भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६०३
अब कहिए धर्मराय की, और सभा की खोल।
तुम दाता सुखदान हो, मीठे तुम्हरे बोल ॥ २ ॥
सभी करें परनामही, हमतो चरनही दास।
सुनबे को मन चाव करि, आ बैठे तुम पास ॥ ३ ॥
नासकेतउवाच ॥
नासकेत कर जोर कर, ऐसे बोले बैन।
तुम चरनन की रेनुका, हमरी है सुखदैन ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
नासकेत कहि दास तुम्हारे। तुम ह्यां आये भाग हमारे ॥
धरम राय की सबै सुनाऊं। और सभाकी खोल दिखाऊं॥५॥
दोहा ॥
जम नगरी वा पास ही, जिसके द्वारे चार।
छोटे नग्गर और बहु, वाही ठोर मंझार ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रतन जड़े जहां बहुते भांती। वा नगरीकी अतिही क्रांती ॥
बहुत अपसरा नृत्य करत हैं। बाजे बजत गीत उचरत हैं ॥
ताते सुन्दर होय रहा है। फूल बिछे बहु भूमि महा है ॥
सभामाहिं धर्मराय निहारा। ज्यों तारों में चन्दा सारा ॥
ऋषि जोगी तिंहपास विराजैं। किन्नर गन्धर्व अति छविछाजैं ॥
विद्याधर तिन केही पासा। बड़े सरप रहे उमँग हुलासा ॥
अत्रे मैत्रे भारद्वाजा। भृगु मरीच दधीच सुराजा ॥
गोतम दुरवासा महा जोगी। चिवन पुलस्त सुमित्र असोगी ॥
गालवि जातूकरन महामति। धर्म अधर्म विचार करैं नित ॥
और ऋषीश्वर बहु सतवादी। धरमरायढिंग जिनकी गादी ॥
बारह सूरज की समरूपा। बस्तर पहरैं रतन अनूपा ॥