भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
: नासकेतलीलावर्णन । ५८१
कहा कि पहिले बेटा पैहै । जिंह पाछै नारी हू अह है ॥
ऋषिने पिछली कही समझाई । आदि अन्तलों सबै सुनाई ॥
वंश हेत ब्रह्मा पै धायो । विधिने ऐसे बचन सुनायो ॥
पहिले पुत्तर पाछे तिरिया । तेरे भागन में यों धरिया ॥
यों कहि अन्तरध्यान विचारा । मैं निज अस्थलआन संभारा ॥
फिर रहकर तपही आराधा । मनमें रहै वासना व्याधा ॥
ताते बीज टरा कर लीना । ताकूं पदम माहिं धरदीना ॥
कुशालपेटी गंग बहाया । तो कन्या न्हाती हां आया ॥
वाकूं सूंघा कर में लया । बीज चढ़ा गर्भ होही गया ॥
नासा द्वार जनम जिन लीया । नासहीकेत नांव धरदीया ॥
कर कर कन्या क्रोध बहाया । ऐसे पुत्तर पहिले आया ॥
फिर वह वाकूं ढूंढ़न धाई । ऐसे मो अस्थल में आई ॥
ब्रह्मा बचन न टारे टरै । कोटि उपाव जु प्रानी करै ॥
ऋषि मुनि देवत दैयत सारे । समरथ कौन जु वाकूं टारे ॥
उद्दालक सब खोल सुनाई । रनजीतकहें राजामनआई २५
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
तिस उप्रान्त जु भूप कूं, अचरज भयो हुलास ।
फिर उठकै महलों गया, रानी ही के पास ॥२६॥
चौपाई ॥
खुशी खुशी रानी सूं बोला । ऋषिका कहा सभी जो खोला ॥
रानी सांच मानियो सोऊ । ब्रह्मा बचन जु पूरे होऊ ॥
सुन रानी हियरे हुलसाई । अरु आपस में बात सुनाई ॥
राजा निकस द्वार फिर आया । उद्दालक कूं निकट बुलाया ॥
भक्ति सहित हँसकर यों बोला । बचन प्रीत के कहे अमोला ॥
सुन्दर रथ अरु सेवक मेरे । लेजा अपने संग सवेरे ॥
५८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्द्रवती अरु बालक ल्यावो । ऐसे कही सिताबी आवो ॥
ऋषि सुन बचन खुशी जो भया । रथ सेवक ले अस्थल गया २७
दोहा ॥
रैन रहे अस्थान पर, गवन बिचारा भोर ।
दोनों रथ बैठाय कर, चाला वाही ओर ॥२८॥
चौपाई ॥
चला चला राजा पै आया । राजा देख बहुत सुख पाया ॥
राजा रघु अरु उसी की रानी । दोनोंने मिल सुता पिछानी २९
दोहा ॥
रोकर जब माता मिली, लीन्हीं कंठ लगाय ।
अरु नारी परवार की, सभी मिली जो आय ॥३०॥
चौपाई ॥
जब पण्डित कूं लिया बुलाई । साहा काढ लगन धरवाई ॥
किया विवाह दान बहु दीना । कपड़े गहने सेज नवीना ॥
दासी दासे दीने साथी । रथ घोड़े करहे अरु हाथी ॥
सोने मंढ़े सींग दई गइया । दूध भरी जो भैंसें दइया ॥
अरु बहु भांती दीने दाना । दीनी भौम बहुत सुखमाना ॥
बिदा करत जोरे दोउ हाथा । बिनती करी जु पिरथीनाथा ॥
नमस्कार कर ठाढ़ो भयो । जब ऋषि हंसकर ऐसे कह्यो ॥
कही उद्दालक सुनहो राजा । हस्ती घोड़े हम कहा काजा ॥
गहने कपड़े हम कहा करिहैं । इतना दान कहां ले धरि हैं ॥
सकल दहेज दिया ऋषि फेरी । एक न राखा चेरा चेरी ॥
चरनदास कहैं कछू न लीया । उलटा सभी फेर जो दीया ३१
दोहा ॥
नासकेत चन्द्रावती, बैठा कर रथ माहिं ।
नासकेतलीलावर्णन । ५८३
दोनों ही कूं ले गया, अपने आश्रम ठाहिं ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
तब हां सुख सों रहने लागे । सरसनेह में तीनों पागे ॥
रनजीत कहैं यह कथा पुरानी । जाकीमहिमा ऋषिन बखानी ॥
मनुष देवता पंडित गावै । धरमनीक सुनकर हुलसावै ॥
जित जित और पुरानन गाई । पाप मिटावन अरु सुखदाई ॥
ानरी धरमकी नवका जानौं । सुन्दर अधिक पवित्र मानौं ॥
भक्ति भावकर सुनैं जु कोई । भव जल पार उतर है सोई ३३
