आवै भैंसे । बुरी आंख अरु ऊंचे कैसे ॥
कोई आवै जरक सवारी । दांत बड़े मुगदर लिये भारी ॥
कोई मुरदे के चढ़ि कांधे । खैंचु कमान तीर ही सांधे ॥
कोई कुत्ते पर चढ़ि धावे । हाथों फासी सीस घुमावे ॥
कोइ आवै गधा पलानैं । काढै जीभ बुरही बानैं ॥
जगमें बुरे कर्म जिन कीन्हे । तिनकूं यों आवत जम चीन्हे ॥
बुरी बुरी सूरत ही बनिआवैं । कहांलगकहूंबहुतभयलावैं ॥१८॥
दोहा ॥
बुरे कर्म पापी करें, जिनकी यह गत जान ।
भले कर्म जो करत हैं, तिनका करूं बखान ॥१९॥
जो जग में पुण्यात्मा, चरणदास सुखपाय ।
तन छूटे गण पारषद, सुख सूं ही ले जाय ॥२०॥
चौपाई ॥
गण आवन कों रूप बखानूं । भिन्न भिन्न जैसे मैं जानूं ॥
कोई आवत ऐसे देखा । धरि आवै तपसीका भेखा ॥
कोई रूप वैशनों आवै । गलमाला अरु तिलक बनावै ॥
कोई आत पिता के रूपा । कोई आवै गुरू सरूपा ॥