भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
नासकेतलीलावर्णन । ५६३
मूयें किरिया को करै, अगत जाय हो भूत ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
वेद माहिं ऐसे लिख राखा । ब्रह्माजूने परगट भाखा ॥
याकूं समझ जतन अब कीजे । उपजावन पुत्तर मन लीजे ॥
ब्राह्मण श्रेष्ठ तोहि मैं जानौं । मेरे बचन सांच करि मानौं ॥
उद्दालकउवाच ॥
मुनि उद्दालक ऐसे कहिया । ब्यासी सहसबरस तप रहिया ॥
रहूं अस्थिर मन में नहिं आवे। तिरिया पुत्तर को उपजावे ॥
हे पिप्पलादिक चितना धरूं । तिरिया का संग कैसे करूं ॥
नेम बर्तकों कैसे हारूं । भवसागर में मन क्यों डारूं ॥
नरकमाहि वेही नर जावें । टेक बर्त कूं जो विसरावें ॥ ३३ ॥
दोहा ॥
जिन छोड़ा है नेम कों, खोया तप का मूल ।
छोड़ छोड़ फिर जग लिया, ताके मूंहडे धूल ॥ ३४ ॥
चौपाई ॥
लिखा वेद में नरकों जैहै । दुनिया तज दुनिया फिर लैहै ॥
कई भांत के दुख उठि लागैं। आवत हैं वाही कै आगैं ॥
हो अतीत फिर घर में आवैं । तीन लोक में भरमत धावैं ॥
मुकति ठिकाना वाकूं नाहीं । जाय परै चौरासी माहीं ॥
नारी सुत कछु काम न आवैं । अंत समय ह्यांई रह जावैं ॥
कोई किसी का संगी नाहीं । मारगमें मिल मिल उठजाई ॥
तातें जग कूं मिथ्या देखा । सुत नारी का झूठा लेखा ॥
यातें करूं न मन में आवे । धोखे में अब को भरमावे ॥ ३५ ॥
दोहा ॥
मैंने तप धारन किया, कैसे छांडूं ताहि ।
५६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हांसी होवे जगत मैं, अपकीरति हो जाहि ॥ ३६॥
पिप्पलादकउवाच ॥
चौपाई ॥
फिर पिप्पलाद जु बोला ऐसैं। आप स्वारथी भाषै जैसैं ॥
हे उदालक यह सुन लीजे। जुक्ति अजुक्ति बिचारही कीजे ॥
जो कोइ संतति सूं है हीना। वाका धर्म सदा है छीना ॥
अरु जिनकी तपसूं रुचि नासी । सो वे भिष्टल नरक निवासी ॥
हम तेरा तप नाहिं छुटावैं। बलकी उलटा धर्म बढ़ावैं ॥
सुत उपजावन ही के हेता। नारी संग करै जो जेता ॥
इन्द्री स्वाद सदा नहिं धावै । रितु के समय दान दे आवै ॥
वाकूं पाप दोष नहिं लागै । ब्रह्माबचन जु भाष आगै ॥ ३७॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कहि पिप्पलाद मुनि, गए ब्रह्मा के पास ।
सभी सुनाई जो हुती, वाकी सभै सुबास ॥ ३८ ॥
ब्रह्मा की अज्ञा लई, और किया परनाम ।
रिषी गए अस्थान कूं, पूरन करि के काम ॥ ३९ ॥
हे राजा ऐसे भई, उदालक तप माहिं ।
विघ्न हुवो चिंता लगी, हिरदै तिरिया छाहिं॥ ४० ॥
दुखी रहै सोचत रहै, नित यों करै विचार ।
को कन्या कितसो लहूं, अरु जाऊं किस द्वार ॥ ४१ ॥
चौपाई ॥
इस कारन ब्रह्मा पै जाऊं। यह सब अपनी बात सुनाऊं ॥
मो भागन सुत है अकि नाहीं । ऐसे पूछूं जाय गुसाईं ॥
चल्यो चल्यो ब्रह्मापै आयो। हाथ जोर के शीश नवायो ॥
ब्रह्मा बहुतक आदर कीनो। बैठन कारन आयसु दीनो ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६५
कहो ऋषीश्वर कैसें आये । कौन अर्थ कारज क्यौं लाये ॥
इन्द्रीजीत अरु तुम निरवासी । कैसे आये हमरे पासी ॥
कहै उद्दालक सुनहो नाथा । पूछूँ बात नवाऊं माथा ॥
यह परसँग पूछन कौं आयो । मेरे संतति लिखी बतावो ॥४२॥
ब्रह्मोवाच ॥
दोहा ॥
तब ब्रह्मा भाषत भये, सुनहो यही बिचार ।
तेरे पुत्तर होयगा, वंश बढ़ावन हार ॥ ४३ ॥
बचन हमारा सांच हो, हिरदै राख निहार ।
पहिले पुत्तर आय है, ताके पीछे नार ॥ ४४ ॥