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रावतीविवाहो नाम
चतुर्थोऽध्याय ॥ ४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन जनमेजय भूप ।
तप करते ऋषि ने दिया, सुत कूं श्राप अनूप ॥ १ ॥
कहा कि जा जमलोक कूं, भारी कीया पाप ।
नासकेत लिया मानकै, उद्दालक का श्राप ॥ २ ॥
जनमेजयउवाच ॥
फिर जनमेजय पूछिया, हे बिप्पर सुन लेह ।
सुत कूं दीया श्राप क्यों, मोमन यह संदेह ॥ ३ ॥
सुतकूं दैना श्राप जो, दुर्ल्लभ सी यह बात ।
ऊपर अपनी आतमा, कैसे सोहै घात ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
कौन प्रयोजन दिया सरापी । कैसे गया जमपुरी आपी ॥
कैसे देख देख सब आया । मोसौं सबही कहो सुनाया ॥
किसा नरक है जित दुख दावैं । किसा स्वर्ग है जहां सुख पावैं ॥
३९
५८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
बोले बैशम सुनहो राजा । दिया सराप जौनही काजा ॥
जाकर हां सूं आया जैसे । चित दे सुनौ कहूं अब तैसे ॥
एक दिना उदालक राया । नासकेत कूँ वचन सुनाया ॥
मैं रहूं घर तुम बनकूं जावो । कन्द फूल फल लकड़ी लावो ॥
अगनहोत्र जासूँ हम करि हैं। शुभ करमों के कारज सरिहैं ॥
पिता की आज्ञा लेकर धाये । चले चले बन माहीं आए ॥
जिन हां एक सरोवर देखा । कंवल भरे ता माहिं बसेखा ॥
आसपास द्रुम हैं बहु भांती । फूले फले सुगन्ध सुहाती ॥
नाना पंछी बोलें बानी । सुन्दर ठोर देख मन मानी ॥
जित हां विधसूँ करि अस्नाना । देवत पित्तर पूजन ठाना ॥
दोहा ॥
नईवेद फल फूलसों, जिनक परसन कीन ।
रनजीता यों कहत है, अंजली सों जलदीन ॥ ६ ॥
फिर यों मन में आइया, बैठ धरूं हरि ध्यान ।
आराधन प्रभु को करूं, ऐसो उपजो ज्ञान ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
तहां बैठ कर आसन कीनो । हरिके ध्यान माहिं मन दीनो ॥
जोग ध्यान की जुगत विचारी । सुरत लीन भई लागी ताडी ॥
दो अरु तीसदिना यो रही । बहुरु आप सहज खुलगई ॥
जबही घरकी चिंता आई । पिता की आज्ञा चितमें छाई ॥
तातें बेग चला हां आया । देख पिता कूं सीस नवाया ॥
देख पिता पुत्तर की ओरी । बचन क्रोध कहा वा ठोरी ॥
अगनहोत्र में विघ्न भया था । यातें बचन कठोर कहा था ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५८५
रे पापी तू कित सूं आया । मेरा आयसु सभी भुलाया ॥
मैं भेजा फल फूल ही काजे । अग्निहोत्र के करने साजे ॥
अग्निहोत्रका तैं किया नासां । वा दिन मोमन रहा उदासा ॥८॥
दोहा ॥
अग्निहोत्र है देवता, परसन ब्रह्मा आदि ।
पितर मुनि तिरपत भवें, सुखदाई धर्मादि ॥६॥
बचन पिताके सुनलिए, बोले नासही केत ।
समझावत हो जो अबै, पुत्तरही के हेत ॥१०॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
सुनो पिता यह जानो दाई । अग्निहोत्र बंधन जगमाहीं ॥
जनम मरन के भय का दाता । सुख का नास करन ए बाता ॥
जोग समान और कछु नाहीं । जग समुद्र जासूं तिरजाई ॥
ब्रह्मा इंदर आदिक देवा । जोगही करिकै यह सिध लेवा ॥
सिद्ध होन का ऐसा कोई । और उपाव न दूजा होई ॥
उद्दालक उवाच ॥
हे पुत्तर ऋषि बड़े निहारे । अधिक तपस्या करनेवारे ॥
तिनहूं अग्निहोत्र कूँ धारा । जान पवित्र हिये मँझारा ॥
ऐसे वेदमाहिं लिख राखा । रनजीत कहैं उद्दालक भाखा ॥११॥
दोहा ॥
अग्निहोत्रही के बिना, ब्रह्म जज्ञ नहिं होय ।
