भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 638, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ५६५
दोहा ॥
एक पांव बाजे खड़े, बाजे ऊरध बाहु ।
बाजे मौन गहे रहें, ऊंचे फल की चाहु ॥ ५ ॥
बाजे नगन शरीर हैं, बाजे करें जु होम ।
बाजे साधैं जोगही, लखिकै उत्तम भौम ॥ ६ ॥
कोइ चन्द्रायण बर्त कर, रहे जु तपके माहिं ।
कोई इक सूखे पात जो, तरवर ही के खाहिं ॥ ७ ॥
ऐसे ऐसे ऋषि सबै, नासकेत ढिग आय ।
पूछन की इच्छा सहित, दरशन ही के चाय ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
सबही मुन मिलबे कूं धाये । नासकेत उठ शीश निवाये ॥
मिलकर बैठे आश्रम माहीं । नासकेत सूं पूछत जाई ॥
जो जो अपनी आंखों देखा । सो सो हमसों कहो बसेखा ॥
जो तुम देख जमपुरी आये । समाचार ज्यों ह्वां के लाये ॥६॥
ऋषिउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे ऋषि पूछत भए, नासकेत सूं बात ।
ह्वां का सब विस्तारही, कहिये हमरे साथ ॥ १० ॥
ह्वांके मनुष्यन की कहौ, क्रोधवन्त कै शान्त ।
कडुवे कै मीठे वचन, ज्ञानवन्त कै भ्रान्त ॥ ११ ॥
चौपाई ॥
कैसा पाप पुण्य का भेदा । कैसा जीवन कूं ह्वां खेदा ॥
कैसा नरक स्वरग का बासा । कहा कहा ह्वां जमकी त्रासा ॥
ह्वां का सबही करौ बखाना । एकदिना हमहूं कूं जाना ॥
सुखी होन की चाल बताओ । धरम करम हमकूं समझावो ॥