सोई सुता रघुवंश की, पतिबर्ता धर्म रूप ।
गोत बढ़ावन हारही, सुन्दर अधिक अनूप ॥ ४५ ॥
हे ब्राह्मण अब जाइए, अपने आश्रम माहिं ।
परजापति करतार मैं, तू चिंता कर नाहिं ॥ ४६ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
रिषीने कही जोर कर दोई । नारी बिना पुत्तर कस होई ॥
ऐसी कहीं भई विपरीता । पाछे नारी पहिले पूता ॥
मिथ्या वचन करी तुम हांसी । मैं सकुचा मन भया उदासी ॥
उद्दालक के वचन सुने जब । विधि ह्वां अन्तर ध्यान भये तब ॥
गया देख ब्रह्मा को हाईं । रिषी आया अस्थलके माहीं ॥
अपने मनमें ऐसे ताकी । ब्रह्मा हम सूं झूठी भाषी ॥
कौन भांति बनिहै यह बाता । पहिले पुत्तर पाछे बनिता ॥
सोच सोच भया अधिक उदासा। उद्दालक कहैं चरणहीदासा ॥४७॥
इति श्रीनासकेतउपाख्याने श्रीरणजीतगुसांईजीकृत
उद्दालकचिंतावर्णनोनाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
५६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन यों कही, हे राजा बड़भाग ।
जानत हो सब शास्त्र, भक्ति बिषै अनुराग ॥ १ ॥
वह ब्राह्मण अभिलाष सुत, फिर लागा तपध्यान ।
परम पुरुष का धांवना, हिरदै माहीं थान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
नारी की मन आशा रहै । काहू से मन की नहीं कहै ॥
रात दिना चिन्ता मन माहीं । छिन इक तिरिया भूलत नाहीं ॥
सब तन काम जगै दुखदाई । जैसे सूता सिंह जगाई ॥
उसी वासना बीज खिसाहा । होनहार की यही दिसाही ॥
वह बीरज कर माहीं लीन्हा । कंवल फूल माहिं धर दीन्हा ॥
मुंद गया कुशामांहि लिपटाया । फिर वह गंगा बीच बहाया ॥
ब्रह्मा जू की आज्ञा दया । तैरा कंवल जू बहता भया ॥
आगे सुनों कहैं रणजीता । जैसे कारज भया पुनीता ॥३॥
दोहा ॥
नग्गर एक सुहावना, गंगा निकट सुथान ।
राजा रघु हां का धनी, तेजवंत ज्यों भान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
सतजुग बीत जु त्रेता लागा । तब राजारघु भया सुभागा ॥
कुल में पूरा धर्म उजागर । दयावंत अरु किरपा सागर ॥
जाकी परजा सब सुख पावै । नितही समां काल नहिं आवै ॥
धनवन्ते सुन्दर नर लोई । बड़ी उमर के रोग न कोई ॥
राजा जितका रघु सतवादी । निहकंटक निरभय जिंहगादी ॥
सूर बीर दाता सुखदाई । जाकी जग में बहुत बड़ाई ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६७
चंद्रवती थी पुत्री ताकी । धुर सूं कथा कहूं मैं वाकी ॥
जन रणजीत कहैं सुन लीजै । सबही श्रोता ह्यां चित दीजै ॥५॥
दोहा ॥
सुंदर मंदर सोहना, दिपत विराज हुलास ।
चूने लीपा सेतही, जित कन्या का बास ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रंग महल जहां चित्तर कारी । ऊंचा महल झरोखे बारी ॥
महा सुन्दरी कंचनबरनी । सुघड़ चतुर देखत मनहरनी ॥
नख शिख ज्यों विधि आप सँवारी । गुनवंती अरु रूप उज्यारी ॥
दिवियों विषे न कन्या ऐसी । गंधर्वयों विषे न कहिये जैसी ॥
आसुरी बिषे जु देखी नाहीं । ना कहिये तिरलोकी माहीं ॥
वैसा रूप न हुआ न होगा । वा कन्या कै जोगन जोगा ॥
बड़ी अप्सरा चार पिछानों । रंभा और उरवसी मानों ॥
और तिलोतमा तीजी नारी । और मैनका चौथी प्यारी ॥७॥
दोहा ॥
ये जो चारों अप्सरा, स्वर्गही मांहि अनूप ।
उनसैं भी बहुतै सरस, वा कन्या का रूप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
दस हजार जो कन्या ओरी । वाके पास रहें करजोरी ॥