अति पुनीत यह करमहै, करो चाव सो सोय ।
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत कहै बचन हमारे । सुनो पिताजी कहूं विचारे ॥
अग्निहोत्र कर सुरग सिधारै । फेर जन्म पिरथी पर धारै ॥
५८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
• करमोंही से आवै जावै । विना जोग नहिं थिरता पावै ॥
पाप पुण्य दोऊ बेड़ी पग मैं । इन कूं तोड़ चलै हरि मग मैं ॥
भक्ति जोग अरु निर्मल ज्ञानो ।इनसूं मुक्ति होय सतजानो ॥
तीनों में सरधा सोई करै । निहचै भवसागर सूं तरै ॥
वास लहै चौथे पद माहीं । जनम मरन फिर होवे नाहीं ॥
कर्म करै अरु फल कूं चाहै । मुक्ति न पावै दुख सुख दाहै॥१३॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
वैशंपायन कहत है, सुन जनमेजय भूप ।
उद्दालक सुन बचन सूं, भया तमोगुन रूप ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
अरु मुखसों कहि पापी दोखी । तैने खोटी कही अनोखी ॥
है जु पिता का दूषक भारी । वेग जाउ जमलोक मँझारी ॥
ब्रह्म दण्ड तू मारा गया । तू जमलोक जोगहीं भया ॥
फिर सुनकर वह नासहिकेता । बड़े श्राप भू गिरा अचेता ॥
फिर चेतन होय ऐसें भाखा । पिता श्राप सीस पर राखा ॥
जाऊंगा जमलोक अवारूं । तुम्हरी आज्ञा कबहु न टारूं ॥
गिरापुत्तरकूं मुनि जबदेखा । ऋषिब्याकुल भया अधिकबिशेखा ॥
शोक घने सूं तपत भया है । बहु विलाप दुख घना ल्याहै॥१५॥
दोहा ॥
हाय पुत्र मम आतमा, मैं तोहिं दीनों श्राप ।
मैं क्रोधी अज्ञान हूं, लिया ढांप मोहिं पाप ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर धर्मराय जहां है । मारग दारुण दुःख तहां है ॥
और नरक हां है भयमाना । वैसी ठौर न तोकूं जाना ॥
छोटा बालक डर हां भारी । दुख भुगतत हैं नर अरु नारी ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५८७
मोकूं अरु अपनी माताकूं । हमें छोड़ के ह्वां मत जातू ॥
ऐसे वचन पिता जब बोले । नासही केत दीन हो बोले ॥
नांसकेत उवाच ॥
एहो पिता डिगा मत मोकूं । नमस्कार बहुते करूं तोकूं ॥
ध्यान तुम्हारो हिरदै धरि हूं । वचन तुम्हारे कूं सब करिहूं ॥
सत से सूरज तपता मानौं । सतसूं पिरथी कूं थिर जानौं ॥
सतसूं अगन जलत है सोई । सतसूं चन्दा अस्थित होई ॥
सतसूं लोक रहत ठहराई । सतसूं धर्म सदा बिरधाई ॥
सतसूं यह ब्रह्माण्ड खड़ा है । सत सूं सत्ती सूर अड़ा है ॥
हे महाराज साख कहूं एका । एक समय विधि कियो विवेका ॥
अश्वमेध यज्ञ सहस्रु लीने । इक पलड़े में राख जु दीने ॥
दूजे पलड़े में सत राखा । भारी भया सांच यह साखा ॥१७॥
दोहा ॥
यज्ञ पलड़ा ऊंचे गया, सत पलड़ा रहा भार ।
सत करिकै जो रहत नर, सोमसान सम धार ॥१८॥
ज्यों मसान तज दीजिए, वा नर कूं यों त्याग ।
सत्य जतन कर राखिये, सतही सेती लाग ॥१९॥
स्वर्ग सत्तसूं पाइये, सतही सों गति होय ।
सत्य धर्म सें हीन नर, जाहि नरककूँसोय ॥२०॥
तातें शोक निवारिये, बुधकों थिर कर लेहु ।
मैं जाऊं जमलोक कँ, येहि जु आज्ञा देहु ॥२१॥
ठौर ठौर कूं देखकर, आऊं चरनों पास ।
बेगहि आ दरशन करूं, मतहो नेक उदास ॥२२॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन कहत है, हे राजा सुज्ञान ।
५८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेत कहि पिता सूं, फिर भया अन्तर ध्यान ॥२३॥
चौपाई ॥
इतनी कहि फिर गवन विचारा । गया जोग वल लगी न वारा ॥
