भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लोहे कीसी कीलें पैनी । चुभचुभ जाय महादुख दैनी ॥
वह पैंडा है अति दुखदाई । जाहिं कष्ट सूं लोग लुगाई ॥
अरु धरमी जी सुख सूं जावैं । दिये दान सब आगै आवैं ॥
रथ चंडोल पालकी म्याना । हाथी घोड़े और विमाना ॥
ऐसी विध के बाहन आवैं । उन ऊपर चढ़ि बाट लंघावैं ॥
चरणदास कहैं जो ह्यां देवैं । जाका बदला आगे लेवैं ॥३१॥
दोहा ॥
जोजन दोय हजारही, पैंडा बालू रेत ।
दान जिन्हों पनहीं करी, सो-लंघि हैं सुख सेत ॥३२॥
आगै बारह सहसही, जोजन खांडे धार ।
महाविषम वह बाट है, पाप पुण्यही लार ॥३३॥
घोड़े के या बैलके, रथ देवे जो कोय ।
वह पैंडा सुख सूं लंघै, ताकूँ दुख नहिं होय ॥३४॥
चौपाई ॥
वाके आगे जलही आवै । रुकरहा भरा थाह नहीं पाव ॥
चहूँ ओर डरही डर लागै । आठ सहस्र जोजन वह जागै ॥
भूमिदान जिन दीया होई । सुखसूँ जाय पार हो सोई ॥
ऊंचा दान किया फल लावै । पगसूं धरती लगती जावै ॥
जलसूँ उतर चलै जो आगै । राह अँधेरी डर बहु लागै ॥
तीस सहस जोजन मगजानौ । तामें कष्ट अधिक पहचानौ ॥
बिजली चमक गरज बहुमानो । परलयकीसी निश्चित आनौ ॥
दानकिये दीवे तहां आवैं । सो प्रानी चांदिन में जावैं ॥
पचभीषम तुलसी के ठांईं । कै ठाकुरद्वारे के माहीं ॥
कै सतगुर के भवन मँझारै । बाटमाहिं कै दीपक जारै ॥
ब्राह्मण कै घर कै धर्मशाला । तीरथ पर कै दीवा बाला ॥३५॥