सो वह कन्या सखियों साथी । परन बांधि गंगा नितन्हाती ॥
न्हाय सदाही भोजन करती । सखियों सहित सुखी जोरहती ॥
एक दिना ऐसी गति भई । चढ़ि सुखपाल गंग कूं गई ॥
भांत भांत के भूषन साजैं । मुतियन के गलहार बिराजैं ॥
आगे पीछे दहिने बावैं । चढ़ि तुरंगन कन्या जावैं ॥
कोइ कोइ धुजा चंवर कर धारैं । बस्तर भूषण रूप सँवारैं ॥६॥
३८
५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन यों कही, हे राजा बड़भाग ।
जानत होसब शास्त्र, भक्ति बिषै अनुराग ॥ १ ॥
वह ब्राह्मण अभिलाष सुत, फिर लागा तपध्यान ।
परम पुरुष का धांवना, हिरदै माहीं थान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
नारी की मन आशा रहै। काहू से मन की नहीं कहै ॥
रात दिना चिन्ता मन माहीं। छिन इक तिरिया भूलत नाहीं ॥
सब तन काम जगै दुखदाई। जैसे सूता सिंह जगाई ॥
उसी वासना बीज खिसाहा। होनहार की यही दिसाही ॥
वह बीरज कर माहीं लीन्हा। कंवल फूल माहिं धर दीन्हा ॥
मुंद गया कुशामांहिं लिपटाय। फिर वह गंगा बीच बहाया ॥
ब्रह्मा जू की आज्ञा दया। तैश कंवल जू बहता भया ॥
आगे सुनों कहैं रणजीता। जैसे कारज भया पुनीता ॥३॥
दोहा ॥
नग्गर एक सुहावना, गंगा निकट सुथान ।
राजा रघु ह्वां का धनी, तेजवंत ज्यों भान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
सतजुग बीत जु त्रेता लागा । तब राजारघु भया सुभागा ॥
कुल में पूरा धर्म उजागर । दयावंत अरु किरपा सागर ॥
जाकी परजा सब सुख पावै । नितही समां काल नहिं आवै ॥
धनवन्ते सुन्दर नर लोई । बड़ी उमर के रोग न कोई ॥
राजा जितका रघु सतवादी । निहकंटक निरभय जिंहगादी ॥
सूर बीर दाता सुखदाई । जाकी जग में बहुत बड़ाई ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६७
चंद्रवती थी पुत्री ताकी । धुर सूं कथा कहूं मैं वाकी ॥
जन रणजीत कहैं सुन लीजै । सबही श्रोता ह्यां चित दीजै ॥५॥
दोहा ॥
सुंदर मंदर सोहना, दिपत विराज हुलास ।
चूने लीपा सेतही, जित कन्या का बास ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रंग महल जहां चित्तर कारी । ऊंचा महल झरोखे बारी ॥
महा सुन्दरी कंचनबरनी । सुघड़ चतुर देखत मनहरनी ॥
नख शिख ज्यों विधि आप सँवारी। गुनवंती अरु रूप उज्यारी ॥
दिवियों विषे न कन्या ऐसी । गंधर्व्यों विषे न कहिये जैसी ॥
आसुरी विषे जु देखी नाहीं । ना कहिये तिरलोकी माहीं ॥
वैसा रूप न हुआ न होगा । वा कन्या कै जोगन जोगा ॥
बड़ी अप्सरा चार पिछानों । रंभा और उरवसी मानों ॥
और तिलोत्तमा तीजी नारी । और मैनका चौथी प्यारी ॥७॥
दोहा ॥
ये जो चारों अप्सरा, स्वर्गही मांहि अनूप ।
उनसैं भी बहुतै सरस, वा कन्या का रूप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
दस हजार जो कन्या ओरी । वाके पास रहैं करजोरी ॥
सो वह कन्या सखियों साथी । परन बांधि गंगा नितन्हाती ॥
न्हाय सदाही भोजन करती । सखियों सहित सुखी जोरहती ॥
एक दिना ऐसी गति भई । चढ़ि सुखपाल गंग कूं गई ॥
भांत भांत के भूषन साजैं । मुतियन के गलहार बिराजैं ॥
आगे पीछे दहिने बावैं । चढ़ि तुरंगन कन्या जावैं ॥
कोइ कोइ भुजा चंवर कर धारैं । बस्तर भूषण रूप सँवारैं ॥९॥
३८
५६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
बाजे बहुतक संग बजत, अरु गावत ही गीत ।