ऐसे जमके लोक पधारा । धरमराय का दरस निहारा ॥
सिंघासन के ऊपर राजे । अगन पुंज ज्यों तेज विराजै ॥
जव इन हाथ जोड़ दोउ लीया । अस्तोत्तरधर्मराय का कीया ॥
भक्ति भावकर जुक्ति संभारै । लिये दीनता लज्जा धारै ॥
धरम नीक परवीन महाई । रनजीत कहै तिरलोक वड़ाई ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमदर्शनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
पैठि सभा के बीच में, दीठ वुद्धि उद्धार ।
पण्डित वहुत विराजई, विद्या का उजियार ॥ १ ॥
सारदूल से भूप सुनि, वालक कियो वनाय ।
अस्तोत्तर धर्मरायका, सो अव कहूं सुनाय ॥ २ ॥
नासकेत उवाच ॥
नमस्कार धर्मराय कूं, सर्व पिता महिदेव ।
तीत लोक रक्षा करन, सकल हरन निरलेव ॥ ३ ॥
सूरज सुत मरजाद धरि, नीति शास्त्र के रूप ।
धर्म अधर्म विचार कै, न्याई अधिक अनूप ॥ ४ ॥
सव पित्रों के नाथ हो, पूजैं सव सुर आदि ।
वुद्धिमान धर्मात्मा, सतवादी विन वाद ॥ ५ ॥
क्रांन्त वड़ी अरु निर्मला, महा पवित्तर देह ।
परजाओं के पति वड़े, नमस्कार मम लेह ॥ ६ ॥
अधिकारी धर्म ध्यान के, लक्ष्मीवान सुजान ।
नमस्कार मम लीजिए, वहुरूपी वहु ज्ञान ॥ ७ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५८६
नमस्कार मम लीजिए, पाप मिटावन हार ।
बेल बढ़ावन धर्म के, अस्तुति बारम्बार ॥ ८ ॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन राजा यह शिक्ष ।
अस्तोत्तर ऋषिसुत कियो, पापदहन परतिक्ष ॥ ६ ॥
यह अस्तोत्तर सुन खुसी, बोला धर्महि राय ।
हे ब्राह्मण परसन भयो, पूछत हूं हरषाय ॥१०॥
क्यों कर आया कहां सूं, कै किन दिया पठाय ।
कै तू आया आपसूं, हम कूं कहो सुनाय ॥११॥
चौपाई ॥
जब यों पूछा धर्महि राया। रे बालक तू ह्यां कित आया ॥
बिना बुलाये ना कोइ आवे। अरु अपनी देह नहिं लावे १२
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
नासकेत ऐसे कही, दीनों पिता सराप ।
अब तू जा जमलोक कूं, यों मैं आयो आप ॥१३॥
चौपाई ॥
पिता सराप आपही आयो। तुम्हरे दरशन कर सुख पायो ॥
यम उवाच ॥
धरमराय सुन बचन उचारा । धनधन बालक परन तुम्हारा ॥
आज्ञा मान पिता की आए। हम तुमपै बहुतै हरषाए ॥
हे बुधिमान कहा तोहि चहिए । मनमें हो सो हमसों कहिए ॥
सुखसों बिचर जमपुरी माहीं । बरमाँगे सो ले अब ह्याहीं ॥
नासकेत उवाच ॥
अहो देव तू परसन मोपै। तो इक बर मांगूं मैं तोपै ॥
सुन्दर नगर तुम्हारा कैसा। सभी दिखावो जित जित जैसा॥
५६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुपत कूं मोहिं मिलावो। ह्यांका सबही भेद जनावो ॥१४॥
दोहा ॥
पतितन कूं दुख होत है, धरमी सुख निवास ।
एहू ठौर दिखाइए, मैं चरणन को दास ॥१५॥
चौपाई ॥
तिह उपरान्त धरमही राया । किंकर अपना कूं जु सुनाया ॥
या बालक कूं संग ले जावो । चित्रगुपत ही कूं जु मिलावो ॥
यह ब्राह्मण है पण्डित भारा । सत्त धर्म का जानन वारा ॥
श्राप पिता के ह्यां चलि आया । याको नगरी देहु दिखाया ॥
चित्रगुप्त कूं याजा दीज्यो । मेरी अज्ञा सूं यों कीज्यो ॥
वैशंपायन उवाच ॥
ऐसे दूतन सों कहि दीया । नासकेत को जब संग लीया ॥
चित्रगुप्त के जाके द्वारे । द्वारपाल सों वचन उचारे ॥
दूत उवाच ॥
धर्मराय ने हमें खंदाया । नासकेत कूं संग पठाया ॥१६॥
दोहा ॥
चित्रगुप्त के पास ही, जाय कहो यह बोल ।
