सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 647, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 647

६०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चतुर वेद के पढ़ने वारे । अरु मीमांसा जानन हारे ॥
बहुत शास्त्र आप बनाए । धर्म काज जगमांहि चलाए ॥
धरमराय उन केही मांहीं । शोभांवत अधिक छविपाई ॥
सिरपर सुन्दर मुकुट धरेही । बहुत भांति के रतन जड़ैही ॥
तेज कहूं ज्यों बारह भाना । करै न्याव ज्यों दूध अरुपाना ॥
प्रानी कूं जमगण ले जांई । खड़ा करै जाकर वह ठांई ॥
धरमराय कहै हां ले जावो । चित्रगुपतही कूँ दिखलावो ॥
पाप पुण्य का लेखा करै । प्रानी किया सु दुख सुख भरै ॥
छिपकर अरु परगट ज्यो कीया । चित्रगुप्त ने सब कह दीया ॥
पाप पुण्य सब कह समझावै । धर्मराय जब न्याव चुकावै ॥
कहैक पहले भुगतै पापा । नरक मांहि फिर देहु संतापा ॥
दोहा ॥
नरक अठारह है जहां, जिन किये जैसे पाप ।
वैसे मांही डाल हैं, तैसो तिन्हें संताप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
ऐसा जमपुर चार दुवारे । भांत भांत के न्यारे न्यारे ॥
पूरब दिशा एक है द्वारा । दूजा पच्छिम और निहारा ॥
तीजा उत्तर दिशा सुनाऊं । चौथा दक्षिण और बताऊं ॥
कहूं द्वार पूरब की जानूं । जाकी महिमा सभी बखानूं ॥
जिन प्रानी ऐसे कर्म कीने । कपड़े लकड़ी जाड़े दीने ॥
पानी गर्मी मांहि पिलाये । रस्ते में जिन वृक्ष लगाये ॥
थके मनुष बाहन चढ़वाये । भूखे कूँ भोजन करवाये ॥
गुरु के सेवन की ब्रतलीनी । अरु साधन की संगत कीनी ॥
उत्तम तीरथ किये संभारी । दया धरम हिरदय में धारी ॥
कथा कीरतन बरत बसेखे । पूरब द्वारे बढ़ते देखे ॥