नंगार सैनिक सी चली, ज्यों थी नितकी रीत ॥१०॥
चौपाई ॥
जा पहुंची गंगा तट ठांहीं। क्रीड़ा करन लगी जलमाहीं ॥
ब्रह्मचारन शुभ लक्षण धारी। रूप प्रकाश रही है भारी ॥
गंगा जी में ठाढ़ी भई । उसी पद्म कूं देखत भई ॥
दिव्य सुगंध जु तैरत जावे । सूरज चंद किरन सरमावे ॥
नर क्या छूयसकै सो वाकों। कंवल जु तेजवंत है ताकों ॥
कन्या देख अचंभै रही। निज सखियन सों ऐसे कही ॥
इसी फूल के निकटै जावो । पकड़ हाथ सूं मोपै लावो ॥
अज्ञा सूं कन्या गहि ल्याई। चन्द्रवती लीनों हरषाई ॥११॥
दोहा ॥
कुशा माहिं सूं खोलकर, सूंघा नाक लगाय ।
उसमें जो बीरज हुता, पैठा नाभ मंझाय ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
सखियों सहित नहाय कर आई। जानी ना हरिकी चतुराई ॥
पहल महीने फूलन आये । दूजे मांस अंग पलटाये ॥
मांस तीसरे मोटी काया। चौथे उदर बड़ा होय आया ॥
पंचवें रोम पलट जो गए । अस्थन कछू श्याम जो भए ॥
छठै सातवैं ऐसा भया । पेट जो बड़ा बहुत हो गया ॥
कन्या उदर देख भई बौरी । तेज भ्रिष्टभया गति मति औरी॥
सकल विकल मन व्याकुल नैना। शोक सिंधुमें परी अचैना ॥
धीरज तजकै रोवन लागी। चरनदास कहैं दुखमें पागी ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६६
दोहा ॥
निज कन्या पूछन लगी, हे शुभ क्यों रोवंत ।
सुख दीन्हे करतारने, दुख कहु क्यों होवंत ॥ १४ ॥
हमें बतावो बेगही, तन मनमें उकलन्त ।
तुम कूं रोवत देखके, हमकूं कष्ट अत्यन्त ॥ १५ ॥
सखियों के सुन बचन ही, रोवत उत्तर दीन ।
कहूं अचम्भे की सभी, अचरज ही कूं चीन ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
मैं कुलमाहिं अकीरतवारी । भई सुनौरी सखी पियारी ॥
अरु दूषन रघुवंश मँझारी । अदिष्टगर्भमोहिभयो विकारी ॥
मैं नहीं जानूं क्या हो गया । भारी दुख हिये माहीं छया ॥
अरु देखो रघु महलों माहीं । देवत आय सकै कोइ नाहीं ॥
गंध्रव असुर न आवन पावै । मनुषों की तो कौन चलावै ॥
वड़ा अचंभा भारी भय है । तीन लोक में हुई न है है ॥
सुनिकै सखी सबै मुरझानी । पीरे बदन भई सब स्यानी ॥
मींढनलगी जू करसूं करही । इकदांतोंबिचअंगुलीधरही॥१७॥
दोहा ॥
व्याकुल होकै तुरत ही, गई रानी के पास ।
हाथ जोड़ ठाढ़ी भई, होकर बहुत उदास ॥ १८ ॥
और कही जी दान द्यो, तो हम कहैं सुनाय ।
अचरज कीसी बात हीं, कहतें जीव डराय ॥ १६ ॥
रानीउवाच ॥
चौपाई ॥
रघुरानी कही कन्या जानौ । अभैदान दियो निहचै मानौ ॥
जथा जोग कहु कन्या अबही । कछु मत राखो भाखो सबही ॥
जब कन्या ऐसे करि बोली । कहिनांह सकै कहा कहैं खोली ॥
५७० - श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम खड़ेहों सब तन कांपै । अचरज बात कहा कहूं तापै ॥
चन्द्रवती के महलों माहीं। गंध्रबदेवत सकै न आई ॥
मानुष की तो साम्रथ क्या है। उन महलों में आया चाहै ॥
ऐसी ठोर अचंभा भया। तुम्हरी कन्या कों गर्भ रहा ॥
जब कन्याओं ऐसे कही। रानीसुनदुखिया बहु भई ॥२०॥
दोहा ॥
व्याकुल हो धरनी गिरी, रही न कछु संभार ।
शोकमाहिं पीड़ित भई, रघुराजा की नार ॥ २१ ॥
चौपाई ॥
उन कन्याओं ताहि उठाया। धीरज दे ताकूं बैठाया ॥
रानी कन्या रुक़सत कीनौ । आप गवन राजा मन दीनौ ॥
जा राजा पै बचन उचारे । सकल शास्त्रके जानन वारे ॥
स्वामी अभैदान जो पाऊं। तौ अचरज की बात सुनाऊं ॥
राजोवाच ॥
राजाकही अभै तुम पावो। यथा योग्य सब बात सुनावो ॥