सुनकर गए सिताबही, बात कही सब खोल ॥१७॥
चौपाई ॥
चित्रगुप्त सुनिये महाराजा । धर्मराय भेजे इस-काजा ॥
इक ब्राह्मण कों संग पठाया । दूतन साथ पोलि पै आया ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
पूछो जाय सिताबी वाकों । कै भीतर ले आवो ताकों ॥
वैशंपायन उवाच ॥
द्वारपाल सब कूं ले गया । चित्रगुप्त का दरशन भया ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६१
चित्रगुप्त दूतन सों पूछा । तबही दूत बचन कहे गूछा ॥
दूत उवाच ॥
हे बड़भाग सुनौ करि दाया । धरमराय ने हमें पठाया ॥
यह ब्राह्मण आया बुधिव्राना । सत्य धर्म में दृढ अति स्याना ॥
पिता सराप जमपुरी आया । याका चाव करो मन भाया ॥१८॥
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त जो बोलिया, सुन ब्राह्मण महाराज ।
तो इच्छा पूरी करूं, खोल कहो अब काज ॥१६॥
नासकेत उवाच ॥
जानत हो सब नरन की, गुप्त प्रगट जो बात ।
कछू नहीं तुम सूं छिपा, द्योस करो कै रात ॥२०॥
तेजवंत प्राकर्म ही, बड़े तुम्हारे काज ।
देखा चाहूं जमपुरी, अरु सब ह्यां के साज ॥२१॥
चौपाई ॥
अरु इक मनकी खोल सुनाऊं । दुख सुख ह्यां के देखा चाहूं ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
धरमराय को बचन हमारो । हे दूतो तुम हिरदै धारो ॥
ठौर ठौर सब जाय दिखावो । संगहि रहो फेर ह्यां ल्यावो ॥
इसे नरक दुख पवन न लागे । रक्षा सो ले जाहु सुभागे ॥
वैशंपायन उवाच ॥
चित्रगुप्त की आज्ञा पाई । सगरी नगरी जाय दिखाई ॥
नासकेत देखतही जाई । ठौर ठौर देखी हित लाई ॥
सात स्वरग अरु नरक अठारा । भिन्न भिन्न कर देखा सारा ॥
सब दिखाय फिर लाये पासा । नमस्कार कर होय हुलासा ॥२२॥
५६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त कही दूतसों, पूरी भई जु आस।
अब याकूं ले जाइए, धरमराय के पास॥ २३ ॥
सुनकै तुरतही लेगए, नमस्कार करि जाय।
धर्मराय वा देखकै, बोले अधिकी भाय ॥ २४ ॥
आधा आसनही दिया, बैठाया कर चाव।
चरन धोय पूजाकरी, जान किया ऋषि भाव ॥२५॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धरमराय हँस बचन सुनाए। सभी देख कहो सुख सूं आये ॥
नासकेतजी ठौर निहारी। तुमने देखी नगरी सारी ॥
नासकेत उवाच ॥
तुम किरपा सों स्वर्ग निहारे। अरु हम देखे नरक अठारे ॥
पापी पुन्यो सब हां देखे। अरु उनके फल सभी बिसेखे ॥
अबइक अरज़ और सुन लीजे। घर जाने की आज्ञा दीजे ॥
माता दुखी पिता दुख भारूं। जाय मिलूं दुख सबही टारूं ॥
उनसूं बचन किया था आगूं। देख जमपुरी चरनों लागूं॥२६॥
दोहा ॥
नमस्कार कर यों कही, देखो सबही भेव।
अब मात पिता पै जायहूं, मोकूं आयसु देव॥ २७॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धर्मराय कही आछी बाता। बचन कहो यह मोहिं सुहाता ॥
अब हम तोकूं यह वर दीना। होगा अमर सदा परबीना ॥
अरु काया बूढ़ी नहि होगी। हमरे बरतैं रहै निरोगी ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६३
वैशंपायनउवाच ॥
नासकेत बर ले सिर नाया । मातपिताढिंग बेगही आया ॥
चला जोगबल लगी न बारा । एक पलक में जैसे तारा ॥
रोवत माता कूं जहां पाया । पिता शोक में था अधिकाया ॥
पुत्तर कूं जब आया देखा । उद्दालक भया खुशी विशेखा ॥
पिता और चन्द्रावति माई । हरष मान बहुकरी बधाई ॥२८॥
उद्दालकउवाच ॥
दोहा ॥
