भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६०१
दोहा ॥
प्रानी इसही दानसों, चांदिनही में जायँ ।
रनजीत कहै सुख कूं लंघै, उसही अंधेरु माहिं ॥३६॥
चौपाई ॥
आगैं भयानक ऊबट बाटा । उतर चढ़नके बहुतक घाटा ॥
बहुतक डर जहां आगै आवैं । प्रानी अतिव्याकुल हो जावैं ॥
कहा कहूं बहुते दुखदाया । जाकूं देखे कांपै काया ॥
आठ सहस जोजन मगसोई । तामें धीरज रहै न कोई ॥
आगै तप्त भानकी जारै । सोतो जोजन सहस अठारै ॥
वा पैड़ेमें तो सुख पावैं । कुवे बावड़ी ताल खुदावैं ॥
कै पो देवे मारग माहीं । प्यासे जलकूं नाटै नाहीं ॥
धर्मशाला में रखै भराई । कै ब्राह्मण घर दे पोंहचाई ॥
ठाकुरद्वारे माहिं भगवै । कै गुरद्वारे भर पहुँचावै ॥
कै सुन्दर से भवन बनाये । दिये दान जिन हां फलपाये ॥
बाटमाहिं जो बृक्ष लगावे । ऐसा दान काम हां आवे ॥
आय प्रापत जल हां होवै । तपत प्यास प्रानी की खोवै ॥
छ्यासीसहसजोजनमगगहिया । भिन्न भिन्न मैं तुमसों कहिया ३७
दोहा ॥
जमपुरी के निकट है, ताको करूं बखान ।
बैतरनी नदी जहां, सौ जोजन परवान ॥३८॥
चौपाई ॥
पीप रकत तामाहीं भरिया । प्रानी थरहर धीर न धरिया ॥
बीछू कीड़े सांप घनेही । दुखसों उतरे पाप सनेही ॥
जो अपने स्वामी कूं मारै । और ब्राह्मन कूं हनडारै ॥
प्यास लगै जब ऐसे करै । रकत पीप पी तृष्णा हरै ॥