भूप बचन सुन रानी बोली। डरप सकुचती मुखसों खोली ॥
रानीउवाच ॥
कन्या तुम्हरी दूषित जानौ । चन्द्रावती ऐसे पहिचानौ ॥
जाके गर्भ अदिष्ट भया है। मोपै कछून जात कहाहै॥२२॥
दोहा ॥
क्रोधवन्त राजा भया, सुन रानी के बैन ।
और कही उन क्या कियो, रक्त बरन भये नैन ॥ २३ ॥
चौपाई ॥
राजा सेवक लिए बुलाई। क्रोधवन्त हो बात सुनाई ॥
वा कन्या कों ले तुम जावो। जंगल माहिं छोड़ि कै आवो ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५७१
सुनकर सेवक आयसु लीनों । बनोबास कन्याकूं दीनों ॥
भयानक जंगल अधिक उदासा । व्याघ्र सिंघान का जहां बासा ॥
दसों दिशा तक व्याकुल भारी । कहैकि विधिक्या विपता डारी ॥
यों अधीर हो रही कुंवारी । ज्यों हिरनी संग सूं भईन्यारी ॥
कहै रनजीत हिये के माहीं । ऐसी दुखी कहसकूं नाहीं ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रवतीकन्यात्यागोनाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कन्या दुखित थी, इतने ही के माहिं ।
फिरता आया एक ऋषि, करी दया की छांहिं ॥ १ ॥
चौपाई ॥
सच धर्म में था वह पूरा । तप के मांहीं अधिकी सूरा ॥
हुता जु श्रेष्ठ मुनियों के माहीं । लैन फूल फल आया व्हांहीं ॥
उलटा जब आश्रम कूं चाला । लिये फूल फल कुशा कृपाला ॥
रोवत कन्या दिष्ट निहारी । चक्रित भया कौन यह बारी ॥
जाग्यवलक चिंता करि देखा । मनमें किए विचार अनेका ॥
यह दमयन्ती कै घिरताची । कै रंभा है सुन्दर आछी ॥
कै तिलोत्तमा चित्तरलेखा । कै इन्द्राणी है जु मैनिका ॥
देव सुता कै राज कुमारी । ऐसैं सोचकियो ऋषिभारी ॥२॥
दोहा ॥
छबि गुण रूप अधिक तहां, ससिवदनी अधिकाय ।
अंग अंग सुन्दर सबै, शोभा कही न जाय ॥३॥
सुन्दर कन्या देख कर, अचरज -मन में लाय ।
जाग्यवलक पूछत - भये, ऐसे वचन सुनाय ॥४॥
५७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
हे कन्या तू कित सूं आई। है तू कौन पिता को माई ॥
कौन काज जंगल के माहीं। आप अकेली संग कोई नाहीं ॥
सिंघ जरक भेढ़ा इहि ठाईं। सो तोकूं भक्षन करि जाईं ॥
फिर कन्या वह ऐसे बोली। अपनी बिपता कही सबखोली ॥
हे ब्राह्मण क्या पूछै मेरी। मैं कुल बैरन दुखी घनेरी ॥
राजा रघु की मैं हूं बेटी। पिछले पापन मोहिं लपेटी ॥
बिन जानैं भयो गरभ दुखारी। पिता मोहिं निरजल बनडारी ॥
शोकवान सों आतुर भारी। दुखमें पीडत हिये मझारी ॥५॥
दोहा ॥
यों कन्या के बचन सुन, दुखी भयो ऋषिराय ।
सब अंगन संतप्त हो, बोला फिर दुहराय ॥ ६ ॥
ऋषिरुवाच ॥
हे देवी तू धर्मकी, बेटी मैं करी आज ।
मेरै आश्रम के बिषे, चल के सदा विराज ॥ ७ ॥
परमेश्वर हित सेवहीं, तहां करूं चितलाय ।
कंद साग फल लायकै, आगे धरूं बनाय ॥ ८ ॥
जब प्रसन्न होय संग भई, आई आश्रम माहिं ।
चरणदास कहैं रहने लगी, कोई अँदेसो नाहिं ॥ ६ ॥
बहुत दिना रहते हुए, गरभ भयो दसमास ।
जब उकताई देहसों, दुख मानौं बहु तास ॥१०॥
जब जान्यों परसूत का, समां जु पहुंचा आय ।
भवन बिसारो सकुच सों, पहुंची बन में जाय ॥११॥
चौपाई ॥
गंगा जी पुनी हांई बिराजै । निर्मल जल शुध अधिकी राजै ॥
: नासकेतलीलावर्णन । ५७३
नमस्कार जाकर उन कीनों । सरन लई चित नीकें दीनों ॥
पार ब्रह्म कूं लिया संभारी । अरु कही तुमपर जाऊं वारी ॥
फिर सूरज कूं नीकै धाया । जग पांलन तुम दिनके राया ॥
अरुकही विष्णु जगत के स्वामी । घट घट के तुम अंतरजामी ॥