जनम करम पूजा सभी, सुफल भए मम आज ।
पुत्तर का मुख देखतें, सभी गए दुख भाज ॥ २६ ॥
चौपाई ॥
उद्दालक कह्यो वाकी मासूं । देख जमपुरी आया हां सूं ॥
जोग तपस्या बल कूँ देखो । अपने मन में कर कर लेखो ॥
जमपुर गया देख अरु आया । हांका भेद सभी जो लाया ॥
यों कहि नासकेत कों ताका । पूंछूं बरनन करि सब वाका ॥
किसी जमपुरी देखी कैसे । कैसा मारग आया जैसे ॥
कैसा देखा वह जमराया । कहापिया अरु क्यातुमखाया ॥
जो जो देखा सो अब कहिये । हमसे सभी कहा जो चहिये ॥
नंरक माहिं दुख कैसे कैसे । सुरग माहिंसुख जैसे जैसे ॥३०॥
दोहा ॥
अपनी आंखों देखकर, तुम आये या ठौर ।
सुन सुनकै जानत हुते, सभी ऋषिश्वर और ॥३१॥
नासकेतउवाच ॥
चौपाई ॥
नासकेत जोरे दोऊ हाथा । कहने लागे हांकी बाता ॥
५६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तुम किरपा जमलोक सिधारा । बहु देवन का दरस निहारा ॥
चित्रगुपतही अरु धर्मराया । उनहूं का मैं दरशन पाया ॥
सर्वलोक दण्ड देने वारा । सोइ काल मैं लिया विचारा ॥
जमके दूत बड़े बलवाना । जिनकी सूरत भांति जुनाना ॥
धर्मराय को जा मैं चीन्हा । अस्तुति करकर परसन कीन्हा ॥
उन मोकूं बर दिया असोगा । कहा किअजर अमर तू होगा ॥
अरु कही जाहु पिताके पासा । जबमें आया तुम्हरा दासा ॥३२॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने पितापुत्रसंवादो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
हे राजा ताही समय, ऋषिआये वा ठौर ।
नासकेत के दरसको, काज न कोई और ॥ १ ॥
रघुराजा कों आदिदे, अरु आये बहुभूप ।
ऋषिराजा बहु आइया, अचरज सुना अनूप ॥ २ ॥
अचरज लखि कहने लगे, आपसही के माहिं ।
गए जमपुरी आइया, ढीललगाई नाहिं ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
पूछन उद्दालक घर आये । नासकेत ह्वांकी सुध लाये ॥
इक इक ऋषिकूँ यों पहिचानों । बलती अगन तेज ज्योंजानों ॥
इक ऐसे पखवारे मांहीं । रणजीत कहै वे भोजन खाई ॥
एक जु ऐसे मास उपासी । जग भोगन सों रहें उदासी ॥
इक जल माहिं तपस्या करई । इक पचअगनी तपकूँ धरई ॥
एक अधोमुख तपकों साधै । इक सूरजही कों आराधै ॥
एक स्वासकों जान न देई । कुंभक साधरहै है वेई ॥
रहै एक जो पवन अहारा । एकों निराहार व्रतधारा ॥४॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६५
दोहा ॥
एक पांव बाजे खड़े, बाजे ऊरध बाहु ।
बाजे मौन गहे रहें, ऊंचे फल की चाहु ॥ ५ ॥
बाजे नगन शरीर हैं, बाजे करें जु होम ।
बाजे साधैं जोगही, लखिकै उत्तम भौम ॥ ६ ॥
कोइ चन्द्रायण बर्त कर, रहे जु तपके माहिं ।
कोई इक सूखे पात जो, तरवर ही के खाहिं ॥ ७ ॥
ऐसे ऐसे ऋषि सबै, नासकेत ढिग आय ।
पूछन की इच्छा सहित, दरशन ही के चाय ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
सबही मुन मिलबे कूं धाये । नासकेत उठ शीश निवाये ॥
मिलकर बैठे आश्रम माहीं । नासकेत सूं पूछत जाई ॥
जो जो अपनी आंखों देखा । सो सो हमसों कहो बसेखा ॥
जो तुम देख जमपुरी आये । समाचार ज्यों ह्वां के लाये ॥६॥
ऋषिउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे ऋषि पूछत भए, नासकेत सूं बात ।
ह्वां का सब विस्तारही, कहिये हमरे साथ ॥ १० ॥
ह्वांके मनुष्यन की कहौ, क्रोधवन्त कै शान्त ।
कडुवे कै मीठे वचन, ज्ञानवन्त कै भ्रान्त ॥ ११ ॥
चौपाई ॥
कैसा पाप पुण्य का भेदा । कैसा जीवन कूं ह्वां खेदा ॥
