भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चतुर वेद के पढ़ने वारे । अरु मीमांसा जानन हारे ॥
बहुत शास्त्र आप बनाए । धर्म काज जगमांहि चलाए ॥
धरमराय उन केही मांहीं । शोभांवत अधिक छविपाई ॥
सिरपर सुन्दर मुकुट धरेही । बहुत भांति के रतन जड़ैही ॥
तेज कहूं ज्यों बारह भाना । करै न्याव ज्यों दूध अरुपाना ॥
प्रानी कूं जमगण ले जांई । खड़ा करै जाकर वह ठांई ॥
धरमराय कहै हां ले जावो । चित्रगुपतही कूँ दिखलावो ॥
पाप पुण्य का लेखा करै । प्रानी किया सु दुख सुख भरै ॥
छिपकर अरु परगट ज्यो कीया । चित्रगुप्त ने सब कह दीया ॥
पाप पुण्य सब कह समझावै । धर्मराय जब न्याव चुकावै ॥
कहैक पहले भुगतै पापा । नरक मांहि फिर देहु संतापा ॥
दोहा ॥
नरक अठारह है जहां, जिन किये जैसे पाप ।
वैसे मांही डाल हैं, तैसो तिन्हें संताप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
ऐसा जमपुर चार दुवारे । भांत भांत के न्यारे न्यारे ॥
पूरब दिशा एक है द्वारा । दूजा पच्छिम और निहारा ॥
तीजा उत्तर दिशा सुनाऊं । चौथा दक्षिण और बताऊं ॥
कहूं द्वार पूरब की जानूं । जाकी महिमा सभी बखानूं ॥
जिन प्रानी ऐसे कर्म कीने । कपड़े लकड़ी जाड़े दीने ॥
पानी गर्मी मांहि पिलाये । रस्ते में जिन वृक्ष लगाये ॥
थके मनुष बाहन चढ़वाये । भूखे कूँ भोजन करवाये ॥
गुरु के सेवन की ब्रतलीनी । अरु साधन की संगत कीनी ॥
उत्तम तीरथ किये संभारी । दया धरम हिरदय में धारी ॥
कथा कीरतन बरत बसेखे । पूरब द्वारे बढ़ते देखे ॥