भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ह्वां का भेद कछू मत राखो । कहैं कहां लो सब तुमभाखो ॥
जमलेने कूं कैसे आवैं । या प्रानी क्योंकर ले जावैं ॥
दुख सुख कहा बाट के माहीं । केते द्योसन में ले जाईं ॥
यों कहकर मुख ताकन लागे । नासकेत जब भाषन लागे १२॥
नासकेतउवाच ॥
दोहा ॥
नासकेत जब यों कही, सुनों ऋषीश्वर साख ।
जो जो देखा जमपुरी, सभी कहतहूँ भाख ॥ १३ ॥
चौपाई ॥
सुनों ऋषीश्वर चित अब दीजै । अब मैं कहूं सबै सुन लीजै ॥
महाभयानक दुख बहु भारै । सुनकर रोम उठै तन सारै ॥
पिता सराप गया मैं ह्वांईं । धर्मराय थे ललित तहांईं ॥
मैं अस्तुति करि परसन कीना । आधा आसन उन मोहिंदीन्हा॥
देवत बहुत सातुकी देखे । बलतकार जमदूत बलेखे ॥
चित्रगुपत मैं नैन निहारा । सबकूं शिक्षा देने वारा ॥
अरु मैं दीन होय बरपाया । कही अमर होगी तो काया ॥
पिता दया मैं फिर ह्यां आया । कहूं जु ह्वांकीं सबैसुनाया ॥१४॥
दोहा ॥
सुन्दर नगर सुहावना । जमपुर ताका नाम ।
सहस जोजन विस्तार है, सत्य न्याव की ठांव ॥ १५ ॥
चौपाई ॥
महा भयानक कोट निहारा । जोजन पांच भीत उचियारा ॥
दक्षिण दिशा ताहि कूं जानौं । तिसके द्वारे चार पिछानौं ॥
जैसे कर्म करै जो कोई । तैसे द्वारे बड़ि है सोई ।
पिरथम जमगण जगमें धावैं । या प्रानी कूँ लेने आवैं ॥