भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५६६
जैसा कीया सो लुणैं, हम तेरे नहिं साथ ॥ २६ ॥
सबही मिल कहने लगे, हम तेरे अब नाहिं।
पाप पुण्य जो कुछ किया, सोही संगहि जाहिं ॥ २७ ॥
चौपाई ॥
जगत ठाठ जब ऐसे कहैं । तब प्रानी हकधक हो रहैं ॥
जबही मुंडी धुनने लागे । कहै माहिं क्यों इनके पागे ॥
हाय हाय मैं कछु नहिं कीया । राम भगति में मन नहिं दीया ॥
जिन कारन बहु पाप कमाये । सो मेरे अब काम न आये ॥
साध संग के माहिं न मिलिया । दया धर्मकी राह न चलिया ॥
भला कर्म सबही बिसराया । खोटे कर्मन सूं चितलाय ॥
सोच सोच सब और निहारैं । कोई न संगी हुआ हमारैं ॥
यों प्रानी पछतावा करै । जममारै लै आगे धरै ॥
चरणदास कहैं कछु न बसावै । ऐसे बांधा जमपुर जाव ॥२८॥
दोहा ॥
पकड़ बांध जम ले चलैं, गल में डार जंजीर ।
पापी जीवन दुख सहित, देत घनी ही पीर ॥ २६ ॥
जो जीहै पुण्यात्मा, सोवै सुखसूँ जाहिं ।
तिनकूं गण ले जात हैं, जम नहिं छूवैं छाहि ॥ ३० ॥
चौपाई ॥
दो हजार जोजन मगमाहीं । सहजरूप दुख सुख