कैसा नरक स्वरग का बासा । कहा कहा ह्वां जमकी त्रासा ॥
ह्वां का सबही करौ बखाना । एकदिना हमहूं कूं जाना ॥
सुखी होन की चाल बताओ । धरम करम हमकूं समझावो ॥
५६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ह्वां का भेद कछू मत राखो । कहैं कहां लो सब तुमभाखो ॥
जमलेने कूं कैसे आवैं । या प्रानी क्योंकर ले जावैं ॥
दुख सुख कहा बाट के माहीं । केते द्योसन में ले जाईं ॥
यों कहकर मुख ताकन लागे । नासकेत जब भाषन लागे १२॥
नासकेतउवाच ॥
दोहा ॥
नासकेत जब यों कही, सुनों ऋषीश्वर साख ।
जो जो देखा जमपुरी, सभी कहतहूँ भाख ॥ १३ ॥
चौपाई ॥
सुनों ऋषीश्वर चित अब दीजै । अब मैं कहूं सबै सुन लीजै ॥
महाभयानक दुख बहु भारै । सुनकर रोम उठै तन सारै ॥
पिता सराप गया मैं ह्वांईं । धर्मराय थे ललित तहांईं ॥
मैं अस्तुति करि परसन कीना । आधा आसन उन मोहिंदीन्हा॥
देवत बहुत सातुकी देखे । बलतकार जमदूत बलेखे ॥
चित्रगुपत मैं नैन निहारा । सबकूं शिक्षा देने वारा ॥
अरु मैं दीन होय बरपाया । कही अमर होगी तो काया ॥
पिता दया मैं फिर ह्यां आया । कहूं जु ह्वांकीं सबैसुनाया ॥१४॥
दोहा ॥
सुन्दर नगर सुहावना । जमपुर ताका नाम ।
सहस जोजन विस्तार है, सत्य न्याव की ठांव ॥ १५ ॥
चौपाई ॥
महा भयानक कोट निहारा । जोजन पांच भीत उचियारा ॥
दक्षिण दिशा ताहि कूं जानौं । तिसके द्वारे चार पिछानौं ॥
जैसे कर्म करै जो कोई । तैसे द्वारे बड़ि है सोई ।
पिरथम जमगण जगमें धावैं । या प्रानी कूँ लेने आवैं ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६७
जैसे पाप करै नर लोई । जम सूरत बनिआवै वोई ॥
याकूं मार पकड़ ले जावैं । जैसे कर्म किये भुगतावैं ॥१६॥
दोहा ॥
या प्रानी जा भांति के, लीन्हे पाप लगाय ।
वा भांती जम आय हैं, भयको रूप बनाय ॥१७॥
चौपाई ॥
कोई सूकर पर चढ़ आवै । कांधे गदा बहुत डरपाव ॥
कोई चढ़े सिंघ की पीठा । करमें गुरज बुरी ही डीठा ॥
कोई जम चढ़आवै भैंसे । बुरी आंख अरु ऊंचे कैसे ॥
कोई आवै जरक सवारी । दांत बड़े मुगदर लिये भारी ॥
कोई मुरदे के चढ़ि कांधे । खैंचु कमान तीर ही सांधे ॥
कोई कुत्ते पर चढ़ि धावे । हाथों फासी सीस घुमावे ॥
कोइ आवै गधा पलानैं । काढै जीभ बुरही बानैं ॥
जगमें बुरे कर्म जिन कीन्हे । तिनकूं यों आवत जम चीन्हे ॥
बुरी बुरी सूरत ही बनिआवैं । कहांलगकहूंबहुतभयलावैं ॥१८॥
दोहा ॥
बुरे कर्म पापी करें, जिनकी यह गत जान ।
भले कर्म जो करत हैं, तिनका करूं बखान ॥१९॥
जो जग में पुण्यात्मा, चरणदास सुखपाय ।
तन छूटे गण पारषद, सुख सूं ही ले जाय ॥२०॥
चौपाई ॥
गण आवन कों रूप बखानूं । भिन्न भिन्न जैसे मैं जानूं ॥
कोई आवत ऐसे देखा । धरि आवै तपसीका भेखा ॥
कोई रूप वैशनों आवै । गलमाला अरु तिलक बनावै ॥
कोई आत पिता के रूपा । कोई आवै गुरू सरूपा ॥
५६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोई करत कीरतन धावैं । हरि के गुण गावतही आवैं ॥
कोई आवै माला फेरत । वा प्रानी कूं हितसूँ हेरत ॥
कोई रथ विमान ले आवैं । हरि गुरुका कोइ नाम जपावैं ॥
कोई पालकी घोड़े ल्यावैं । कोई हाथी लीये आवैं ॥
शुभकर्मी कूँ तहां चढ़ावैं । सुखदेते जमपुर ले जावैं ॥२१॥
दोहा ॥
मृत्युलोकसूँ राह जो, जमपुरही की जान ।
छ्यासी सहस जोजन सबै, इतनों है परमान ॥२२॥