महादेव अरु गौरा माई । सभी देव मम करो सहाई ॥
जो मैं शुद्ध वंश में उपजी । हूं मैं शुद्ध शुद्धही शुभजी ॥
रघु मम पिता मात सतवंती । उनकी पुत्री मैं कुलवंती ॥१२॥
दोहा ॥
जो मेरी या देह में, पाप नहीं है मूर ।
तो जैसे गर्भ रहा है, उस मारग हो दूर ॥ १३ ॥
अहो विधाता जगतपति, यही अरज सुन लेह ।
मेरा वचन जु सांच है, तोसिताब सुख देह ॥ १४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
कन्या की करुना सुनी, जगजीवन करतार ।
तबै गर्भ वह उदर सों, आया कंठ मझार ॥ १५ ॥
कंठ सूं आया सीस में, छींक भई तिह बार ।
तबहीं निकसा बाहरे, नासाही के द्वार ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
आई छींक सभी दुख टारे । बालक जनम्यों नासा द्वारे ॥
तातैं नासकेत भया नाऊं । द्योस घड़ी धन धन वह ठाऊं ॥
भूमि परतही बालक बोला । अपना भेद सभी तिन खोला ॥
हे माता सतवंती धरमी । मन में धीरज रख सुख करमी ॥
नासकेत मम नाम बखानौं । जोग सिद्ध मैं पूरन जानौं ॥
विधि के बचन जु पूरे भये । उद्दालक सूं आगे कहे ॥
ब्रह्मा का सुत है उद्दालक । ताही का जो मैं हूं बालक ॥
५७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
उपजा वाके बीरज सेती। कही सांच मानियो जेती॥
बालक बचन सुने जब माई। वह बहुती अचरज में आई॥१७॥
दोहा॥
जबै मोह बश होय कै, गोदी लिया उठाय।
फिर मुख में अस्तन दियो, खुशी भई अधिकाय ॥ १८॥
चौपाई॥
बालक शोभा कहा बखानूं। रूपवंत अरु धुर सूं ज्ञानूं॥
ऋषि के आश्रमही के माहीं। पालन लगी जिसी के ताईं ॥
लज्या दुख लियें रहै सुभागा। इकदिन बालक रोवनलागा॥
थांभा थमै न क्योंही कैसे। कीया क्रोध सुभांगी जैसे॥
हे पुत्तर रोवत क्यों भारी। तोही कारन बनमें डारी॥
वैशंपायनउवाच ॥
हूवा था जब एक बरस का। रूपवंत गुणवंत सरस का॥
क्रोध सहित माता मन आई। वहीं पिटारी एक बनाई॥
तामें बालक कूं पौढ़ाया। कुशाघासतापै लिपटाया॥१६॥
[दोहा॥
गही पिटारी आयकर, गंगा दिया बहाय।
तब कन्या उस पुत्रकूं, ऐसे कहा सुनाय॥२०॥
चौपाई॥
कौन गरभ का मैं नहीं जानूं। तेरे पिताकूं मैं न पिछानूं॥
जाके बीरज भया उपाधू। ताही के ढिग बहकर जातू॥
जब बालक वह बहता चला। आगे सुन होतबकी कला॥
बालक आया बहते बहते। जहां ऋषेश्वर बहुतक रहते॥
उद्दालक रहता था हांही। तेजवन्त तपसी अधिकाई॥
लखी पिटारी आवत सबही। पर लीनी उद्दालक तबेही॥
नासकेतलीलावर्णन । ५७५
लाकर राखी अपने ठांहीं । आप लगा शुभ कर्मों माहीं ॥
वेद करम सबही करि लीन्हें । पित्तरकारज भी सबकीन्हें॥२१॥
दोहा ॥
शुभकर्मों से छूटकर, खोला फेर पिटार ।
जो देखे तो पुरुष इक, सुन्दर अधिक अपार ॥२२॥
चौपाई ॥
गुणवन्ता अरु लक्षण धारी । ध्यान जोगमें था बलकारी ॥
उस बालक कों ऐसे लहिया । ज्ञानवान ऋषि जब यों कहिया ॥
हे बालक अब बसतू यहाँही । मेरे सुन्दर आश्रम माहीं ॥
ऐसे कहि राखा धर्मशाला । लागा बहुर करन प्रतिपाला ॥२३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने पितापुत्रसंयोगोनाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
एकदिना वाकी महतारी । गया क्रोध जब बात विचारी ॥
जिंह कारन बहुते दुखपाया । सो बालक मैं गंग बहाया ॥
सोच सोच मन में पछताई । गंगाकूल ढूंढ़ने धाई ॥
व्याकुल भई रोवती चाली । अपनी बुध कूं देती गाली ॥
चलती चलती पहुंची तहाँ । उद्दालक रहता था जहाँ ॥
