भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बैतरनी कोई सकै न देखा । तामें लहरैं उठैं अनेका ॥
जाके हले जीव वे सारै । तल ऊपर कभी लगै किनारै ॥
अरु हां रक्षा करै न कोई । नाते हितू न संगी होई ॥
कृतघ्नी बिस्वांसी घाती । निजधर्मनके होय न साथी ॥३६॥
दोहा ॥
विना विचारे करत है, बरत करै जो भंग ।
मिथ्या वाद करै घना, रँगे लोभ के रंग ॥४०॥
चौपाई ।
सोवै नदी ही के माहीं । गिरते देखे पतित तहां हीं ॥
पतितों दीखे राध रकत की । पुनवारे कूं घीव शहद की ॥
जिसने दीया अन्नही दाना । और बसे तीरथ अस्थाना ॥
और नहात है गंगासागर । दृढ़ व्रत अपना रखै उजागर ॥
पोथी धरम सासतर केरी । लिखा लिखादे दान घनेरी ॥
साधों के चरितों की इछ्या । सतगुरू सेती लेवे दीछ्या ॥
जिन गौदान करै शुभबारा । ताकी पूंछ पकड़ हो पारा ॥
घने मनुष मैं उतरत देखे । बहुत सितांबी सुनौं बसेखे ॥४१॥
दोहा ॥
वाके आगे गिरि बड़ा, धरम सैल जिहनाव ।
सोनेका निर्मल इसा, जों बिलोर की दांव ॥४२॥
पतितनकूं दीखे नहीं, दीखे तो भय रूप ।
देखत है पुन्यात्मा, सुन्दर महा अनूप ॥४३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने महामार्गस्थानंनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
ऋपिउवाच ॥ दोहा ॥
फेर ऋषीश्वर बोलिया, नासकेत महाराज ।
मारग की जो तुम कही. नीके समझी आज ॥ १ ॥