आठ ठौरहै कष्ट की, वाही मारग माहिं ।
दुख सुखही भुगतावते, जमगण ले ले जाहिं ॥२३॥
चौपाई ॥
जब प्रानी की छूटे देही । सब मिल आवैं कुटुम्ब सनेही ॥
बांध जोड़ कर अरथी करै । चार मनुष्य कै कांधै धरै ॥
ले जावैं मरघट के मांहीं । मुंह झुलसैं अरु देह जलाई ॥
तब हां नेक नहीं ठहरावैं । अपने अपने घरकूँ जावैं ॥
जबहीं जुदे होय परवारी । मात पिता सुत धन अरु नारी ॥
पाट पटम्बर हीरे मोती । सबही अलगहोय कुलगोती ॥
बाग महल हाथी अरु घोड़े । सबने पीठदई मुख मोड़े ॥
राजकटक अरु मुलक भौमही । दूरहोय सबतेज जौमही ॥
बीर भतीजे अरु यह देही । रनजीत कहैं कोई नाहिं सनेही ॥
जूवे हारा धाडी लूटा । ऐसे चाला सबसे छूटा ॥२४॥
दोहा ॥
जिन कारन बहु पापकरि, लाता दरब कमाय ।
अपना कर कर जानता, देता तिन्हें खुलाय ॥२५॥
वे वाके होवें नहीं, तोड़ि कहैं यह बात ।
नासकेतलीलावर्णन । ५६६
जैसा कीया सो लुणैं, हम तेरे नहिं साथ ॥ २६ ॥
सबही मिल कहने लगे, हम तेरे अब नाहिं।
पाप पुण्य जो कुछ किया, सोही संगहि जाहिं ॥ २७ ॥
चौपाई ॥
जगत ठाठ जब ऐसे कहैं । तब प्रानी हकधक हो रहैं ॥
जबही मुंडी धुनने लागे । कहै माहिं क्यों इनके पागे ॥
हाय हाय मैं कछु नहिं कीया । राम भगति में मन नहिं दीया ॥
जिन कारन बहु पाप कमाये । सो मेरे अब काम न आये ॥
साध संग के माहिं न मिलिया । दया धर्मकी राह न चलिया ॥
भला कर्म सबही बिसराया । खोटे कर्मन सूं चितलाय ॥
सोच सोच सब और निहारैं । कोई न संगी हुआ हमारैं ॥
यों प्रानी पछतावा करै । जममारै लै आगे धरै ॥
चरणदास कहैं कछु न बसावै । ऐसे बांधा जमपुर जाव ॥२८॥
दोहा ॥
पकड़ बांध जम ले चलैं, गल में डार जंजीर ।
पापी जीवन दुख सहित, देत घनी ही पीर ॥ २६ ॥
जो जीहै पुण्यात्मा, सोवै सुखसूँ जाहिं ।
तिनकूं गण ले जात हैं, जम नहिं छूवैं छाहि ॥ ३० ॥
चौपाई ॥
दो हजार जोजन मगमाहीं । सहजरूप दुख सुख
६०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लोहे कीसी कीलें पैनी । चुभचुभ जाय महादुख दैनी ॥
वह पैंडा है अति दुखदाई । जाहिं कष्ट सूं लोग लुगाई ॥
अरु धरमी जी सुख सूं जावैं । दिये दान सब आगै आवैं ॥
रथ चंडोल पालकी म्याना । हाथी घोड़े और विमाना ॥
ऐसी विध के बाहन आवैं । उन ऊपर चढ़ि बाट लंघावैं ॥
चरणदास कहैं जो ह्यां देवैं । जाका बदला आगे लेवैं ॥३१॥
दोहा ॥
जोजन दोय हजारही, पैंडा बालू रेत ।
दान जिन्हों पनहीं करी, सो-लंघि हैं सुख सेत ॥३२॥
आगै बारह सहसही, जोजन खांडे धार ।
महाविषम वह बाट है, पाप पुण्यही लार ॥३३॥
घोड़े के या बैलके, रथ देवे जो कोय ।
वह पैंडा सुख सूं लंघै, ताकूँ दुख नहिं होय ॥३४॥
चौपाई ॥
वाके आगे जलही आवै । रुकरहा भरा थाह नहीं पाव ॥
चहूँ ओर डरही डर लागै । आठ सहस्र जोजन वह जागै ॥
भूमिदान जिन दीया होई । सुखसूँ जाय पार हो सोई ॥
ऊंचा दान किया फल लावै । पगसूं धरती लगती जावै ॥
जलसूँ उतर चलै जो आगै । राह अँधेरी डर बहु लागै ॥
तीस सहस जोजन मगजानौ । तामें कष्ट अधिक पहचानौ ॥
बिजली चमक गरज बहुमानो । परलयकीसी निश्चित आनौ ॥
दानकिये दीवे तहां आवैं । सो प्रानी चांदिन में जावैं ॥
पचभीषम तुलसी के ठांईं । कै ठाकुरद्वारे के माहीं ॥
कै सतगुर के भवन मँझारै । बाटमाहिं कै दीपक जारै ॥
ब्राह्मण कै घर कै धर्मशाला । तीरथ पर कै दीवा बाला ॥३५॥