तहाँ अपना बालकही पाया । भरिकै अंकौं गले लगाया ॥१॥
दोहा ॥
देख बहुत प्रसन्न हो, कही द्योस धन आज ।
ढूँढ़न कूं निकसी हुती, सो भए पूरन काज ॥ २ ॥
चौपाई ॥
यों कहि फिर बैठी वह बाला । बालकलियनलगो जज्ञसाला ॥
कन्या कही लीप कहा करिहो । को कारज या ऊपर सरिहो ॥
५७६ : श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेतउवाच ॥
जब बालक कही पिता हमारे । आज्ञा दे वन ओर सिधारे ॥
तातें लीपतहूं जज्ञसाला । आय करें जज्ञ वै मधकाला ॥
मातोवाच ॥
कन्या कही पुत्र तुम मेरे । ला मैं लींपूं बदले तेरे ॥
जब बालक लीपन नहिं कीन्हा । सकल सौंज माता कर दीन्हा ॥
चित्त दे लीपा सुन्दर बाला । और दिना सूं नीकी शाला ॥
चरणदास कहै फुल्लित भई । गंगा न्हान करन कूं गई ॥३॥
दोहा ॥
तब उद्दालक आइया, बनते अपनी ठाहिं ।
बालक सों धन धन कहा, खुशी भये मन माहिं ॥ ४ ॥
उद्दालकउवाच ॥
पुत्तर झाडू भलीदे, लीपन किया बनाय ।
अगन होत्रका मंडही, नई भांति दरसाय ॥ ४ ॥
बहुत खुशी तौपै भया, सुन्दर मन्दिर देख ।
ऐसा लीपाना कभी, जैसा आज बसेख ॥ ६ ॥
नासकेतउवाच ॥
पिता सुनौ लीपन करम, मैं नहिं कीया आज ।
मेरी माता आइया, जिन यह कीया काज ॥ ७ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर तेरी जो माई । कारज करिके कितकूं धाई ॥
नासकेत सुनि ऐसे कही । गंगा ओर न्हान कूं गई ॥
सुन यह बचन खुशी ऋषि भयऊ । बहुरूं अगन होत्र चित्तदियऊ॥
करि करि करमजु बोलत भया । पुत्तर का कर कर मैं लिया ॥
फिर वासुं कही गंगा जावो । अपनी माता कूं ले आवो ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५७७
आदर करके परसन करूं । पुष्पमूल ले आगे धरूं ॥
बचन पिता के सुनि वहां गया । हाथ जोरि मातासों कहा ॥
नासकेतउवाच ॥
हे माता चल आश्रम माहीं । जहां मम पिता बसोतुमहाहीं ॥
कंद साग नीकै करि पावो । ऐसे सुख सूं द्योस बितावो ॥
माताउवाच ॥
सुनि चन्द्रावती कहा बिचारा । क्यों सुतबचन अजोग उचारा ॥
सुनि करि रोम उठै तन सारे । बिना धर्म का वचन कहारे ॥
आगे भी किन्हीं यह जसलीया । माता दान पुत्र ने कीया ॥८॥
दोहा ॥
जग में ऐसी रीत है, पिता करै जो दान ।
कै कन्या का भ्रातही, कै मामूं परवान ॥६॥
नासकेत चुपका भया, मन माहीं सकुचाय ।
उठ आया ऋषिपासही, सबही दिया सुनाय ॥१०॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उन आछी भाखी । धर्मशास्त्र में योंही राखी ॥
कहो उदालक फिर ह्वां जइए । मेरे मुखसों ऐसे कहिए ॥
कौन वंश में जन्म तुम्हारा । कैसे उपजन भया हमारा ॥
कौन काजकों तुम यहां आई । यह सब बातें पूछो जाई ॥
बचन पिता के सुन वह धाया । माता कूं जा शीश नवाया ॥
नासकेतउवाच ॥
फेर कही सुन मेरी माता । पूछन कूं पठयो मम ताता ॥
काकी धीको पिता तुम्हारो । कैसे तुम्हरे जन्म हमारो ॥
इहां आवन को कारन को है । सतसत कहू ज्योंकरि जो है ॥
५७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
माताउवाच ॥
दोहा ॥
चंद्रवती यों बोलिया, सुन पुत्तर परवीन ।
जो तू पूछत है मुझे, मैं कहूं चित दे चीन्ह ॥ १२॥
परालबध के जोग तें, करम भया जो जान ।
सो मैं तोसों कहत हूं, साखी इक भगवान ॥ १३ ॥
सूरज ही के वंश में, रघु राजा परसिद्ध ।
मैं हूं बेटी तासु की, शुभ करनी सब सिद्ध ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
चूने लीपे मंदर माहीं । रहती हुती सीक कछु नाहीं ॥
दसहजार कन्या ढिग रहतीं । भांति भांनि मम सेवा करनीं ॥
एक समै मैं गंगा गई। जहां जाय कै न्हाती भई ॥
लिपटा कुशा कमल इक आया । पकड़ा खोला नाक लगाया ॥
वामें बीरज मैं नहिं जाना । नाक छेद हो उदर समाना ॥
वासों मोकूं गरभ रहा था। सखियों लखि मम मात कहा था ॥
फिर रानी राजासों कह्यो । पिता बनोबास मोहि दियो ॥
रोवन लगी बहुत दुख पाया । वहां ही एक तपस्वी आया ॥१५॥
दोहा ॥
बेटी कर धीरज दिया, लें गया आश्रम माहिं ।
ह्वां सुखसों रहने लगी, सोच रहा कछु नाहिं ॥१६॥
चौपाई ॥
हे पुत्तर उपजा तू ह्वाहीँ । नासा के मध जन्म्यों आई ॥
तातें नासकेत धरयो नाऊँ । पलने लगे बहुर वह ठाऊँ ॥
बरस दिनाके हो सुख पागे । घुटनौं पैरौं चलने लागे ॥
इक दिन रुदन किया तुम भारा । मैं किरोध करि गंगा डारा ॥१७॥
नासकेतलीलावर्णन । ५७६
दोहा ॥
तभी रोस मोहि आइया, लीन्ही तुला बनाय ।
तामें तोहि सुलायकै, दीन्हों गंग बहाय ॥१८॥
चौपाई ॥
चार बरस पीछे सुध आई । बड़ी भई जब मैं पछताई ॥
जिह कारन बन लिया बसेरा । सुख छुटकै दुख हुवा घनेरा ॥
उपजा मोह क्रोध सब भागा । मन में तू बहु प्यारा लागा ॥
कलप कलप जिय रहा न जाई । तब उठ ढूंढनही कों धाई ॥
ढूंढत ढूंढत अब तोहिं पाया । आंखसुखी हुई हिया सिराया ॥
सुनरे पुत्तर यह मम बाता । जाय कहो तुम अपने ताता ॥
नासहीकेत उलट जब आया । पिताकूं सबही भेद सुनाया ॥१९॥
वैशंपायनउवाच ॥ दोहा ॥
सुनि उद्दालक हुलस मन, ब्रह्मा बचन संभार ।
चले संग ले बालका, जित चन्द्रावति नार ॥२०॥
चौपाई ॥
गये जहां बैठी बड़ भागी । मन सकुचा उठ चरनौँ लागी ॥
चरनों से दोउ नैन छुवाये । कहीं धन्य हम दरशन पाये ॥
देख ऋषीश्वर ने सुख पाया । हँस करि ऐसे बचन सुनाया ॥
चलिये रहिये सुत के पाहूं । मैं राजा रघु के ढिग जाऊं ॥
तीनौ मिल आश्रम में आये । करि भोजन सबही हुलसाये ॥
नासकेत चन्द्रावति बाला । दोनों राख चला धर्मसाला ॥
भोर भये अरु बहुत संवारा । उद्दालक ने गवन विचारा ॥
चरनदास कहै मन धरि आसा । जा पहुँचा राजारघुपासा ॥२१॥
दोहा ॥
राजा बहु आदर कियो, सिंहासन बैठाय ।
५८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरनों सिर धरि यों कहा, कृपा करी तुम आय ॥२२॥
उद्दालकउवाच ॥ चौपाई ॥
उद्दालक कहो बचन अनूपा । देखे पिरथी पर बहुभूपा ॥
तो सम राजा और न दूजो । तेरी वड़ी आरवल हूजो ॥
राजोवाच ॥
हाथ जोरकर पूछी बाता । किह कारन आये तुम नाथा ॥
मनमें हो सो अज्ञा दीजै । वही कामना हमसूं लीजै ॥
उद्दालकउवाच ॥
ऐ राजा मोहिं कछू न चहिये । सभी त्याग जंगल में रहिये ॥
मैं आयो यह इच्छा मेरी । कन्या मांगन आयों तेरी ॥
वंस वढ़ावनही के काजा । मोसे सुनों सांच यह राजा ॥
जाकूं दीजे मोहि परनाई । अपने मनकी खोल सुनाई ॥
राजोवाच ॥
राजा कही न बेटी मेरे । पूरे वचन करूं जो तेरे ॥
एक हुती सो खाई काला । मरी गई छूटो जंजाला ॥
उद्दालक उवाच ॥
उद्दालक कहो सुनौ हमारी । अबलग जीवत सुता तुम्हारी ॥
रघुरुवाच ॥
राजा चौंक कही मुसकाई । वह कन्या कित है ऋषिराई ॥
मोहिं दीखत अचरजसी बाता । यहतुमबोलकह्योकुसलाता २३
उद्दालकउवाच ॥ दोहा ॥
ऋषिने कह्यो चन्द्रावती, मेरे आश्रम माहिं ।
सुत समेत वहां छोड़कर, मैं आयो इहिं ठाहिं ॥२४॥
चौपाई ॥
अज्ञा वचन जु पूरे भये । जो हमकूं उन आगे कहे ॥